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रविवार, 5 जुलाई 2015

* ठगी *

                           बहुत से लोगों का यह मानना है , मेरे पास क्या है , जो मैं ठगा जाऊँगा। बहुत से बेरोजगारों का भी यही मानना है। आपको ज्ञात ही होगा , समाज में बेरोजगारी विभिन्न प्रकार की है। एक जो शिक्षित वर्ग की है और दूसरी जो अशिक्षित हैं। शिक्षित में भी कुछ उच्च शिक्षित हैं ,तो कुछ मध्य और निम्न। बेरोजगारी भी क्षेत्र और  समय के अनुशार पायी जाती है।
                       
                            यहाँ हम ठगी की कुछ घटनाओं को आपके साथ बाँटने का प्रयत्न करेंगे।  ट्रेन में बस पड़ाव में  में ठगी में संलिप्त व्यकित बातों -बातों में लोगों से परिचय बढ़ाते हैं। यात्री को विश्वास में लेने के बाद नशा का सेवन करा के या अन्य विधि से उनका सामान चम्पत कर देते हैं। इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ आए दिन समाचार-पत्रों में पढ़ने को मिल जाती है। इसके लिए यात्रियों को हिदायत भी दी जाती है। ऐसे तो लोग अपनी ठगी की कहानी दूसरे के समक्ष नहीं रखना  चाहते हैं। एक लोकोक्ति है -'अपना हरा मेहरी का मारा किसे बताएँ। ' ऐसे अक्सर होता है ,सिर्फ उच्च वर्ग या कुछ मुकदमेबाजी को छोड़कर। यहाँ हम उन घटनाओं,जो देखने में बिल्कुल ही साधारण दिखती हैं ,पर उसके लिए पहले से ही उचित योजनाएँ बनाई जाती हैं ,का उल्लेख करेंगे।
                           
                           यहाँ मैं आप सभी के समक्ष ,मेरे साथी राजू और आकाश कैसे ठगे गये , उसके बारे में बताऊँगा। एक गरीब और मध्यवर्गी बेरोजगार ,जो गाँव या पिछड़े क्षेत्र में रहते हैं, वे कैसे ठगे जाते हैं ,का वर्णन करूँगा। अक्सर वे लड़के ,जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होती ,वे मैट्रिक व इंटर उर्त्तीण  होने के बाद नौकरी की तलाश करने लगते हैं। पास के शहर में जाकर नौकरी सम्बन्धी फॉर्म की तलाश में लग जाते हैं और फॉर्म भरने लगते हैं। पहली बार वे वहीं ठगे जाते हैं, जब वे झूठा (फर्जी) फॉर्म खिरीदकर घर लाते हैं। उन्हें समय रहते मालूम हो गया तो अच्छी बात है , नहीं तो वे फॉर्म भर देते हैं और भर्ती प्रक्रिया के लिए बुलावा भी आ जाता है। वे चयनित भी हो जाते हैं। चयन के बाद एक शुल्क लेकर नियुक्त किये जाते हैं ,उसके बाद उन्हें मालूम पड़ता है की नौकरी के साडी प्रक्रिया उनसे पैसे वसूलने के उद्देश्य मात्र से की गई थी ,लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है। गाँव का एक लड़का तब तक ठगा जा चुका होता है। यहाँ हम आपको बतायेंगे की नियुक्ति का झांसा देकर कुछ एजेंसियाँ किस प्रकार युवको / युवतियों को ठगती हैं।
                           
                              राजू जिसके घर  की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। उसने मैट्रिक की परीक्षा  उर्त्तीण कर इंटर  में नाम लिखा लिया। वह अपने पास-पड़ोस   के बच्चों को टयूशन भी पढ़ाने लगा। इसी बीच सेना में भर्ती का विज्ञापन समाचार-पात्र  में आया। वह भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित हुआ। अंततः वह चिकित्सा जाँच में   अनुर्त्तीण  हो गया और घर आ  गया। फिर वह अपने पास के शहर में गया। वहाँ से भर्ती का दो फॉर्म लेकर आया। वह फॉर्म भर ही रहा था , तभी उसका एक दोस्त आया और फॉर्म देखकर उसने कहा की यह फॉर्म तो झूठा है। अब सेना में भर्ती फॉर्म से नहीं ,बल्कि विज्ञापन से रैली के माध्यम से होती है। लेकिन इसके पहले राजू एक और फॉर्म भर कर भेज चूका था ,जो  C.I.S.F., Bihata   में नियुक्ति के संदर्भ में था।  उसकी भर्ती प्रक्रिया के लिए बुलावा आ गया। वह वहाँ गया। बिहटा रेलवे स्टेशन के दक्षिण में एक मकान के दूसरे तल्ले पर एक कार्यालय था , जहाँ उसे बुलाया गया था।सामने मुख्य दरवाजे पर  C.I.SF.का बोर्ड लगा हुआ था। राजू अंदर गया।  वहाँ दो कमरे थे। एक में दो सदस्य बैठे हुए थे तथा दूसरे में एक व्यक्ति बैठा हुआ था।  वह अपना बुलावा पत्र दिखाया। जिस कमरे में दो व्यक्ति बैठे हुए थे ,वहाँ उसका सर्टिफिकेट जमा किया गया। वहीं पर उसकी मौखिक परीक्षा हुई ,जिसमे साधारण से १०-१२ प्रश्न पूछे गए जिसका जवाब आसानी से राजू ने दे दिया। उसके बाद वह दूसरे कमरे में गया ,जहाँ टेबुल लगी हुई थी। पास कुर्सी पर एक  व्यक्ति बैठा हुआ था। एक आलमीरा दीवार तरफ राखी हुई थी। जो  व्यक्ति सामने बैठा हुआ था , उसके पीछे दीवार पर दो कैलेंडर टंगा हुआ था ,जिस पर मानव शरीर के अंगो का बाह्य एवं आंतरिक वर्णन था। वह व्यक्ति डॉक्टर जैसा बिल्कुल  ही नहीं लग रहा था।  उसने डॉक्टरी शुल्क के नाम पे ३५० /- रूपये लिये। उसके बाद राजू को उत्तीर्ण घोसित कर सरे प्रमाण-पत्र (Certificate) वापस कर दिया गया और नियुक्ति-पत्र घर पर चला जायेगा ,ऐसा बताकर उसे घर वापस भेज दिया गया। राजू बातों-ही-बातों में समझ गया था की यह एक गैर-सरकारी संस्था है। फॉर्म द्वारा दिया गया सहूलियत और घोसना सिर्फ आकर्षण के लिए है। बाद में उसका नियुक्ति-पत्र भी आया ,जिसमे विभिन्न शुल्क जोड़कर ११,००० /- रूपये लेकर आने को कहा गया था। राजू नही गया और वह आज भी नियुक्ति-पत्र  अपने पास रखे हुए है। अपने पास-पड़ोस के लड़को को उसके बारे में वह बताते हुए कहता है की वे ऐसे चक्कर में न फँसे।
               
                            ऐसी ही कहानी आकाश की है , जो औधोगिक सुरक्षा बल,झारखण्ड के नाम से फॉर्म भरा था, जिसका कार्यालय पटना में था। ऐसी ही प्रक्रिया उसके साथ भी हुई। पर वह कई लोगो से पूछताछ के बाद जाकर नियुक्त हो गया। नियुक्ति के बाद उसके सामने भी हकीकत आ गई। जो सुविधा और वेतन बताया गया था, उसके नाम पर कुछ भी नहीं था। वह वहाँ से सीधा पटना ऑफिस आ गया और पैसा वापस माँगने लगा। कार्यालय वाले ने पैसा लौटाने से मना कर दिया, जब वह ज्यादा जिद और तर्क-वितर्क करने लगा तो वे लोग बताये की शाम को निर्देशक आ रहे हैं , उनसे मिलकर आप अपनी समस्या को बताइएगा और वही आपका समाधान निकालेंगे। फिर वह वहीं रुका रहा। उसे कार्यालय के सदस्य ने बहार रुकने को कहा। वह बाहर आ गया। बाहर उसने उनके बारे में कुछ पूछताछ की तथा पास के फुटपाथ पर लिट्टी-चोखा की दुकान से दो लिट्टी खाया और इंतजार करने लगा। शाम को एक व्यक्ति अपनी पर्सनल कार  में आया, जो दिखने में भी होशियार और पहुँच वाला लग रहा था। उस व्यक्ति से आकाश को कार्यालय के सदस्यों ने मिलाया। वह व्यक्ति बोला- 'आप कहीं भी शिकायत कर सकते हैं। पैसा वापस नहीं होगा। ' आकाश बोला - मैं ऑफिस में ही नौकरी करूँगा। फिर उससे निर्देशक ने बात किया और कहा , कोई भी Candidate यहाँ से बिना शुल्क जमा किये हुए वापस नहीं जाना चाहिए। उसे कार्यालय के एक सदस्य के रूम में भेज दिया गया और उसके कार्य करने के ढंग पर उसे कार्यालय में  रख लिया गया। वह उसी सिलसिले में शामिल हो गया। आकाश बताता है की ये लोग सिक्युरिटी के लिए पंजीयन कराते हैं। उसके बाद यह गोरख-धंधा शुरू होता है। इसकी शिकायत थाने में भी करने पर कोई नहीं सुनता। अगर सुनता भी है तो कार्यालय में पुलिस के आने के पहले सूचना हो जाती है और ये लोग भाग जाते हैं। आकाश आगे बताता है, उसमें निर्देशक पहुँच वाला व्यक्ति होता है। एक बार मैं भी पकड़ा गया था। थाने  से उसी ने मुझे छुड़वाया। कार्यालय का नाम स्थान इत्यादि हमेशा बदलता रहता है। निर्देशक का सही पता ,वह कहाँ रहता है ,कार्यालय के सदस्य को भी नहीं मालूम होता। इस धंधे में लगे हुए आकाश का पूरा पैसा , जो की उससे लिये गए थे ,जब वसूल हो गया ,तो वह धंधे से अलग हो गया। वह कहता है - मैं तो ठगा गया था,पर इसमे मेरी कमाई भी हो रही थी। लेकिन मुझे अन्दर ही अन्दर अच्छा नहीं लग रहा था ,इसलिए मैंने यह काम छोड़ दिया और फैसला किया की मेरी कोशिश यही होगी की इस गोरखधंधे में लगे लोगों से अन्य दूसरे को फँसने  से बचाऊँगा। 


शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

* धर्म *

                                             

                  धर्म (Dharm )क्या है ? धर्म शब्द के उच्चारण से लोग हिन्दू ,मुसलमान ,सिक्ख ,ईसाई ,पारसी, यहुदी ,जैन और बौद्धिष्ट होने का अर्थ लगाते हैं। 
                 
                    अंग्रेजी शब्द 'RELIGION ' (रिलिजन) को धर्म शब्द के लिए इस्तेमाल किया जाता है ,जो मेरे विचार से सही नहीं है। 'RELIGION ' का उचित हिंदी रूपान्तर सम्प्रदाय होता है। सम्प्रदाय का अभिप्राय विभिन्न धर्मावलम्बी से लिया जाता है। 
               
                    आजकल के नेतागण ज्यादातर ' धर्म-निरपेक्ष ' शब्द का उच्चारण करते हैं। कोई ' धर्म-निरपेक्ष ' कैसे हो सकता है ? हाँ ! 'सम्प्रदाय-निरपेक्ष' हो सकता है। 
               
                      भारतीय संस्कृति या हम सनातन धर्म-शास्त्रों को देखें , तो मूर्ति पूजा ,यज्ञ , हवन ,उपवास या कर्मकांड ही धर्म नहीं है , धर्म की सीमा अपार है , जिसका पालन करने से ब्यक्ति आकाश की तरह बड़ा , विशाल और जिज्ञासा का कारन बन जाता है , साथ ही , पृथ्वी की तरह सहनशील , गम्भीर और शीलवान बनता है। 
               
                      धर्म से हमारे अधिकार का नहीं , बल्कि कर्त्तव्य  का बोध होता है। जो अपने  कर्त्तव्य का सही और उचित पालन करता है , उसे स्वयं अधिकार प्राप्त हो जाता है। 
             
                       अपने कर्त्तव्य का सही पालन नहीं करने वाला धर्म-विमुख है। पिता का पुत्र के प्रति ,पुत्र का पिता के प्रति उचित  कर्त्तव्य ही उसका धर्म है।  इस धारणा को आगे बढ़ाते  हुए हम कहना चाहेंगे कि हर व्यक्ति का अपना कार्य है ,हर व्यक्ति का अपना-अपना कर्त्तव्य है फिर सभी का एक धर्म कैसे हो सकता है ?
             
                     धर्म को हम एक निश्चित सीमा में नहीं बांध सकते , जितने लोग , उतने कार्य , उतने धर्म। धर्म तो उमभत गांछी यानि ऐसा दरख्त (पेड़), जो आकाश की तरह विशाल है। जैसे आकाश धरातल को छूता हुआ  दिखता है ,पर छू नहीं पाता , फिर भी दोनों अपने आप में विशेष हैं। आकाश और धरातल , दोनों जीवन का आधार हैं ,जिसे हम झुठला नहीं सकते। बिना आकाश और धरातल का हम सृष्टी की कल्पना नहीं कर सकते , यानी सोच भी नहीं सकते। उसी प्रकार बिना धर्म के हम जीवन में एक कदम भी नहीं चल सकते। जहाँ धर्म नहीं ,वहाँ मानवता नहीं है। धर्म का विकाश होगा , तो मानवता का भी विकाश होगा। जहाँ कर्म है वहाँ धर्म है।  गोस्वामी तुलसीदास ने ठीक ही लिखा है -

                                       कर्म प्रधान विश्व करी रखा 

                                    जो जस करनी तासु फल चखा। 

                  हम कर्म के बिना विश्व की कल्पना नहीं कर सकते ,उसी प्रकार हम धर्म के बिना भी नहीं रह सकते। 
               
               फिर हमारे नेता लोग किस भाव से धर्म -निरपेक्ष  होने का दावा करते हैं। क्या वे अपना कर्त्तव्य सही से निभा रहे हैं ? अगर ऐसा नहीं है , तो वे किस भाव से  धर्म-निरपेक्ष  होने का दवा करते हैं। जब मानव अपना धर्म सही से पालन करे , तो सभी का जीवन सरल एवं सुगम हो जायेगा। 
              कर्म है तो धर्म है ,  धर्म है तो शान्ति है , शान्ति है वहाँ प्रेम है , विकाश है ,यही जीवन का आधार है।

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