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शनिवार, 11 जुलाई 2015

* ईश्वर एक अवधारणा *

                            'ईश्वर' शब्द की अभिव्यक्त्ति से एक ऐसी शक्ति-सत्ता का बोध होता है, जो सर्वस्व और सर्वोच्च हैं। ईश्वर शब्द को अलग-अलग धर्म संप्रदाय और भाषा में भिन्न-भिन्न नामो से जाना जाता है , जैसे -अंग्रेजी में 'गॉड(God), पंजबी में 'रब'और इस्लाम में 'अल्हा' । ईश्वर के अन्य समतुल्य शब्द हैं - प्रभु , भगवान , अंतर्यामी इत्यादि। 
             
                              सभी धर्मावलम्बी और सम्प्रदाय के लोग अपने-अपने धर्म एमं सम्प्रदाय में विश्वास करते हैं। वे अपने विश्वास को विभिन्न माध्यमों एमं अनेक तरकीबों से व्यक्त करते हैं। धर्म को लोगों की श्रद्धा और आस्था से जोड़ा जाता है। 
             
                           मन में विचार आता है , ये ईश्वर है कौन ? इनकी शक्ति का स्रोत क्या है ? ये कैसे मिलेंगे ? ये कहाँ रहते हैं ? क्या करते हैं ? क्या नहीं करते ? इत्यादि। 
             
                            हम विभिन्न धर्म और सम्प्रदाय के माध्यमों से समझने का प्रयत्न  करेंगे। सबसे पुराना  एवं प्राचीन धर्म सनातन  धर्म है । इसकी विशेष चर्चा के पहले मैं अपनी जीवन की छोटी सी बात यहाँ रखना चाहूँगा। 
               
                         मेरी माँ स्वर्गीय श्रीमती निर्मला देवी , शिक्षित तो नहीं थी , पर उनके पास व्यवहारिक ज्ञान बहुत था। हम चार भाई हैं, जिसमें एक भाई , जो थोड़ा ज्यादा ही मौज-मस्ती में रहता था। माँ चाहती थी , हम सभी पूजा-पाठ में रूचि लें और हमलोग लेते भी थे। मेरा छोटा भाई की परीक्षा चल रही थी। वह देर तक सोता रहा और उठा तो जल्दी-जल्दी तैयार होकर उसने नास्ता किया और चलता रहा। माँ ने उसे टोका , कभी  तो भगवान  के आगे हाथ जोड़ लिया करो।  वह हँसते हुए बोला - अच्छा माँ , ये बाता , मैं किसकी पूजा करुँ ? हिन्दू भगवान को मानते हैं, मुस्लिम अल्हा को नमाज अदा करते हैं, ईसाई चर्च में प्रभु ईशु की प्रार्थना करते हैं, सिक्ख गुरुग्रंथ साहब का पाठ करते हैं।हमारे तो इतने देवी-देवता, मैं किस-किस की पूजा-अर्चना करुँ ? अगर कोई छूट गया और हमें परीक्षा में फेल करा दिया तो। हम सभी हंस दिए, पर माँ बोली- भाग बदमाश , देवता ऐसा नहीं करते , तू देवता का अर्थ भी समझता है। अनुज बोला- ठीक है माँ , मैं जा रहा हूँ , शाम को आऊँगा तो बात करेंगे और आप हमें अर्थ समझाइएगा।
                   संध्या काल का वेला था, हम सभी घर के सदस्य आँगन में बैठे हुए थे और भूंजा फांक रहे थे। मेरा अनुज सुबह वाली चर्चा शुरू किया, वह बोला - माँ आपने सुना होगा द्वारका में जब गोकुलवासियों ने श्रीकृष्ण के कहने पर इंद्र की पूजा नहीं की , तो इंद्र कुपित होकर वहाँ प्रलय लाने पर तुल गये और उन्होंने क्या किया , ये तो आपने सुना ही होगा।  माँ बोली - ठीक है , पर तुम्हें जब किसी की जरुरत होगी , तब तुम्हारी कौन मदद  करेगा ?अनुज बोला- आपकी बात  ठीक है, हमें भी इसमें संलिप्त होना पड़ेगा। माँ बोली - सुनो देवी-देवता वह हैं , जो सभी का भला सोचे और भला करे। तूने यह पढ़ा होगा या सुना होगा , अमुक व्यक्ति देवतुल्य है। यानी वह व्यक्ति सदविचारवान  है, सच्चा और सही कर्म करने वाला है।  तुमने यह भी देखा होगा , कुछ देवी-देवताओं  की बहुत कम या नहीं के बराबर पूजा होती है। कुछ सभी जगह पूजनीय हैं और पूजे भी जाते हैं, ऐसा उनके कर्म के कारण हैं। हम सभी -देवता, भगवन, ईश्वर - को  एक ही शब्द में ले लेते हैं, परन्तु तीनों में भिन्नता है। जो दूसरे को न सताये , दूसरे का उपकार करे, देवतुल्य या देव है।  जो हमारे कर्म के अनुसार हमारे भाग्य में 'अपना अंश प्रदान करे, वह भगवान , ईश्वर या सर्वस्व हैं।  ईश्वर , 'ईह' और 'स्वर' दोनों में पाया जाता है। ईह का अर्थ ब्रह्मामांड से लगाया जाता है और स्वर समुद्र , नदी , नाला , झरना, तालाब का हो या जीव-जंतु का हो। हम तीनों शब्दों (देवता, भागवान ,ईश्वर) को एक ही अर्थ में लेते हैं, क्योंकि इनका कुछ सदगुण तीनों  में समान रूप से पाया जाता है। मैं बोला - कुछ  वैज्ञानिकों ने हल ही में एक शोध-पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें लिखा गया है कि इस ब्रह्माण्ड में कुछ तत्वों की बनावट ही ऐसी है, जो इस सारी प्रक्रिया - प्रजनन, वृद्वि , पोषण को अपने तरीके से सुदृढ़ करती है और जिसमें थोड़ा बहुत अंतर होता है तो विसंगतियाँ उत्पन्न होती है। माँ बोली - तुम लोगों को कैसे समझायें , इसमें कौन-सी नई बात है।  अब वैज्ञानिक बोलतेहैं दूध-दही पौष्टिक है ,दाल में प्रोटीन है , तो तुम विश्वास करते हो और वही हमारे ग्रांथों में लिखा है , तो तुम्हें मजाक लगता है। गीता में भी तो श्रीकृष्ण ने कहा है -"मैं अजन्मा हूँ , मैं कण-कण में विराजमान हूँ , मैं सभी में हूँ , मेरी शक्ति से सबकुछ देख सकते हो, सब कुछ सुन सकते हो, पर मुझे देख सुन  नहीं सकते , क्योंकि मैं अगोचर हूँ। " यहाँ ये शब्द श्रीकृष्ण के लिए नहीं हैं। यह उसी शक्ति के लिए हैं , जिसे हम 'ईश्वर' कहते हैं। सतयुग में हिरण्कश्यप अपने पुत्र प्रहलाद को खम्भे से बांधकर कहता है - अब बता , तुम्हारा भगवान कहाँ है ? तो प्रहलाद बोलता है - "हम में तुम में खड्ग-खम्भ में , घट-घट व्याप्त राम" । इस कथन पर हिरण्यकश्यप प्रहलाद को मारना चाहता है ,तो हिन्दू धर्म-ग्रंथों के अनुसार विष्णु नरसिंह रूप में खम्भा के अंदर से प्रकट होते हैं और हिरण्यकश्यप का वध करते हैं। आपको बता दूँ की हिन्दू धर्म में राम किसी व्यक्ति विशेष का नाम भर नहीं है। यह व्यक्ति विशेष से बड़ा है , तभी तो हनुमानजी राम का नाम लेकर समुद्र लांघ जाते हैं। राम के नाम से समुद्र में इतना बड़ा सेतु बंध जाता है। रामायण में वर्णन है - अश्वमेघ यज्ञ के समय एक राजा , श्री रामचन्द्र जी के घोड़े को पकड़ लेता है। तब वह सोचता है की अब तो वह मारा जायेगा और छोड़ता है, तो राजा होना लानत है। फिर उसे एक तरकीब सूझती है,और वह राम नाम का शब्द लिखकर एक अटारी बनता है और उस पर चढ़ जाता है वहीं से श्रीराम जी के सैनिकों से युद्ध करता है और श्रीराम जी को आने पर मजबूर कर देता है। फिर तुम्हारे वैज्ञानिक बंधुओ ने कौन-सी नई बात कह दी या लिख दिए।
               
                          मैंने कहा- माँ , हमलोग यानी हिन्दू पेड़-पौधा, नदी-नाला , खेत-बाधार पता नहीं क्या-क्या पूजते हैं इतना  किसलिये ?माँ ने कहा - देखो पुत्र हमारी समझ से हमारे पूर्वजों में बहुत लोग जानकर यानि ज्ञानी थे और कुछ लोग जड़-बुद्धि थे, उन्हें डर दिखाकर ही नियंत्रित किया जा सकता था। हमारे जीवन की अनेक बातें , जिसमें हमारी भलाई थी, ज्ञानी तो इस बात को समझते थे और उसका पोषण-संरक्षण करते थे , पर जड़-बुद्धि वालों का क्या करते , उनमें कुछ उदंड भी थे और कुछ बलवान भी।  उनको नियंत्रित करने के लिए इसे धर्म से जोड़ दिया गया। इन सभी के पूजा-पाठ का एक और कारण है। हमें ये बताओ तुम  लोग हम  बूढ़ों को इतना आदर क्यों देते हो ? हमने कहा -आप क्या बात करती हैं! आपने हमें जन्म दिया, पालन-पोषण किया, संस्कार दिया ,आप अपनी नींद, चैन, ख़ुशी ........... माँ बोली - बस-बस , हमनें तुम्हे कुछ दिया, वो हमारा धर्म और कर्त्तव्य था।  हम सभी चुप हो गये। यही बात हिन्दू संस्कृति और धर्म के साथ है। हमें यानी मानव जाती को जिससे भी कुछ प्राप्त होता है,हम उसका आदर करते हैं।  हिन्दू धर्म में विभिन्न पूजा का यही अर्थ है।  सभी पूजा के पीछे वैज्ञानिक और सामाजिक कारण हैं।  हमारी सनातन धर्म के जो ग्रन्थ हैं ,वेदों में जो वर्णन है, वो सभी सत्य हैं। आज के वैज्ञानिक उसे ही सिद्ध कर रहे हैं। 
                       
                          मैंने कहा-  माँ, हमने बहुत जगह पूजा-पाठ की पद्धति देखी है। कुछ का तो समान होता है , तो कुछ का हर जगह अलग-अलग।  कोई पूजा एक स्थान पर होता है ,तो दूसरे स्थान पर नहीं। इसका क्या कारण है।  हमने देखे है, जो हमारे यहाँ छठ-पूजा होता है , उसी प्रकार अन्य घरों में भी होता है। पर पटना में एक श्रीवास्तव जी का परिवार है, वहाँ खरना के दिन दाल ,चावल (भात), सब्जी बनता है और हमारे यहाँ खीर और अखरा रोटी। माँ बोली- सुनो पुत्र, ये जो पूजा-पाठ की पद्धतियाँ हैं, कुछ इस तरह बनाई गई हैं, जो हमारे मन-मस्तिष्क को नियंत्रित करती हैं या ये कहो की वातावरण में सम्मोहन पैदा करती हैं, जिससे मानव क्या जीव-जंतु भी सम्मोहित और आकर्षित होते हैं।  कुछ पद्धति है, जो मैं सीखी हूँ , वही तुम बचपन से देख रहे हो और जो तुम करोगे, तुम्हारे बच्चे वही देखेंगे, वे भी वैसा ही करेंगे , उनकी पीढ़ी भी वैसा ही करेगी और यह पद्धति हममें रच-बस जाती है।  किसी की हिम्मत नहीं होती की उसे तोड़ दे या परिवर्तित कर दे। हम उसी से नियंत्रित होते हैं। अगर कोई परिवर्तन करने की सोचता है या करता है , तो उसे समाज के लोग प्रोत्साहित नहीं करते।  उस धर्म-कर्म से नियंत्रित होने के कारण हमारे मन में अनेको शंकाएँ उत्पन होने लगती हैं, जो हमारे कार्य में कष्ट , बेचैनी या अपशगुन का अनुभव कराती हैं। मैं तुम्हें एक बात बताती हूँ , तुम सभी इसे अनुभव कर के देखना। अगर तुम कोई भी कार्य लगातार करते हो और वह गलती से किसी दिन छूट गया , तो उस दिन हर समय तुम बेचैन रहोगे , लगेगा की कुछ भूल गए हो या तुम्हारे साथ कोई अशुभ घटना घटने वाली है।  मन लो , तुम सौ दिनों से प्रातः जगते हो , भूमि स्पर्श कर तिलक लगाते हो या अपने पूर्वज या किसी देव की तस्वीर को देखकर दिन की शुरुआत करते  हो और एक सौ एकवाँ दिन उस कार्य को नहीं करते हो, तो तुम दिन   भर चिंतित रहोगे। अनेक बातें तुम्हारे मन-मस्तिक में आती रहेंगी।  ये बात नहीं है की तुम्हें कोई परेशान कर रहा होगा, तुम्हें तुम्हारे मन की शंका परेशान कर  रही  होगी ।  तुम्हें बता दूँ की हम जैसा सोचते हैं, उसका प्रभाव थोड़ा या ज्यादा हमारे हर कार्य पर पड़ता है।  जैसा सोच होगा, वैसा ही तुम्हें वातावरण मिलेगा,कार्य भी तुम उसी प्रकार का करोगे और फिर फल तो वैसा ही मिलना है।
                   
                            ईश्वर शब्द में गजब की शक्ति है।  जब इंसान चारों तरफ से थक जाता है, तब वह ईश्वर को मानता है। ऐसा अनेक वैज्ञानिकों ने अपनी जीवनी में भी लिखा है। वैज्ञानिक भी जीवन के अंतिम पल में ईश्वर को मानने लगते हैं।
                   
                           सभी धर्मो में ईश्वर प्राप्ति के अनेको विधि-तरीके बताये गए हैं।  मानवता का पालन ही ईश्वर प्राप्ति का उत्तम माध्यम है। ईश्वर तो सभी जगह व्याप्त हैं। हममें , तुममें , कण-कण में। हमें उस मृग की तरह नहीं भटकना चाहिए, जो कस्तूरी को ढूँढता रहता है।  जब वह मारा जाता है, तब उसे मालूम होता है की जिस सुगंध को वह ढूँढ रहा था , वह तो उसके पास ही है।
                 
                           ईश्वर ऐसा प्रकाशपुंज है, जो सभी को प्रकाशित करता है, उसे देखा नहीं जा सकता।  उसकी शक्ति से ध्वनि सुनी जाती है, पर उसे नहीं सुना जा सकता।  हमारे वैज्ञानिकों ने प्रकाश औए ध्वनि को कई भागो में बाँटा है। प्रकाश  को दृश्य और अदृश्य  प्रकाश में और ध्वनि को तीन भागों में विभाजित किया है। पर ईश्वर इससे भी परे हैं।
                   ईश्वर ऐसी शक्ति है, जिसके परे कुछ भी नहीं। किन्तु लोगों को वह उतना ही और वैसा ही देता है , जितना वह सम्भाल सके और जैसा उसका कर्म है, वैसा ही देता है।
                   ईश्वर सभी जगह विराजमान है। वह समस्त ब्रह्यमाण्ड में सामान रूप से व्याप्त है। वह अपना बनाया हुआ नियम कभी नहीं तोड़ता। नियम टूटने पर उसकी भरपाई वह अवश्य करता या करवाता है। ईश्वर समय है , काल है पर वह काल से परे भी हैं वह समय से नहीं बंधा है।
               
                  ईश्वर का प्रकाशपुंज या शक्ति जो हमारे अंदर है , वह कितनी  सूक्ष्म है, उसे नहीं लिखी  जा सकती ।  वैज्ञानिक गणना में गणना वहाँ तक पहुँची ही नहीं है। बहुत लोगों ने इस पर शोध करने का कोशिश की है। ऐसी सुनी-सुनाई बात है की एक व्यक्ति या जीव को शीशे के कमरे में बंद किया गया था और उसे जीवित रहने के लिए उचित आवश्यकता की पूर्ति की जाती थी। ऐसा इसलिए किया जा रहा था की मालूम किया जा सके की जीव शक्ति कैसी है और वह कैसे निकलती है ? जब उसकी जीव-शक्ति ने शरीर को छोड़ा , तो शीशे का कमरा टूट गया तथा कुछ भी दृश्य उपस्थित  नहीं हुआ। इससे ज्ञात होता है की कोई तो शक्ति है , जो बलवान एवं सर्वशक्तिमान है। उसका कोई अंश इतना बलवान है, जो गणना से परे है और इस छोटे अंश से जीव-शक्ति इतना कर सकता है, तो जो इसका स्त्रोत है, उसका क्या कहना ! वह किसी वर्णन से परे है। अन्त में मैं यही कहूँगा की ईश्वर के प्रति अपने  अंदर सही अवधारणा उत्पन्न करनी चहिए। 


रविवार, 5 जुलाई 2015

* ठगी *

                           बहुत से लोगों का यह मानना है , मेरे पास क्या है , जो मैं ठगा जाऊँगा। बहुत से बेरोजगारों का भी यही मानना है। आपको ज्ञात ही होगा , समाज में बेरोजगारी विभिन्न प्रकार की है। एक जो शिक्षित वर्ग की है और दूसरी जो अशिक्षित हैं। शिक्षित में भी कुछ उच्च शिक्षित हैं ,तो कुछ मध्य और निम्न। बेरोजगारी भी क्षेत्र और  समय के अनुशार पायी जाती है।
                       
                            यहाँ हम ठगी की कुछ घटनाओं को आपके साथ बाँटने का प्रयत्न करेंगे।  ट्रेन में बस पड़ाव में  में ठगी में संलिप्त व्यकित बातों -बातों में लोगों से परिचय बढ़ाते हैं। यात्री को विश्वास में लेने के बाद नशा का सेवन करा के या अन्य विधि से उनका सामान चम्पत कर देते हैं। इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ आए दिन समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिल जाती है। इसके लिए यात्रियों को हिदायत भी दी जाती है। ऐसे तो लोग अपनी ठगी की कहानी दूसरे के समक्ष नहीं रखना  चाहते हैं। एक लोकोक्ति है -'अपना हरा मेहरी का मारा किसे बताएँ। ' ऐसे अक्सर होता है ,सिर्फ उच्च वर्ग या कुछ मुकदमेबाजी को छोड़कर। यहाँ हम उन घटनाओं,जो देखने में बिल्कुल ही साधारण दिखती हैं ,पर उसके लिए पहले से ही उचित योजनाएँ बनाई जाती हैं ,का उल्लेख करेंगे।
                           
                           यहाँ मैं आप सभी के समक्ष ,मेरे साथी राजू और आकाश कैसे ठगे गये , उसके बारे में बताऊँगा। एक गरीब और मध्यवर्गी बेरोजगार ,जो गाँव या पिछड़े क्षेत्र में रहते हैं, वे कैसे ठगे जाते हैं ,का वर्णन करूँगा। अक्सर वे लड़के ,जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती ,वे मैट्रिक व इंटर उर्त्तीण  होने के बाद नौकरी की तलाश करने लगते हैं। पास के शहर में जाकर नौकरी सम्बन्धी फॉर्म की तलाश में लग जाते हैं और फॉर्म भरने लगते हैं। पहली बार वे वहीं ठगे जाते हैं, जब वे झूठा (फर्जी) फॉर्म खिरीदकर घर लाते हैं। उन्हें समय रहते मालूम हो गया तो अच्छी बात है , नहीं तो वे फॉर्म भर देते हैं और भर्ती प्रक्रिया के लिए बुलावा भी आ जाता है। वे चयनित भी हो जाते हैं। चयन के बाद एक शुल्क लेकर नियुक्त किये जाते हैं ,उसके बाद उन्हें मालूम पड़ता है की नौकरी के साडी प्रक्रिया उनसे पैसे वसूलने के उद्देश्य मात्र से की गई थी ,लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। गाँव का एक लड़का तब तक ठगा जा चुका होता है। यहाँ हम आपको बतायेंगे की नियुक्ति का झांसा देकर कुछ एजेंसियाँ किस प्रकार युवको / युवतियों को ठगती हैं।
                           
                              राजू जिसके घर  की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसने मैट्रिक की परीक्षा  उर्त्तीण कर इंटर  में नाम लिखा लिया। वह अपने पास-पड़ोस   के बच्चों को टयूशन भी पढ़ाने लगा। इसी बीच सेना में भर्ती का विज्ञापन समाचार-पात्र  में आया। वह भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित हुआ। अंततः वह चिकित्सा जाँच में   अनुर्त्तीण  हो गया और घर आ  गया। फिर वह अपने पास के शहर में गया। वहाँ से भर्ती का दो फॉर्म लेकर आया। वह फॉर्म भर ही रहा था , तभी उसका एक दोस्त आया और फॉर्म देखकर उसने कहा की यह फॉर्म तो झूठा है। अब सेना में भर्ती फॉर्म से नहीं ,बल्कि विज्ञापन से रैली के माध्यम से होती है। लेकिन इसके पहले राजू एक और फॉर्म भर कर भेज चूका था ,जो  C.I.S.F., Bihata   में नियुक्ति के संदर्भ में था।  उसकी भर्ती प्रक्रिया के लिए बुलावा आ गया। वह वहाँ गया। बिहटा रेलवे स्टेशन के दक्षिण में एक मकान के दूसरे तल्ले पर एक कार्यालय था , जहाँ उसे बुलाया गया था।सामने मुख्य दरवाजे पर  C.I.SF.का बोर्ड लगा हुआ था। राजू अंदर गया।  वहाँ दो कमरे थे। एक में दो सदस्य बैठे हुए थे तथा दूसरे में एक व्यक्ति बैठा हुआ था।  वह अपना बुलावा पत्र दिखाया। जिस कमरे में दो व्यक्ति बैठे हुए थे ,वहाँ उसका सर्टिफिकेट जमा किया गया। वहीं पर उसकी मौखिक परीक्षा हुई ,जिसमे साधारण से १०-१२ प्रश्न पूछे गए जिसका जवाब आसानी से राजू ने दे दिया। उसके बाद वह दूसरे कमरे में गया ,जहाँ टेबुल लगी हुई थी। पास कुर्सी पर एक  व्यक्ति बैठा हुआ था। एक आलमीरा दीवार तरफ राखी हुई थी। जो  व्यक्ति सामने बैठा हुआ था , उसके पीछे दीवार पर दो कैलेंडर टंगा हुआ था ,जिस पर मानव शरीर के अंगो का बाह्य एवं आंतरिक वर्णन था। वह व्यक्ति डॉक्टर जैसा बिल्कुल  ही नहीं लग रहा था।  उसने डॉक्टरी शुल्क के नाम पे ३५० /- रूपये लिये। उसके बाद राजू को उत्तीर्ण घोसित कर सरे प्रमाण-पत्र (Certificate) वापस कर दिया गया और नियुक्ति-पत्र घर पर चला जायेगा ,ऐसा बताकर उसे घर वापस भेज दिया गया। राजू बातों-ही-बातों में समझ गया था की यह एक गैर-सरकारी संस्था है। फॉर्म द्वारा दिया गया सहूलियत और घोसना सिर्फ आकर्षण के लिए है। बाद में उसका नियुक्ति-पत्र भी आया ,जिसमे विभिन्न शुल्क जोड़कर ११,००० /- रूपये लेकर आने को कहा गया था। राजू नही गया और वह आज भी नियुक्ति-पत्र  अपने पास रखे हुए है। अपने पास-पड़ोस के लड़को को उसके बारे में वह बताते हुए कहता है की वे ऐसे चक्कर में न फँसे।
               
                            ऐसी ही कहानी आकाश की है , जो औधोगिक सुरक्षा बल,झारखण्ड के नाम से फॉर्म भरा था, जिसका कार्यालय पटना में था। ऐसी ही प्रक्रिया उसके साथ भी हुई। पर वह कई लोगो से पूछताछ के बाद जाकर नियुक्त हो गया। नियुक्ति के बाद उसके सामने भी हकीकत आ गई। जो सुविधा और वेतन बताया गया था, उसके नाम पर कुछ भी नहीं था। वह वहाँ से सीधा पटना ऑफिस आ गया और पैसा वापस माँगने लगा। कार्यालय वाले ने पैसा लौटाने से मना कर दिया, जब वह ज्यादा जिद और तर्क-वितर्क करने लगा तो वे लोग बताये की शाम को निर्देशक आ रहे हैं , उनसे मिलकर आप अपनी समस्या को बताइएगा और वही आपका समाधान निकालेंगे। फिर वह वहीं रुका रहा। उसे कार्यालय के सदस्य ने बहार रुकने को कहा। वह बाहर आ गया। बाहर उसने उनके बारे में कुछ पूछताछ की तथा पास के फुटपाथ पर लिट्टी-चोखा की दुकान से दो लिट्टी खाया और इंतजार करने लगा। शाम को एक व्यक्ति अपनी पर्सनल कार  में आया, जो दिखने में भी होशियार और पहुँच वाला लग रहा था। उस व्यक्ति से आकाश को कार्यालय के सदस्यों ने मिलाया। वह व्यक्ति बोला- 'आप कहीं भी शिकायत कर सकते हैं। पैसा वापस नहीं होगा। ' आकाश बोला - मैं ऑफिस में ही नौकरी करूँगा। फिर उससे निर्देशक ने बात किया और कहा , कोई भी Candidate यहाँ से बिना शुल्क जमा किये हुए वापस नहीं जाना चाहिए। उसे कार्यालय के एक सदस्य के रूम में भेज दिया गया और उसके कार्य करने के ढंग पर उसे कार्यालय में  रख लिया गया। वह उसी सिलसिले में शामिल हो गया। आकाश बताता है की ये लोग सिक्युरिटी के लिए पंजीयन कराते हैं। उसके बाद यह गोरख-धंधा शुरू होता है। इसकी शिकायत थाने में भी करने पर कोई नहीं सुनता। अगर सुनता भी है तो कार्यालय में पुलिस के आने के पहले सूचना हो जाती है और ये लोग भाग जाते हैं। आकाश आगे बताता है, उसमें निर्देशक पहुँच वाला व्यक्ति होता है। एक बार मैं भी पकड़ा गया था। थाने  से उसी ने मुझे छुड़वाया। कार्यालय का नाम स्थान इत्यादि हमेशा बदलता रहता है। निर्देशक का सही पता ,वह कहाँ रहता है ,कार्यालय के सदस्य को भी नहीं मालूम होता। इस धंधे में लगे हुए आकाश का पूरा पैसा , जो की उससे लिये गए थे ,जब वसूल हो गया ,तो वह धंधे से अलग हो गया। वह कहता है - मैं तो ठगा गया था,पर इसमे मेरी कमाई भी हो रही थी। लेकिन मुझे अन्दर ही अन्दर अच्छा नहीं लग रहा था ,इसलिए मैंने यह काम छोड़ दिया और फैसला किया की मेरी कोशिश यही होगी की इस गोरखधंधे में लगे लोगों से अन्य दूसरे को फँसने  से बचाऊँगा। 


शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

* धर्म *

                                             

                  धर्म (Dharm )क्या है ? धर्म शब्द के उच्चारण से लोग हिन्दू ,मुसलमान ,सिक्ख ,ईसाई ,पारसी, यहुदी ,जैन और बौद्धिष्ट होने का अर्थ लगाते हैं। 
                 
                    अंग्रेजी शब्द 'RELIGION ' (रिलिजन) को धर्म शब्द के लिए इस्तेमाल किया जाता है ,जो मेरे विचार से सही नहीं है। 'RELIGION ' का उचित हिंदी रूपान्तर सम्प्रदाय होता है। सम्प्रदाय का अभिप्राय विभिन्न धर्मावलम्बी से लिया जाता है। 
               
                    आजकल के नेतागण ज्यादातर ' धर्म-निरपेक्ष ' शब्द का उच्चारण करते हैं। कोई ' धर्म-निरपेक्ष ' कैसे हो सकता है ? हाँ ! 'सम्प्रदाय-निरपेक्ष' हो सकता है। 
               
                      भारतीय संस्कृति या हम सनातन धर्म-शास्त्रों को देखें , तो मूर्ति पूजा ,यज्ञ , हवन ,उपवास या कर्मकांड ही धर्म नहीं है , धर्म की सीमा अपार है , जिसका पालन करने से ब्यक्ति आकाश की तरह बड़ा , विशाल और जिज्ञासा का कारन बन जाता है , साथ ही , पृथ्वी की तरह सहनशील , गम्भीर और शीलवान बनता है। 
               
                      धर्म से हमारे अधिकार का नहीं , बल्कि कर्त्तव्य  का बोध होता है। जो अपने  कर्त्तव्य का सही और उचित पालन करता है , उसे स्वयं अधिकार प्राप्त हो जाता है। 
             
                       अपने कर्त्तव्य का सही पालन नहीं करने वाला धर्म-विमुख है। पिता का पुत्र के प्रति ,पुत्र का पिता के प्रति उचित  कर्त्तव्य ही उसका धर्म है।  इस धारणा को आगे बढ़ाते  हुए हम कहना चाहेंगे कि हर व्यक्ति का अपना कार्य है ,हर व्यक्ति का अपना-अपना कर्त्तव्य है फिर सभी का एक धर्म कैसे हो सकता है ?
             
                     धर्म को हम एक निश्चित सीमा में नहीं बांध सकते , जितने लोग , उतने कार्य , उतने धर्म। धर्म तो उमभत गांछी यानि ऐसा दरख्त (पेड़), जो आकाश की तरह विशाल है। जैसे आकाश धरातल को छूता हुआ  दिखता है ,पर छू नहीं पाता , फिर भी दोनों अपने आप में विशेष हैं। आकाश और धरातल , दोनों जीवन का आधार हैं ,जिसे हम झुठला नहीं सकते। बिना आकाश और धरातल का हम सृष्टी की कल्पना नहीं कर सकते , यानी सोच भी नहीं सकते। उसी प्रकार बिना धर्म के हम जीवन में एक कदम भी नहीं चल सकते। जहाँ धर्म नहीं ,वहाँ मानवता नहीं है। धर्म का विकाश होगा , तो मानवता का भी विकाश होगा। जहाँ कर्म है वहाँ धर्म है।  गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है -

                                       कर्म प्रधान विश्व करी रखा 

                                    जो जस करनी तासु फल चखा। 

                  हम कर्म के बिना विश्व की कल्पना नहीं कर सकते ,उसी प्रकार हम धर्म के बिना भी नहीं रह सकते। 
               
               फिर हमारे नेता लोग किस भाव से धर्म -निरपेक्ष  होने का दावा करते हैं। क्या वे अपना कर्त्तव्य सही से निभा रहे हैं ? अगर ऐसा नहीं है , तो वे किस भाव से  धर्म-निरपेक्ष  होने का दवा करते हैं। जब मानव अपना धर्म सही से पालन करे , तो सभी का जीवन सरल एवं सुगम हो जायेगा। 
              कर्म है तो धर्म है ,  धर्म है तो शान्ति है , शान्ति है वहाँ प्रेम है , विकाश है ,यही जीवन का आधार है।

                                                                     ***