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गुरुवार, 24 दिसंबर 2015

* शंकर *

                   वर्ष २००३ का फ़रवरी माह प्रातः काल की बेला में मैं अपने घर के छत पर बैठा धुप का आनंद ले रहा था। बैठे-बैठे अधखुली आँखों से मैं अपने और इस जगत के विषय में सोच रहा था आखिर यह दुनियाँ है क्या ? इसे निर्माण करने का श्रेय तो किसी को तो है ! लोगो में सोच आखिर कैसे उत्पन्न होती है। एक ही परिवार एवं परवरिश में लोग भिन्न-भिन्न कैसे हो जाते हैं। इतने में मुझे अपने पड़ोस के शंकर के घर से आती हुई शोर सुनाई दीया। वहाँ हो रहे शोर की ओर मैं अपना ध्यान ले गया। वहाँ एक वाक्य स्पष्ट सुनाई दिया जो शंकर की माँ की थी। वह रोती हुई कह रही थी, "कोई बात नहीं बेटा ईश्वर सब देख रहा है, तुम्हे भी ऐसा कहने वाला अवश्य प्राप्त होगा।" हमें मालूम हुआ की उनमें लेन-देन और बटवारे का बात चल रहा है। कुछ दिनों के बाद हमें शंकर के द्वारा ही 'जब हम लोगों में बातचीत होगा तो आप भी रहिएगा' यानि उनके बीच होने वाली बातचीत में रहने के लिए निवेदित किया गया। हमने हामी भर दी। अब जब भी बटवारे या हिस्सेदारी  का बात चलता तो मैं उस में जाता। उन सारे बातचीत में जो बातें सामने आई तथा शंकर ने जो बोल-वचन किया उसका हमें कतई विश्वास नहीं था।

                         हमारे पड़ोसियों के साथ हमें भी विश्वास था की शंकर अपने घर को संवारने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ रहा। हम सभी की यह धारणा मिथ्या साबित हुई। शंकर हमारे पड़ोस में अच्छों लड़को में गिना जाता था। वह उस समय डबल एम० ए०  (M.A.) कर चूका था। ऐसे वह आम लोगों से हँस कर जी तथा आदर सूचक शब्दों के साथ ही बात करता था। आजतक उसके चरित्र पर भी किसी ने ऊँगली नहीं उठाई थी। ऐसे वह प्रारम्भ में अपने घर को चलाने के लिए विभिन्न ऊधम (उद्यापन) भी किया, जिसमें उसे माँ, भाई-बहन का भरपूर सहयोग मिला सिर्फ उसे पिता जी से थोड़ा कम, ऐसा नहीं की उसके पिता जी ने उसका सहयोग नहीं किया ! यहाँ तक उसे लाने में उसका पिता जी का ही आशीर्वाद था। वह उनका नाम बेच कर ही आय किया (कमाया) था, उसके पिता जी अपने कुछ आदतों से मजबूर थे। वह (शंकर) जो उस समय किया  आज के पढ़े-लिखे लोग उसे दोहन कहते हैं। जो विकाश के लिए जरुरी भी है।

                            वह सुबह की वार्ता जिसका हमने पहले चर्चा किया था। उस रोज हुआ यू की शंकर के घर में शायद खाने-पिने की वस्तु नहीं थी, उस समय उस घर में शंकर को छोड़ दे तो घर का कोई और सदस्य खास आय नहीं करता था या यू कहें की शंकर ही उस समय उस घर-परिवार का एक मात्र आय करने वाला सदस्य था। उस सुबह शंकर की माँ ने उसे  बताया की घर में खाने को कुछ भी नहीं है, बेटा कुछ ले कर आओ, वह  बोला मैं सभी का ठिका ले रखा हूँ, मेरे पास पैसे नहीं हैं। उसकी माँ कुछ देर चुप रही फिर बोली किसी दुकान से उधर ले आ, हम कहीं से पैसा ला कर चूका देंगे। वह बोला बस करो तुम तो ऐसे ही कहती हो , तुम लोगो के कारण मेरा आमद (आय) का कुछ पता ही नहीं चल पा रहा है। माँ बोली "बेटा तुम बड़े हो, माँ-बाप बच्चों को इसी लिए तो पालते हैं, की वह उनका काम में हाथ बटाएगा, उनके बोझ को काम करेगा, तुम बड़े हो तो तुम्हारा अपने भाई-बहन के प्रति कर्तव्य तो बनता ही है।" शंकर बोला "बस-बस हम पर आप लोगों ने क्या खर्च किए हैं, मेरा कोई नहीं है, मुझे किसी से लेना देना नहीं है।" उसकी माँ बोली  "कोई नहीं का मतलब क्या तुम्हें इतना बड़ा करने में हमने कुछ नहीं किया, क्या तुम स्वयं इतना बड़ा हो गया।" शंकर बोला  "हाँ मुझे तो चाची और दादा-दादी ने पाला  है।" माँ बोली "बेटा कोई किसी को नहीं पालता , तुम अब होस सम्भाले हो तो देख रहे हो या जो लोग कह रहें हैं उसे सुन रहे हो, कोई किसी को एक बार करता है तो तीन बार सुनाता है, खैर छोड़ो (रुंधे हुए गले से ) मैं तुम्हारी जननी हूँ अपने कोख (उदर) में तुम्हे पाला है , अपने खून से तुम्हे नौ माह सींचा है तो इस नाते तो तुम पर मेरी हक़ तो बनती ही है , तुम्हे मातृ कर्ज तो चुकाना ही पड़ेगा।" शंकर बोला "कोई जननी-माननी नहीं, कोई कर्ज-वर्ज नहीं आपका हम पर कोई एहसान नहीं है , हमारा कोई नहीं है। " माँ बोली " तो तुम क्या आम के खोड़हर में से इतना बड़ा ही आ गए थे।" और माँ डबडबा गई उनके मुख से आवाज नहीं निकल रहा था, एक माँ के दुःख दर्द पीड़ा को एक आम आदमी कैसे समझ सकता है, उस माँ पर उस समय क्या बित रही होगी, जिस बच्चे को वह कितनी आशा से पाली पोशी होगी जो कमाने (आय करने) लायक हुआ तो  अपना कर्तव्य से पला झाड़ लिया , जिस माँ के बच्चें जो अभी नादान हो, जो भूख मिटाने के लिए अन्न के एक-एक दाने को मुहताज हो, उसके दर्द को कोई शब्दों में कैसे व्यक्त कर सकता है। इसके बाद शंकर ने जो बोला उसे सुन कर मेरा मस्तिष्क सुन हो गया, लगा मेरा दिल बैठ जायेगा धरकन रुक जाएगी सांसे थम जाएगी। हमें आज के समाज पर सोचने को मजबूर होना पड़ा। जिसने भी सुना, जाना दाँतो तले ऊँगली दबा लिया। हमें लगा किसी ने सही कहा है, "ज्यादा पढ़ा लिखा स्वार्थी हो जाता है। " यहाँ हमें उस व्यक्ति का सोच सही लगता है। जो भी शंकर के इस कथन को सुनता कहता क्या ? एक पढ़ा लिखा बेटा (लड़का) का यह जबाब। ऐसा सन्तान से निःसंतान होना ही अच्छा है। कई औरतें तो कहती अगर यह मेरा लड़का होता  तो इसे गर्भ में ही मार देती। इन सारी प्रतिक्रियाओं के बाद हमने देखा आज समाज में बहुत परिवर्तन आ गई है। किसी ने शंकर के मुख पर कुछ नहीं कहा या उसे न ही समझाने का प्रयत्न किया। बस बाहर-बाहर काना-फूसी होता रहा। हमें समझ में नहीं आ रहा था। समाज के इस बदलाव को हम क्या नाम दूँ। अब आप सोच रहें होंगे आखिर शंकर ने ऐसा क्या कह दिया तो सुनिए मुझे यहाँ लिखने में भी शर्म आ रही है, पर क्या करू लिखना तो पड़ेगा। शंकर जिस गर्भ से जन्म लिया उसी गर्भ को को गाली दिया। अब आप शंकर के मुख से ही सुन लीजिए।  शंकर - "हाँ मैं खोड़र में से आया हूँ , आज मैं जो भी हूँ अपने परिश्रम और किस्मत से हूँ , आपने तो माजा लिया और मैं आ गया, इसमे मेरा क्या इसमे तो आप कसूरवार हैं, अब भी हमें आप लोग छोड़िए की और कुछ सुनना है।" इस कथन के बाद भी उस माँ का विशाल हिर्दय को देखो वह बस रोती हुई बोली, "अच्छा बेटा खुश रहो आबाद रहो, ईश्वर तुम्हे भी संतान देंगे और और जब वह भी यही बात तुम से कहेगा तब तुम्हे इस माँ की दुःख दर्द का एहसास होगा।"

                         आप को बता दे की इन सारी घटनाओं के बाद शंकर कुछ दिन घर परिवार के साथ रहा उसका शादी हुआ। कुछ दिनों बाद वह अपनी पत्नी को मायके भेज दिया और फिर वही नटकृतन ड्रामा शुरू किया। उसके बाद वह अपनी पत्नी को ले कर अलग रहने लगा। घर पर जब अन्य लोगो को खाने के दाने के लिए लाले पर रहे थे तो वह रोझहा  (उठवना) दूध पिता था। अब वह आए दिन अपने बड़े हो रहे भाइयों एवं माँ-पिता जी से जमीन-जायदाद बाटने के लिए लड़ता एवं बिबाद खड़ा करता रहता। समय बिता और उसके भाई भी सरेख (युवा) हो गए वे भी रोजग़ार एवं ऊधम (उद्यापन) करने लगे जिससे आय होने लगा और घर के सदस्यों का सही से  परवरिश होने लगा। इसी दौरान इनके पिता जी अब बीमार रहने लगे। उनके दवा पर भी अच्छा पैसा खर्च आने लगा। इन सरे बातों को देख कर शंकर के भाइयों ने अपने मामा जी को बुलाया। सभी लोग बैठ कर कुछ बात किए, जिसमे कुछ पैसा और अन्न (अनाज) देने का शंकर स्वीकार किया। बाद में शंकर अपने किए वादे से मुकर गया। उसने जो परिवार के भरण-पोषण के लिए स्वेच्छा से सहयोग करने के लिए कहा था। उसे वह भूल गया। आप को बता दे की यह सारी बातें बटवारे के लिए, जब शंकर ने हमें बुलाया तो उसी दौरान क्रमवार सामने आई। इसी क्रम में शंकर के भाइयों ने बताया की ए कई बार आपसी सहमति से हुए निर्णय से पलट गए हैं। जिसका उन्होंने लिखित प्रमाण भी दिखाया।

                          शंकर के बुलाने पर ही पंचायती के लिए हमारे साथ कुछ और लोग पंच बन कर बैठे थे। हम ने शंकर से पूछा 'हाँ शंकर आप लोगों में पहले भी कुछ सहमति समझौता हुआ था।' वह बोला हाँ चाचा जी। मैं बोला आप उस से पीछे क्यों हट गए। शंकर बोला मैं माँ-पिता जी को कुछ सहयोग के लिए भरोसा दिया था पर कुछ कारणों से मैं वह सहयोग नहीं कर सका। हमने पूछा क्यों ? तो वह बोला जब मैं उन्हें सहयोग करने लगा तो मेरी आय कम गई और मैं बीमार रहने लगा तो मैं उनका सहयोग करना छोड़ दिया। हमने बोला अच्छी बात है पर आपकी स्वास्थ (सेहत) जब अच्छी हो गई और आय ठीक होने लगा तो फिर आपको अपना किया हुआ वादा, दिया हुआ भरोसा कायम रखना चाहिए था। वह बोला ऐसा नहीं की मैं उस समय बिलकुल बीमार ही हो गया और मेरी आय बिलकुल बंद हो गई थी। इनके सहयोग से मैं अनुभव किया की हमारे ऊपर विपति का छाया पड़ रही है जो हमें परेशानी में डाल रही है। इनसे नाता और सहयोग तोड़ने के बाद मैं पुनः ठीक महसूस करने लगा। मैंने मन में सोचा क्या बहाना है। इसे धुर्तई कहे या और कुछ ? मेरे मन में आया माता-पिता के सहयोग से इस पर विपति का छाया मड़राने लगती है, कही इनके धन-सम्पति लेने के बाद कही और बड़ी घटना न हो जाए, पर इस पर मैं कुछ नहीं बोला। उस दिन आम बात हुई सभी का पक्ष सुना गया, एक और बात सामने आई की उनमे एक लिखित समझौता भी हुआ है। शंकर के भाइयों ने बताया की बार-बार स्वयं निर्णय करते हैं फिर मुकर जाते हैं तो इस बार हमने लिखित करवाया था वो भी स्टाम्प पेपड़ पर। हम लोगो ने कहा तब तो ठीक है फिर हम लोगों की क्या जरुरत है। शंकर के भाइयों ने बोला अब ए उसे भी मानने को तैयार नहीं हैं। हमलोगों ने शंकर के तरफ देखा तो शंकर कहने लगा हमें उस समय नहीं पता चला इस लिए हमने वह शर्त मान लिया था। उस में गलत है इस लिए अब हमें उससे सरोकार नहीं है। हम लोगों ने कहा इसका क्या गारंटी है की तुम अब मान जाओगी। वह बोला जी ना अब आप लोग जैसा कहेंगे वैसा ही होगा। हम लोगों ने वह कागज (स्टाम्प पेपर) मंगवाया और आम सहमति से उसे रद्द कर नष्ट कर दिया गया। यह बैठक रात को हो रही थी रात अधिक हो जाने से हम लोग सारी  बातों को यहीं समाप्त कर फिर अगले दिन निश्चित समय पर आने के लिए कह कर अपने-अपने घर प्रस्थान किया।

                             पुनः अगले रात निश्चित समयानुसार बैठक शुरू हुई बात का शिलशिला शुरू हुआ। शंकर ने कहा हमारी तिलक का बर्तन इन लोगों के पास है, जिसे देने के लिए इन्हे कहिए। शंकर के भाइयों ने बर्तन होने का बात स्वीकार किया, साथ में कहा की इनके शादी का कर्ज था, महाजनों एवं साहूकारों का उन्होंने नाम भी बताया जिसे बिना चुकाए ए अलग हो गए थे। इन्हें बोलिए, ए उनका देनदारी चुकाए। हम ने शंकर के भाई से अकेले में पूछा क्या उसके बर्तन से तुम्हार देनदारी चूक जाएगा तो उसने कहा नहीं। मैं इनका बर्तन सही समय पर वापिस भी कर दूँगा पर उन्हें शर्म तो आनी चाहिए न, मैं उनका बर्तन यु ही मुफ्त में थोड़े ही रखा हूँ। मैं बोला खैर छोड़ो भी तुम उसका बर्तन वापिस कर दो, तुम कहो तो मैं उसे कल बुलाऊंगा उसे उसका बर्तन वापिस कर देना। शंकर का भाई बोला ठीक है। अगले दिन शंकर को उसका बर्तन मिल भी गया।

                            पुनः अगले दौर की बात शुरू हुई, सभी बात राय सुमारी से ही तय हो रहा था। कौन कितना किसको देगा। उनके पिता जी के उपचार में होने वाले खर्च में कौन कितना देगा। इसी दौरान शंकर के भाई ने बताया की पिता जी के बीमार होने पर ये एक बार उनसे मिलने आए थे तो हमने इन्हें दवा की पर्ची दिया था एक बार में ग्यारह दिन का दवा आता था, इन्होने सिर्फ एक सप्ताह का ला कर दिया। हम लोग वही दवा एक वर्ष से ला रहें हैं। उसके बाद इन्होंने कभी न माता जी से न पिता जी मिलना आवश्यक समझा। उस समय पिता जी का जो स्थिति थी इन्हे लगा था इनका इह लीला समाप्त है पर ऊपर वाले के आगे किसका चला है। आप आज देख रहे हैं न की ए स्वस्थ हैं। बटवारे की बात चल ही रही थी तो शंकर अपने छोटे भाई के ओर मुखातिब हो कर बोला मेरे औरत (मेहरारू) में भी बाट लो , बरा अंधेरे में उसके हाथ से खाना अच्छा लगता था। हमने कहा चुप रहो, शर्म करो क्या बोल रहे हो, सोचे हो, समाज में दश लोगो के सामने यही सब बोलते हैं, तो शंकर ही... ही .. ही.. करने लगा जिसे हम देशी भाषा में दाँत निपोरना भी कहते हैं।

                             आगे सभी बातें सहमति से तय हो रही थी। शंकर के भाई शंकर के कहे अनुसार सभी बात मान रहे थे पर शंकर उनका कोई बात मानने को तैयार नहीं था। इसी दौरान शंकर का एक भाई जो उससे  बहुत छोटा था पर अन्य भाइयों से बड़ा था, उसने एक सही बात कही, उसने कहा आप हिस्सा लगा दीजिए हम ले लेंगे या हम लोग लगा देते हैं तो आप ले लीजिए, उस पर भी शंकर का सही प्रतिक्रिया नहीं था। शंकर जैसा चाह रहा था वैसा ही सब कुछ चल रहा था। हम लोगों ने एक लिखित नोट (टिप्पणी) भी बनाया था, जिसमें सभी का हिस्सा, विचार दर्ज करते जा रहे थे। एक गलती हम लोगों से हुई जिसे हमने अंत में सुधारने का कोशिश किया जो नहीं हो सका। हुआ यू की एक स्थान पर सड़क के किनारे बाजार में पक्का मकान था और उसी में कुछ हिस्सा खपरैल था। वहाँ शंकर के हिसाब या मन से ही विभाजन हुआ और कहा गया की उसका आय उनके पिता जी अपनी परवरिश के लिए रखेंगे। वहाँ हिस्सा बाटने के बाद, जो हिस्सा उसके भाइयों को मिला उस में वर्तमान में (उस समय) वह निवास कर रहा था। उसने (शंकर ने) कहा मैं इन लोगो का हिस्सा तब छोड़ूंगा जब मुझे पुराने घर में हिस्सा मिलेगा। यहाँ हम लोगों से बड़ी भूल हुई जो इस बटवारे को विफल कर दिया, जिसका मुझे आज भी अफ़सोस है। शंकर का पुराना घर मिट्टी का था जो गिर गया था। उसके  अलग होने के कुछ वर्ष बाद उसके भाइयों ने एक ईट का माकन बनाया था जो अभी भी अर्ध निर्मित ही था। शंकर उसे ही पुराना घर दिखा रहा था। उस में भी शंकर के भाइयो ने उसे देने के लिए कह दिया पर कुछ कारण वस उसके भाई को कही जाना पड़ा। इसी दौरान उनके रिस्तेदारो को मालूम चला की शंकर के भाइयों द्वारा निर्मित माकन में शंकर को हिस्सा मिल रहा है तो उन्होंने उसके भाई से बात किया और कहा तुम लोग पागल हो गए हो घर उस को दे दोगे तो कहाँ रहोगे। घर को तुमने खुद बनाया, उस समय तो उस से घर बनाने में मदद माँगा ही था, तो उसने साफ माना कर दिया था। उसने कहा हमें यहाँ नहीं रहना है। अब मुफ्त में शंकर को घर या पैसा दोगे, जब छोटे भाई बड़े होंगे तो फिर उन्हें हिस्सा दोगे, तब तुम कहाँ जाओगे ? क्या तुम्हारी आय इतनी है की सभी को जीवन भर देते रहोगे। हम लोग कहूँगा घर के आगे जो खली (परती) जमीन है उसे शंकर को उसके हिस्सा अनुसार दे दो, अगर वहाँ जमीन नहीं रहती तो कोई बात होती। सड़क पर पक्का और खपरैल  में हिस्सा लगा वहाँ भी तो शंकर का तुम लोगो ने बात माना ही, अब उसे भी तो तुम्हारी बात माननी चाहिए। उन लोगों के सलाह में शंकर का भाई ने हामी भर दी और हम लोगों का भी दिमाग ठनका और सोचने पर मजबूर हुआ। यह बात तो सही है। यह तो नाइंसाफी होगी और हम लोगो का सभी प्रयत्न पर पानी फिर गया। शंकर उनके सुझाव और बात को मानने से साफ इनकार कर दिया। उससे जैसे बन सका अपने भाइयों को आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान करने प्रयत्न किया। जिसमें वह आंशिक रूप से सफल भी हुआ। आज भी यह परिवार एक दूसरे से तनाव महसूस कर रहा है।

                            अब मैं शंकर के नाम पर सोचने को मजबूर हुआ। उसके माता-पिता शायद यह सोचकर उसका नाम रखे होंगे की यह भगवन शंकर की तरह भोलानाथ, सभी का उद्धारक होगा स्वयं कष्ट सह कर भी दूसरे का उपकार करेगा पर यहाँ तो उलटा हो गया शंकर तो तंगकर और भोलेनाथ धूर्तनाथ साबित हो रहें हैं , जो स्वयं आनन्द में रह कर दूसरे को कष्ट पहुँचाने का बीरा उठाया है। जिसने अपनी जननी को भी नहीं छोड़ा। उद्धधारक का कोई उल्टा (विपरीतार्थक) शब्द होगा तो ए उसको सार्थक कर रहा है। मैं सोचता हूँ अगर सभी पढ़े-लिखे लोग ऐसे होते हैं तो अनपढ़ होना ही अच्छा है। इनके बोल-बचन, इनकी सोच हमारे समाज को कहाँ ले जाएगी। इसे तो हम आधुनिकता के दौड़ में नैतिकता का पतन एवं मानसिकता दिवालियापन ही कहेंगे और क्या !इस पर थोड़ा आप भी विचार कीजिए एवं समाज को सही दशा-दिशा सोच प्रदान करने का प्रयाश कीजिए यह हमारा निवेदन है।
                         

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

* एह में *

                        विरेन्द्र बाबू अपने समय का डॉक्टरेट हैं। आज उनका उम्र ६०-६५ वर्ष के आस-पास होगा। वह जब भी अपने पास वाले या किसी से बात करते हैं तो उनका आवाज दूसरा व्यक्ति बिना प्रयत्न के शायद ही सुन सके। इस प्रकार बात करने का उनका अपना एक अलग ही पहचान है, धीरे बोलने या काना-फूसी करने में उनका नाम उपमा के रूप में इस्तेमाल होने लगी है। अब जब कोई धीरे बात करता है या दूसरे का बात करता है और अगला उसका आवाज नहीं सुन पाता तो कहता है, विरेन्द्र हुए हो। ए हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषा शुद्ध लिखने-बोलने के साथ एक अच्छे चित्रकार भी हैं। मैं इन्हें दोनों हाथों से लिखते हुए भी देखा हूँ। थोड़ा बहुत गा बजा भी लेते हैं। व्यक्तित्व भी अच्छी है। गेहुँआ गोरा रंग लम्बाई लगभग ६' (फुट) के आस-पास दोहरा बदन। कुल मिलाकर प्राकृति ने उन्हें लगभग एक परिपूर्ण इंसान बनाया, पर आज समाज में इनका कुछ अलग ही पहचान बन चूका है। 

                                बुजुर्ग लोग बताते हैं की वह जब पढाई कर रहा था तो इससे सिर्फ घर वालों को ही नहीं पुरे समाज को आशा थी की वह कुछ अच्छा करेगा। इन्हे उस समय अच्छा खिलाडी के तौर पर भी जाना जाता था। समय के साथ सारी आशा धूमिल होता गया, इनका नकारात्मक चेहरा सामने आता गया।

                         जब ए डॉक्टरेट की पढ़ाई कर रहे थे, उसी समय उस महाविधालय के एक कनिष्ठ अध्यणार्थी से इनका मेल-मिलाप बढ़ा, यह मिलाप आगे चल कर प्यार में बदल गया, फिर दोनों ने शादी की ईच्छा व्यक्त की। ऐसे इनके घर वालों ने ज्यादा विरोध नहीं किए। इनके पिता श्री ने कहा "पहले तुम अपना कैरीयर (भविष्य) बना लो फिर शादी जिस से मन करे कर लेना।"  वधु पक्ष यानि लड़की वाले इनके पिता श्री से कुछ ज्यादा ही विरोध किया। उन्होंने अपनी लड़की को समझाते हुए कहा तुम जिस से कहोगी जैसा घर-वर कहोगी, डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर जो सरकारी ओहदा प्राप्त हो या जमींदार घराने का हो वैसा घर-वर ढूंढूगा पर इस वेरोजगार में क्या रखा है। लड़की बोली मैं शादी करूंगी तो इन्हीं से नहीं तो मरना पसन्द करुँगी। इसी बिच विरेंदर बाबू वही एक गौर सरकारी महाविधालय में प्रोफेसर के तौर पर कार्य करने लगे। इनका शादी लड़की के जिद के कारण सम्पन्न हो गई। ए जहाँ पढ़ाते थे और रहते थे वहाँ, या यू कहें उस क्षेत्र में उनके सालों और ससुर का बोल-बाला था। वे जमींदार घराने के थे, जिस से उस क्षेत्र में उन लोगों का मलिन व्यक्तियों में गिनती होती थी। शादी के बाद उनके सालों को उनका वहाँ पढ़ना अच्छा नहीं लगा। उनका मानना था 'मेरा जीजा (बहनोई) एक गैर सरकारी महाविधालय में अनुबंध पर पढ़ाए ए हमारे शान के लिए अच्छा नहीं है।' उन्होंने उसी अंदाज में इसकी शिकायत अपने बहनोई (जीजा जी) से की और विरेन्द्र बाबू उनके कहने पर प्रोफेसरी छोड़ गाँव आ गए। आज वहीं महाविधालय सरकार की मान्यता प्राप्त कर चुकी है। साथ में उनके साथ वाले साथी भी उसी में स्थाई हो चुके हैं। आज अपनी स्थिति के लिए विरेन्द्र बाबू अपने सालों को कोसते हैं साथ में उन्हें भला-बुरा कहने से भी नहीं चूकते।

                         गाँव आ कर ए अपने क्षेत्र में सरकारी कोटा प्रणाली की दुकान चलाने लगे। कुछ समय बाद उनका यह धंधा भी बंद हो गया इसके बाद उन्होंने गाँव में एक अपना स्वयं का विधालय स्थापित किया। उस समय उस क्षेत्र में वह विधालय पहला गैरसरकारी विधालय था। विधालय में सरकारी विधालयों के अपेक्षा अच्छा पठन-पाठन था। अभिभावकों के विश्वास एवं सहयोग से उनकी विधालय अच्छी चल परी। उस से उन्हें अच्छी आय भी होने लगी तभी तो वे उस समय अपने नाम से भूमि खरीद कर वहाँ विधालय को स्थाननत्रित किया। उस विधालय ने उन्हें अपने क्षेत्र में सर जी का नाम प्रदान किया, साथ ही अब हर कोई उन्हें सर जी या मास्टर साहब के उप नाम से ही सम्बोधित करता है। सभी लोग उनके नाम को आदर से व्यक्त करते हैं। एक बार उनके विधालय के लिए अनुदान आया तथा उसे अर्द्धसरकारी शिक्षण संस्थान का मान्यता मिलने का चर्चा चल रहा था, जिसे उन्होंने माना कर दिया या यू कहें यह किसी कारण नहीं हो सका।

                             कुछ समय के बाद बाहर से एक व्यक्ति वहाँ विडियो हॉल चलाने आया। उसे वहाँ एक छोटा हॉल या यू कहे की एक बड़ा सा कमरा प्राप्त हुआँ, जिस में वह अपना भि०सी०आर० चलता। उसकी खूब कमाई होती, दर्शक इतना अधिक आते की उन्हें बैठाने के लिए उसके पास स्थान नहीं होता। जिसके कारण लोग हल्ला-गुल्ला भी करते  भि०सी०आर० वाले ने अब बड़ा हॉल ढूँढना शुरू किया। वह विरेन्द्र बाबू से सम्पर्क किया।  वह विरेन्द्र बाबू को, उनके विधालय में रात्रि के समय वीडियो हॉल चलाने के लिए राजी कर लिया। इस से लोगों में एक गलत सन्देश गया। लोगो में काना-फूसी होने लगी। लोगो का मानना था की विधालय एवं वीडियो हॉल एक ही भवन या एक ही प्रांगण में चलना उचित नहीं है। यह प्रतिक्रिया उन्हें मालूम भी हो गया पर वे इस ओर ध्यान नहीं दिए। भि०सी०आर० वाले ने उन्हें किराया न दे कर लाभ में उनका हिस्सा तय कर दिया, जो उन्हें उस समय विधालय के आय से ज्यादा दिखा। उन्हें उनका भविस्य नहीं दिखाई दिया। परिणाम स्वरुप विधालय धीरे-धीरे बंद हो गया। कुछ समय बाद वीडियो हॉल विभिन्न कारणों से बंद हो गया। वीडियो हॉल का बंद होने का मुख्य कारण लोगो का उसके प्रति आकर्षण कम होना और प्रशासन (थाना) द्वरा  बार-बार छापा मारी, क्योंकी वीडियो हॉल चलाने के लिए उनके पास कोई परमिट नहीं था। तदनुपरान्त भि०सी०आर० वाले ने उनका परिसर खाली कर दिया। वीडियो हॉल अब उतनी मुनाफे का सौदा नहीं रह गया। विरेन्द्र बाबू ने पुनः विधालय को शुरू किया पर अब पहले वाली बात नहीं रही। यह भी अब घाटे का सौदा साबित होने लगा। अब उनका बच्चे बड़े होने लगे खर्च बढ़ने लगा। धीरे-धीरे वे आर्थिक बदहाली के गिरफ़्त में आते गए। अब घर से शांति जाती रही। नित्य प्रतिदिन घर में कीच-कीच होने लगी। कलह की देवी ने घर में अपना निवाश बना ली। विरेन्द्र बाबू अब पत्नी और बच्चों के साथ मार-पिट भी करते। घर में आर्थिक तंगी दिनों दिन बढ़ती गई। बच्चियाँ व्याहने (शादी) योग्य हो गई। जमीन बेच कर वे उनका शादी कर दिए। जमीन से जो उपज (पैदावार) घर में आती थी, वह भी बंद हो गई। उनकी पत्नी अपने दो बच्चों के साथ पास के शहर में चली गई। उनका उद्देश्य था, बच्चों को किसी प्रकार पालना। विरेन्द्र बाबू को यह सब बहुत बुरा लगा। वे अपनी पत्नी और बच्चों को गाँव लाने का कई प्रयाश किए पर सफल न हो सके। वे शहर में भी जाकर उनलोगो के निवाश स्थान पर हो-हुज्जत करते, जिस वजह से वे लोग अब इनसे छुप कर रहने लगे। विरेन्द्र बाबू गाँव में अपनी प्रतिष्ठा चाहते थे पर व्यय के लिए आय का कोई उपाय नहीं कर पा रहे थे और उनकी पत्नी और बच्चें अब बदहाली में जीना नहीं चाहते थे। दिनों दिन वे चिड़चिड़ा होते गए अब वे अपनी कमी छुपाने के लिए दूसरों का अनावश्वक शिकायत करते रहते।

                            आज समाज में उनका एक असफल व्यक्ति के रूप में पहचान किया जाता है। वे किसी भी क्षेत्र में घर-परिवार समाज के कसौटी पर खड़ा नहीं उतर सके।

                              एक रोज किसी के पारिवारिक घटना पर गाँव में कुछ बुजुर्ग एवं अन्य लोग जुटे हुए थे। समस्या पर विचार विमर्श हो रहा था, सभी लोग अपना-अपना सुझाव दे रहे थे। उसी भीड़ में विरेन्द्र बाबू भी थे। उन्होंने भी एक सुझाव दिया और उसके समर्थन में बड़े-बड़े तर्क पेश किया। कुछ व्यक्तियों का नाम भी मिशाल के तौर पर दिया, जो सभी को गले के निचे नहीं उतर सका। वही एक ऐसे व्यक्ति भी थे, जिन्हें खड़ी बोली और कटाक्ष के लिए जाना जाता है। उन्होंने तपाक से कहा "ए विरेन्द्र तू भले ही एम०ए० होइबअ पर एह में नईखअ।" सभी लोग उनका चेहरा देखने लगे। पर विरेन्द्र बाबू फिर बोल पड़े, कैसे ? तो उसी वृद्ध व्यक्ति ने कहा अब हम को खोलना ही पड़ेगा। तू कहाँ सफल भईलअ, इतना सुन्दर शरीर, धंधा, प्रतिष्ठा सब गवा दिया, अपनी पत्नी और बच्चों को देख भाल नहीं कर सका, उनका भरण-पोषण नहीं कर सका अब कैसे कहु की तू 'एम०ए० होगे पर एह में(इसमे) नहीं हो' इस बात को सुन सभी लोग बिलकुल शांत हो गए। कुछ समय ऐसा लगा की वहाँ कोई है ही नहीं। सभी बस एक दूसरे को देखते भर रह गए।

                               आज सफल होना बहुत जरुरी है। सभी जगह सिर्फ किताबी ज्ञान या रचनात्मक कला एवं ललित कला ही काम नहीं आता। सफल होने के लिए व्यवहारिकता का होना बहुत ही आवश्यक शर्त है। अतः एम०ए० के साथ एह में भी होना जरुरी है। जिस से एक उद्देश्य पूर्ण, अर्थ पूर्ण सामाजिक दृष्टि से सही सफल जीवन पाया जा सके।



सोमवार, 14 दिसंबर 2015

* नाम *


                      आप आम लोगो को कहते सुना होगा, नाम से बड़ा धन कोई नहीं होता, आखिरकार यह नाम है क्या ? जिसे सभी लोग कमाना चाहते हैं। इस जगत में या यू कहें तो इस ब्रह्मांड में हर एक का कुछ न कुछ नाम है, जिसे किसी न किसी के द्वारा रखा गया है, जो बाद में आम प्रचलन में आ गया । जाती नाम, कुल नाम, वर्ग नाम के बाद भी हर एक का अलग से एक और नाम। नाम को उसके निर्धारित पहचान से जोड़ा जाता है।ऐसे पहचान के लिए शस्त्र बलों में या विशेष (गुप्त) टीमों में एक विशेष संख्या होती है, जिस से उनकी पहचान होती है।
                        
                        किसी का नाम देने या रखने के पीछे अलग-अलग मानसिकता कार्य करती है।लोग अपने बच्चों का नाम महात्मा, प्रसिद्ध व्यक्ति या जिसे वह आदर्श मानते हैं, उनके आधार पर पर रखते हैं। नाम देने या रखने के पीछे धार्मिक आस्था के साथ-साथ कुछ रुढ़ी या रीति-रिवाज भी काम करती है, जैसे किसी का देहांत शैशव या बाल अवस्था में हो जाता है तो वह अपने अगले शिशु का नाम उटपटांग रख देता है। जैसे - घुरफेकन , घुरबिनियाँ, डोमन इत्यादि। इन सभी बातों के साथ आम लोग खास कर जो गाँव में निवास करते हैं , ए लोग एक पेशा विशेष को भी नाम देते हैं। जिस से मालूम चलता है की उनके दिल में उस पद के लिए कितना लगाव एवं इज्जत है।इन विशेष प्रकार के नामों से स्पष्ट होता है कि ए लोग या तो अपने यहाँ किसी को उस पद पर देखना चाहते हैं या ए पद उनके लिए आदर्श हैं , जिसे वे पाना चाहते हैं किन्तु वे अपनी आर्थिक और समाजीक स्थिती के कारण नहीं प्राप्त कर पाते तो नाम से ही संतुष्ट हो जाते हैं।इस प्रकार के नामों में हवलदार, जमदार, सुबेदार, कर्नल (करनेल) , जरनल, वकिल, वैरिस्टर, जज, मास्टर इत्यादि हैं । नाम सोच समझकर ही रखी जाती है, जो अभिलेखों में भी संग्रहित हो जाती है।
                       
                     लोग जो जानवर(पालतू) पालते हैं, उसे भी एक विशेष नाम से पुकारते हैं।वह पालतू भी समझता है की अमुक प्रकार का आवाज (नाम) उसे ही इंगित करता है। कुछ लोग अपने पालतू को विशेष वजह से भी विशेष नाम देते हैं। कुछ लोग किसी विशेष बात पर कहते हैं, मेरे नाम का कुत्ता या जानवर पालना और ऐसा होता भी है।
         
                         कुछ लोगों का नाम हास्य परिहास में पर जाता है।जिसे हम व्यंग्य कह सकते हैं।आचार-व्यवहार से लोगों का पुकार का नाम प्रसिद्ध हो जाता है। जिसे कुछ लोग सम्मुख में तो कुछ लोग पिठ पीछे बोलते हैं। इस प्रकार के नाम से वह व्यक्ति जँहा रहता है , अपने समाज में एक पहचान बना लेता है। इस प्रकार के नाम को कुछ लोग पसंद करते हैं और कुछ लोग नापसन्द भी। कुछ लोग इसका विभिन्न तरीको से विरोध भी करते हैं। ऐसे नाम अभिलेखो में नहीं होते पर वहाँ के लोग उसे उस नाम से आसानी से पहचान जाते हैं।
                        हम यहाँ कुछ लोगों के विशेष नमो पर चर्चा करेंगे। मैं और मेरा दोस्त राजू इसी नाम विशेष पर चर्चा कर रहें थे। राजू लगातार हँसने लगा उसकी हँसी रुक नहीं रही थी तो हमने पूछा क्या हो गया ? राजू अपनी हँसी सम्भालते हुए कहाँ अरे भाई सरयू चाचा वाला हल हमारा , फौज में भी हो गया। हम क्या जानते थे की फौज में भी कटाक्ष वाली नाम चलती है। हमने कहा आगे वाली वाली बात तो बताओ उस रोज हुआ क्या ? हम आपको सरयू चाचा की कहानी बाद में सुना देंगे पहले राजू का सुन लेते हैं। राजू बताता है , "मैं अपनी ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) समाप्त कर यूनिट में गया। उस समय यूनिट फिल्ड में थी। वहाँ हेड क्वाटर (मुख्यालय) मध्य में तथा कम्पनियाँ वहाँ से दूर चारो दिशाओं में फैली होती है। हम हेड क्वाटर में गए वहाँ लोगो से मुलाकात और परिचय होने लगी एक सरदार साहब आए और हम लोगों से पूछे किस कम्पनी में पोष्टींग हुआ है। हमने अपनी कम्पनी बताई , फिर वे बोले अच्छा ! नाग रेड्डी के कम्पनी में जरा सम्भल कर रहना नहीं तो डस लेगा। हमने सोचा यह क्या मुसीबत है। अगले दिन हम वहाँ की सारी प्रक्रिया पूरा कर अपनी कम्पनी के लिए प्रस्थान कर गए। हमें छोड़ने के लिए यहाँ से एक टुकड़ी हमारे साथ हो ली और उधर से एक टुकड़ी हमें लेने आ रही थी , दोनों जब मिल गए तो मुख्यालय वाली टुकड़ी वापिस हो गई। वापिस होते समय उनमें से एक जवान ने कहा जाओ नाग रेड्डी तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा।  वहाँ से चलकर हम अपनी कम्पनी पहुँचे। हमने वहाँ देखा एक सरदार साहब बाहर खड़ा हैं। हमने अपनी बेग-बेडिंग उतारा , लाम्बा-लम्बा साँस लिया। हमें पिने के गुनगुना पानी मिला। इसी दौरान सरदार साहब हमारी परिचय लेने लगे। वे पूछे तुम्हारा सीनियर जे. सी.ओ. कौन है , हमने कहा 'नाग रेड्डी' , यह नाम सुनते ही वह भड़क गए और बोले किस ने बताया , हमने कहा निचे एक साहब ने बताया था। वह सोच रहे थे ,जो पार्टी लाने गया था , वो बताया होगा , पर ऐसा नहीं था। वह मुँह बनाते हुए बोले "सी. एच. एम. इनका क्लास लो" एक मोटा सा व्यक्ति जो पहले से हीं वहाँ खड़ा था। कासन बनाते हुए हमें समझाने लगा। वह हमें सजा भी लगाया। वही हमें ऊपर से निचे सभी रैंक धारी ओहदेदारों का नाम बताया। हमें तो साँप ही सूंघ गया फिर हमें समझ आया , ऐ तो सरयू चाचा वाली बात है। हमें अंदर ही अंदर हँसी आने लगी, जिसे हमने दबाए रखा। सरदार साहब और सी. एच. एम. के जाने के बाद हम सभी हँस पड़े।

                         अब आप को सरयू चाचा वाली बात बताये देते हैं। सरयू चाचा शहर में नौकरी करते थे। जब गाँव आते तो गाँव के लोग , वहाँ के रीती रिवाज के अनुसार उनका भी अभिनन्दन करते। जैसे कोई प्रणाम चाचा , प्रणाम भईया , प्रणाम दादाजी इत्यादि अपने रिश्ते और उर्म के अनुसार प्रणाम के साथ एक रिस्ता लगा देतें हैं। इसी दौरान हमारा एक दोस्त पंकज यही हमारे गाँव में हीं रहने लगा। यहाँ उसका अपना ननिहाल है। वह अपने रिश्ते के अनुसार ही लोगों को मामा , नाना ,भईया कहता था। एक रोज हुआ यु की हमलोग खेल रहे थे। सरयू चाचा उसी रास्ते से आ रहे थे। पंकज आगे बढ़ कर बोला प्रणाम मामा , फिर क्या था , सरयू चाचा ने पंकज को मारने के लिए दौरा लिया , विभिन्न प्रकार के अपशब्दों का उच्चारण करते हुए गाली बकने लगे। उस समय हम बच्चों को मालूम नहीं चला, पर बाद में हम समझ गए की वे मामा कहने के कारण गुस्सा हुए थे। फिर क्या था जब वे किसी रास्ते से जाते और किसी लड़के का उन पर नजर पर जाता तो वो छुप कर उन्हें मामा कह देता। लड़का अगर दिख जाता तो मरने के लिए दौड़ाते या फिर गाली-गलौज करते। धीरे-धीरे उनका यह नाम मशहूर हो गया। वे अब बच्चों और बड़ो सभी के लिए हास्य का एक पात्र बन गए। उनका यह नाम उनके क्षेत्र (गाँव-जेवार) में मशहूर हो गया।

                           हमने कुछ ऐसे पुकार नाम वाले सज्जन भी देखें , जिसे बोलने पर वे प्रसन्न होते हैं। हमारे बगल के ही एक सज्जन हैं। ऐसे उनका वास्तविक नाम से भी लोग परिचित हैं पर लोग उन्हें साहेब के नाम से सम्बोधित करते हैं। लोगों से हमने सुना है उनका परिवार पहले सुखी-सम्पन्न था , पर जब से हमने होश सम्भाला है , हमने उनके पास अभाव ही अभाव देखा है। वे अपना जीवन किसी तरह मांग-चांग कर गुजर-वसर करते हैं। लोग जब उन्हें साहेब कहते हैं तो वे शायद अपनी पुराने दिनों को याद कर प्रसन्न होते होंगे।

                            हमारे पास में ही एक बड़ा बाबू हैं बेचारे अभी तो बेरोजगार ही हैं , शायद उन्हें अब कोई रोजगार मिलने की सम्भावना भी नहीं भी है। उनके पिता श्री को पेंसन मिलता है और कास्तकारी से जो थोड़ा-बहुत आय होता है उसी से उनका और सम्पूर्ण प[परिवार का भरण-पोषण हो रहा है। गाँव में जब कभी भी कोई सामाजिक कार्य या कोई उत्सव , पूजा , त्यौहार मनाया जाता है तो वे उस में सबसे ज्यादा सक्रिय रहते हैं , उस विधि-व्यवस्था में वे सचिव, अध्यक्ष या कोषा अध्यक्ष होते हैं। इसी वजह से लोग उन्हें बड़ा बाबू कह कर पुकारते हैं और वे इस से प्रसन्न भी रहते हैं।

                                 एक सज्जन हैं नाम है रघुवर यादव। वे हमारे गाँव (ग्राम) का चकूदार हैं। ऐसे गाँव में परम्परा है आम लोग अपने उर्म के अनुसार रिस्ता तय कर लेते हैं या जिनके बड़े-बुजुर्ग जिस रिश्ते से किसी को बुलाते हैं तो उस घर के अन्य छोटे सदस्य भी अपना रिस्ता की कड़ी तय कर लेते हैं। जब कुछ लोग साथ वाले होते हैं तो नाम से भी काम चलाते हैं। रघुवर यादव के साथ भी यही हुआ। अब इनके साथ वाले एवं कुछ उर्म में छोटे लोग जो पद पर उनसे उच्चे हो गए तो उन्होंने सोचा इन्हें नाम से या चकूदार कह कर बुलाना ठीक नहीं है। एक रोज किसी ने उन्हें किसी काम से बुलाया था और वे नहीं गए या नहीं जा सके तो लोगों ने उन्हें उलाहना वस  ही दरोगा साहेब और दरोगा जी के नाम से ससम्बोधित किया। उसके बाद ए उनका उप नाम ही हो गया , अब हर कोई उन्हें दरोगा जी तो कोई दरोगा साहब कह कर बुलाता है। वे प्रसन्न भी रहते हैं।

                               अब मैं आपको एक जानी-मानी कहानी सुनाता हुँ। आप ने इसे जरूर कहीं न कहीं पढ़ा होगा या सुना होगा। अगर न पढ़े हैं और न सुने हैं तो यहाँ पढ़ लीजिए। एक सज्जन थे। वे सभी तरफ से सुखी-सम्पन्न थे। उन्हें किसी प्रकार का कोई हैरानी-परेशानी , कष्ट-कलेश या चिंता-फ्रिक नहीं था। एक बार वे अपने उधान में आराम कुर्सी पर बैठ कर प्राकृति का छठा निहारते हुए आनंद ले ले रहे थे और उस दृश्य में पूर्ण रूपेण तन्मय थे। एकाएक अपना नाम सुन कर उनका ध्यान भंग हुआँ। कोई बगल से उन्हें उनका नाम से बार-बार पुकार रहा था। वे अपना नाम सुन खिज्झ गए। वे बुदबुदाते हुए बोले घर वालो को और कोई नाम मेरे लिए नहीं मिला था। मेरे पास क्या नहीं है सिर्फ एक अच्छा सा नाम छोड़ कर। फिर वे चिंतित रहने लगे , हर समय नाम पर ही सोचते रहते।वे हर समय खोए-खोए रहने लगे। उनका हालात दिनोदिन विक्षिप्तों जैसा होता जा रहा था।चिंतित रहने के कारण उन्हें अनेकों परेशानियाँ सताने लगी।

                                   एक रोज प्रातः काल वे नित्य क्रिया सम्पन्न कर घर से अपने नाम पर ही सोचते और चिंतन करते हुए निकल पड़े , रास्ते में वे हर मिलने वाले से उसका नाम पूछते , जिस में से जो उन्हें अच्छा , सुन्दर और उचित लगे उसे वे अपने लिए चुन सके। इसी दौरान उन्हें एक शव यात्रा दिखाई दिया तो उन्होंने सोचा पहले स्वर्ग वाशी का ही नाम पूछा जाए। शव यात्रा में जा रहे लोगो से से उन्होंने उसका नाम जानना चाहा। लोगों ने उसका नाम अमर बताया तो वे झेप गए और आगे बढ़ गए। आगे कुछ लोग खेत-खलिहान में काम कर रहे थे। उनमे एक व्यक्ति पुवाल बुन रहा था। उस सज्जन ने उसके ओर मुखातिब हो कर उसका परिचय पूछा , वह अपना नाम धनपत बताया। वे वहाँ से बुदबुदाते हुए आगे बढ़ गए। सामने एक दूसरी वस्ती थी ,वहाँ धुप में कुछ बच्चे खेल रहे थे। उसी में एक लड़की भी थी। उसके तन पर उस मौसम के अनुसार समुचित वस्त्र भी नहीं था।  उस सज्जन ने उसी लड़की से उसका नाम पूछ बैठे , वह अपना नाम लक्ष्मीनिया बताई। फिर क्या था उनके मुख से अन्नयास ही निकल परा - 
 " अमर को मैं मरते देखा
 धनपत बुनत पुआल 
लक्ष्मी के तन वस्त्र नहीं 
   सबसे अच्छा मैं ठठपाल। "
और हस परे। अपने आप से वे कहने लगे पुकार के नाम और अभिलेख के नाम से कुछ नहीं होने वाला है। नाम में क्या रखा है सब तो काम में ही है। मुख्य नाम तो काम है। वे नाम के द्वन्द को अपने मन से निकाला और चिंता मुक्त हो गुनगुनाते हुए अपने घर वापिस चल दिए। अब उन्हें अपने नाम से किसी प्रकार का कोई सिक्वा-शिकायत नहीं था , न घर वालो के प्रति कोई उलाहना। 

                           मेरे बंधू इस प्रकार नामो में कुछ नहीं रखा है। मनुष्य का कर्म प्रकष्ठा ही उसके नाम को उत्कृष्ट बनाता है। व्यक्ति द्वारा किया गया कर्म ही नाम को सिद्धि प्रदान करती है। यथा सिर्फ नाम पर न जाए। सुख-शांति , समृद्धि आपको अपने कर्म से प्राप्त होंगी। 



शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

* मालती चाची *

                   मोनू मालती चाची के सामने पला-बढ़ा और युवा हुआ । उस पर मालती चाची का आच्छा-खासा प्रभाव भी परा । जब वह पाँच (५) वर्ष का था मालती चाची ३५-३७ वर्ष की होंगी। आज मोनू २५ वर्ष का है। 

                   मोनू बताता है जब से वह होश सम्भाला है तब से मालती चाची की दिनचर्या देख रहा है। उस में खास बदलाव नहीं है। वह सुबह उठती है घर में गाये हैं उन्हें बाहर निकलवाती उन्हें चारा डालने या डलवाने के वाद नित्य क्रिया पूर्ण करती , बच्चों के लिए नाश्ता-खाना बनाती उन्हें तैयार कर विद्यालय भेजती , बच्चों को विद्यालय भेजने के वाद चाचा जी आते तो उन्हें खाना देती और सौ बात सुनाती निकम्मा , निठ्ठला न जाने क्या-क्या कहती। सभी का कपड़े  साफ करती साथ में गाय का गोबर का उपला (गोइठा) भी बनाती। और सारे काम करते-करते डेढ़ से दो बज जाता उसके बाद स्नान आदि कर पूजा-अर्चना करने के बाद अन्न ग्रहण  करती। अगर इन सारी क्रिया-कलापो को जल्दी-जल्दी निपटाती फिर भी दिन के बारह  बज ही जाते। उनका सुध लेने वाला कोई नहीं था। 

                     आम तौर पर देखा जाता है , गाँव की मध्यवर्गीय औरतें रास्ते के बगल में बैठ कर गप्पे मारती रहती हैं , जिन्हे न तो कोई काम है न कोई चिंता बस दूसरे की शिकवा-शिकायत लिए बैठी रहती हैं। इन सब बातों से मालती चाची दूर थी , ए न तो किसी के यहाँ अनावश्यक जाती थी न कहीं बैठका लगाती थी , जो इनके उर्म ढलने के बाद भी बना रहा , इनका व्यवहार औरतों के बीच चर्चा का विषय-वस्तु भी रहती। 

                     आज वह अपनी घर की आर्थिक स्थिति एवं दिनचर्या के चलते चिरचिरा स्वभाव की हो गई हैं। पास-पड़ोस वाले बताते हैं , इनका शादी एक सुखी सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनकी शादी हुई तो गाँव-जेवार (इलाके,क्षेत्र) में शोर था। वह शोर समय के साथ शान्त हो गया। इनके पतिदेव जो पहले सरकारी कर्मचारी थे , उसे छोड़ कर वे घर आ गए और गाँव के राजनीती में रहने लगे , जिस से आमद कम खर्च ज्यादा होने लगी , बच्चें बड़े होने लगे दिनों-दिन खर्च बढ़ने लगी , घर का हालात पतली होती गई , साथ में चाची जी के स्वभाव में भी खासी परिवर्तन होती गई। 

                         चाचा जी घर से दूर एक बैठका बना रखे थे , जिसे गाँव देहात में दलान कहते हैं। वे वही रहते थे। अब जब भी चाचा जी घर आते तो चाची जी से नोक-झोक होती , पर उनमें कभी भी मार-पिट नहीं हुआ , चाची जी कभी-कभी बहुत बोलती और पूरा घर सर पर उठा लेती। उस समय चाचा जी कुछ नहीं बोलते बस मुस्का कर चुप-चाप चल देते। चाची जी का बस इतनी सी ख्वाइस थी की बच्चो का सही से पालन-पोषण हो सके पर गाँव में वो भी राजनीती में इतना आमद कहाँ की जिस से घर गिरहस्ति चल सके। समय बीतता गया बच्चे बड़े हो गए , बच्चियाँ शादी योग्य हो गई। चाची जी अब बच्चियों के शादी के लिए घर-वर ढूंढने के लिए चाचा जी पर दबाव बनाने लगी। वह दूसरे लोगों और रिश्तेदारों के मदद से विभिन्न उद्यापन कर घर चलाती थी। ऐसे वह पहले देखा भी था और लोगों से सुना भी था , चाची जी बहुत कम बोलती थी पर बच्चें-बच्चियों के बड़ा होने के साथ वे गाली भी निकालने लगी थी , जिसका अपेक्षा उन से नहीं था। 

                        चाचा जी अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार घर-वर ढूंढ कर , बच्चियों की शादी कर दिए , जिसके लिए उन्होंने कर्ज भी लिया और जमीन भी बेचे। लड़कियाँ अपने ससुराल चली गई। एक रोज चाची जी अपने दरवाजे पर बिलकुल शांत बैठी थी। मोनू उनके पास गया और उनके बगल में बैठ गया , वह सम्भलती हुई उसके लिए पीढ़ा ले आई। उन दोनों में बात होने लगी फिर मोनू ने चाची जी से पूछा , चाची एक बात पुछे बुरा तो नहीं मानोगी , चाची बोली पूछो बुरा क्यों मानूंगी वो भी तुम्हारी बात को जो कभी अनावश्यक बोलता नहीं तो अनावश्यक कुछ पूछेगा नहीं। उसने पूछा "आप अपने जवान लड़कियों को  इतनी गन्दी-गन्दी गली क्यों निकालती थी ?" उनका आँख भर आया वह आँखो के आशु को पोछती हुई बोली "बेटा कोई माता-पिता अपने बच्चों को डाँटना भी नहीं चाहते पर क्या करें गाली भी निकालनी पड़ती है , कोई बड़े कुल या जात में सिर्फ जन्म लेने से बड़ा थोड़े ही हो जाता है उसे उसके अनुसार आचरण एवं कर्त्वय भी निभानी पड़ती है और अपना कर्म करनी परती है। तुम नहीं समझोगे गरीब आदमी चाण्डाल के बराबर होता है। ए जो पापी छुधा (पेट) है , इसके आगे बड़े-बड़े लोग घुटने टेक देते हैं , यह विभिन्न पाप और कुकर्म के लिए प्रोत्साहित करती है और हमें इसी का डर लगी रहती थी , कहीं हमारे बच्चे भी एसा न कर दे , जिस से वंश कुल में दाग लग जाए और हम कहीं भी मुख दिखाने लाईक न रह पाए , हमारा मानना है , दाग ले कर जीने से मरना भला है। मैं तो अपने सामर्थ के अनुसार इनकी आवश्कयता पूरी करती हीं थी पर मैं गाली-गलौज या ताना मार कर इनके विचार और संगती को नियंत्रण करना चाहती थी। जब ए खुद गार्जियन हो जाएंगे तो सब समझ जाएंगे। " चाची अपने दोनों होठो को दबाते हुए अपनी भाऊकता छिपाने की कोशिश करने लगीं।

                      समय अपने चाल से चलता रहा , चाची जी के लड़के कमाने लगे पर चाची जी के व्यतिगत जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया। उनका पहला लड़का उनकी जरुरतो और अरमानों से कोई खास सरोकार नहीं रखता पर दूसरे का उनके साथ जुड़ाव बना रहा , वह उनहे खुश रखने का प्रयत्न करता और चाची जी पहले से ज्यादा खुश भी रहती। चाची जी के स्वभाव में एक आदत और थी वह धार्मिक प्रवृति की महिला थी , धर्म में उनका पूर्ण आस्था एवं विश्वास था वह अपने दरवाजे पर आए किसी भी जरूरतमंद या साधु-सन्यासी को रुष्ट नहीं करती , अपनी सामर्थय के अनुसार उन्हें दान-दक्षिणा और जरूरत की सामग्री उन्हें देती। इसी बीच चाचा जी बीमार रहने लगे, उपड़ से मध सेवन से बाज नहीं आते। उनके दावा के लिए अच्छा-खासा नगद राशि व्यय हो रही थी। उनके सेवा में चाची जी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती पर वे (चाचा जी) भी आदत से मजबूर थे और अपनी मनमर्जी करते। दूसरा लड़का जो चाची जी से जुड़ा हुआ था वहीं सारी खर्च का निर्वाहन करता था। चाचा जी बहुत सरे कर्ज भी ले रखे थे , जिसका देनदारी भी चुकाना पड़ता था।  एक रोज चाची जी , चाचा जी का किया हुआ पोटी साफ कर रही थी और उन्हें कोस भी रही थी। जवानी में कुछ कमाया नहीं , एक लड़का कमा कर दे रहा तो उसकी सारी कमाई ए ही खा जा रहें हैं , पूरा जीवन परिवार को पेर कर छोड़ दिए , पता नहीं इनसे बच्चों को कब छुटकारा मिलेगी। उस समय ऐसा नहीं लग रहा था की चाचा जी ज्यादा दिन इस मृतलोक में निवास कर सकेंगे। मोनू उसी समय चाची जी से पूछ दिया चाची जी आप चाचा जी को इतना कोस रही हैं , न जाने क्या-क्या कह रही हो , अगर चाचा जी इस लोक से चले गए तो आप कैसे रोइएगा। एसे इस टोला में विधवाओं का संख्या कम नहीं है। चाची जी बोली भाग मुदईया मैं क्यों रोउ। दूसरे दिन मोनू चाची जी के पास गया उनके चरण स्पर्श कर कहा मैं शहर काम करने जा रहा हूँ , मेरी नौकरी पक्की हो गई है। चाची जी बोली जाओ खुश रहो और मन से काम करना और मस्त रहना।

                      आज दिनांक  १०/१२/२००८ को  मोनू दोपहर बस से उतरा और मिठाई का डब्बा लिए मालती चाची के दरवाजे पर पहुँचा तो देख रहा है , वहाँ लोगों का हुजूम लगा हुआ है , सभी कुछ-न-कुछ चर्चा कर रहें हैं ,  कोई कह रहा है किसे जाना  था और कौन चला गया , सक्षात देवी थी , बेचारी सुख का मर्म नहीं जानी ,मर्द तो कमाया नहीं , बड़ा बेटा भी साथ नहीं दिया , यह इस घर की लक्ष्मी थी , यह अपने आप भूखा रह आए हुए आगंतुको , पांडा-पुजारी , भूखे को भोजन करा देती थी। मोनू भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा और आँगन में गया तो देखा मालती चाची लेटी मुस्का रही हैं और अभी बोलने वाली है। वह उनके पैर पकड़ कर बैठ गया , वह जैसे ही बैठा उसे लगा चाची जी उसके कंधे  हाथ रख कह रही हैं : देखा , अब तुम क्यों रो रहे हो ए तो शाश्वत सत्य है। मैं तुम लोगो के दिल में हूँ ,क्या यह कम है। मोनू रोते हुए हस दिया। अब उसके जेहन में उनके द्वारा कही गई सारी बातें कौंधने लगी जो शायद पहुँचा हुआ साधु-संत और ज्ञानी भी नहीं बता सकता। सचमुच मालती चाची एक कर्म योगिनी थी। उन्हें मेरा सत-सत प्रणाम। 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

* जो सोचा वो पाया *

                 आप ने हमारी आलेख "हम ऐसा क्यों हैं " पढ़े होन्गे ,  नहीं पढ़े हैं तो कोई बात नहीं। यह आलेख इसी ब्लॉग का एक पाठ है। उस आलेख में हमारी स्थिति के लिए कौन एवं क्यों जिम्मेवार (जवाबदेह) है को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। 
                  आप ने सुना होगा 'जस करनी तस भोगही दाता , नरक जात अब क्यों पछताता ' । यह उद्धरण तब इस्तेमाल किया जाता है , जब कोई गलत कार्य करता है और उसका उसे गलत परिणाम जब प्राप्त होता है तो उसे अफ़सोस होता है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने एक दोहा लिखे हैं :- 

                                                        "कर्म प्रधान विश्व करी राखा। 
                                                      जो जस करनी तासु फल चाखा।। 
आप को हम यहाँ बताते चले की सोच भी एक प्रकार का कर्म है। हम जैसा सोचेंगे वैसा ही होगा , इस में दो राय नहीं है। यह अनुभव की बात है। आप ने देखा होगा कोई लड़का दिन-रात पढ़ाई में लगा रहता है पर उसे आसानी से सफलता नहीं प्राप्त होती। वह सफल तो होता है पर उसे उसके परिश्रम के अनुसार फल प्राप्त नहीं होता। इसका एक ही कारण है सोच। वह सोचता है पास होऊंगा या नहीं। अमुक प्रश्न आएगा की नहीं। मुझे सारे उत्तर याद नहीं होते इत्यादि। ए जितना भी नहीं है उसके अंदर नकारात्मक ऊर्जा पैदा करते हैं। उसे प्राप्त होने वाले परिणाम के प्रति प्रतिकूल स्थिति पैदा करते हैं। जैसे परीक्षा के समय उसका बीमार हो जाना ,पैटर्न का परिवर्तन हो जाना , अंतिम समय में गलत निर्देश प्राप्त कर लेना इत्यादि।

                         जैसा की हमें ज्ञात है। यह सृष्टी आकर्षण से बंधी है अगर यह आकर्षण क्षिण या समाप्त हो जाए तो सम्पूर्ण सृष्टी विनिष्ट हो जाए। हम यहाँ एक ईट को ले जिस से मकान ,घर ,भवन इत्यादि का निर्माण होता है। आप कहेंगे यह कौन नहीं जनता। क्या ? आपने कभी यह सोचा की यह ईट या कोई ईट अपना आकर कैसे रख पाता है। जवाब है वह अपने विभिन्न पदार्थो के कणो के आकर्षण से। ठिक उसी प्रकार जब कोई सोचता है तो वह अपने आस-पास एक चुंबकीय गुण विकसित करता है , जो अपने सदृश्य स्थिति , परिस्थिति को आकर्षित करता है। जो सफलता असफलता के गुण दोष को निश्चित करता है। आप कहेंगे की कोई अपनी असफलता के बारे में कैसे और क्यू सोचेगा ? पर यह सत्य है। लोग सोचते हैं अमुक काम होगा की नहीं। मैं अब्बल होऊंगा की नहीं। उनके यही सोचने का तरीका और शंसय उनमे नकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सफलता के लिए पहले आपको अपनी सोचने की तरीका बदलने की आवश्यकता है। कुछ लोगो को आपने यह कहते हुए सुना होगा , अमुक व्यक्ति सपने में भी एसा नहीं सोचा होगा की वह यह पद प्राप्त कर पाएगा या जीवन में उसे इतनी सफलता मिलेंगी। यह कथन गलत है , पहले आप उस व्यक्ति के नजदीक जाइए उसके अन्तःमन की बात जानिए तो आपको ज्ञात होगा की वह हर वक़्त या मन ही मन ताना-बाना बुनता रहता था। वह समय अनुकूल प्राप्त होने पर चुकता भी नहीं था।

                        आपने सुना या पढ़ा होगा की बिहार का एक मध्यवर्गीय शिक्षक कौन बनेगा करोड़पति में पाँच करोड़ जित कर रातो-रात करोड़ पति बन गए। कई लोगो को आपने यह कहते सुना होगा की वह सपना में भी नहीं सोचा होगा की वह करोड़पति बन जाएगा। पर यह गलत है , जरूर उनके अंदर धन ,सम्पति , वैभव प्राप्त करने की सकारात्मक विचार रही होगी जो स्थिति को उनके समक्ष ला कर खड़ा कर दिया और उन्हें  उसका पूरा लाभ प्राप्त हुआ या यु कहे की उन्होंने स्थिति का भरपूर उपयोग किया। अब आप कहेंगे की मैं परीक्षा में फेल  नहीं होऊंगा में नकारात्म सोच कहा है ,पर यह सोचने का सही तरीका नहीं है। प्राकृति एक बच्चा (शैशव) के समान है। हम जब किसी बच्चे  (शिशु) को कोई शब्द या वाक्य सिखाते हैं तो वह पहले अंतिम अक्षर या शब्द को पकड़ता है , ठीक उसी प्रकार प्राकृति के साथ भी है। जब कोई अंत में नहीं का उच्चारण करता है तो वह उसे आकर्षित कर लेता है और उसके अनुसार ही हमारे समक्ष स्थिति उत्पन्न होती है।

                         आप कहेंगे की मैं अमुक बात कब से सोच रहा हूँ , वह कहाँ संपन्न हो रही है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है की हमारी सोच-विचार पल-पल परिवर्तीत होती रहती है। हम जानते हैं की किसी कार्य को सम्पन होने के लिए बल की आवश्यकता होती है। यहाँ भी कार्य (फल) बल सिद्धांत से जुड़ा है। हर कार्य को सम्पन होने के लिए एक निश्चित मात्रा में साधन और ऊर्जा चाहिए। जब तक ए दोनों उचित मात्रा में उपलब्ध नहीं होंगे विचार वास्तविक रूप नहीं ले सकती। आपने वेग पढ़ा होगा , प्रकाश ,हावा , ध्वनी का वेग भिन्न-भिन्न माध्यमों में भिन्न-भिन्न होता है। पलायन वेग भी आपने पढ़ा होगा , जब पलायन वेग (१५ किलोमीटर / सेकण्ड )  से कोई वस्तु गति करती है तो वह पृथ्वी से दूर चली जाती है। यानि पृथ्वी के गुरूत्व बल के परे। उसी प्रकार सोच-विचार का भी वेग होता है। जब ज्यादा तेजी से सोच-विचार बदलता है तो वह हमसे पलायन कर जाता है। उस पर न तो हमारा नियंत्रण होता है और वह हम पर न कोई प्रभाव कर पाता है। जब हम एक निश्चित गति से सोच को निरन्तर बनाए रखते हैं तो वह कार्य में परिवर्तीत होनें के लिए यथा स्थिति उत्पन्न करती है। हम यहाँ सोच को कार्य रूप में परिवर्तीत होने के लिए एक तथ्य और रख सकते हैं। हम सभी धरातल पर भूमि के निचे से जल निकालने के लिए कुआँ खोदते हैं , या पाईप गाला कर चापाकल या नल लगाते हैं। आपने देखा होगा धरातल पर प्रत्येक स्थान पर इसका स्तर अलग-अलग होता है। स्वच्छ जल के लिए या जल की प्रचुरता के लिए आवश्यकता परने पर और गड्ढा खोदते हैं या पाईप को और गलाते हैं। ठीक सोच के साथ भी एसा ही है। सोच का कार्य रूप में आने के लिए उसके उत्कृष्ठा के अनुसार निरंतरता की आवश्यकता होती है। सोचने वाले की दृढ़ता , आत्मबल , उसकी क्षमता (क्षमता में शारीरिक ,मानसिक , बौद्धिक , आर्थिक इत्यादि सभी ) जो उसके पास उपलब्ध है , उसे प्रभावित करती है।

                        इस सिध्दांत के सिध्दि के लिए एसे तो हम आपको बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ पर यहाँ मैं आपके समक्ष (सामने) जो उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ , वह विल्कुल अनुभव किया गया है। प्रस्तुत उदाहरण शिर्षक जो सोचा वो पाया को सत्य सिध्द करता है।

                         राजू बिहार प्रान्त के जिला-भोजपुर का निवासी है। वह मध्यवर्गीय परिवार से है। जब वह पंद्रह-सोलह वर्ष का था , उसकी घर का आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जिसके कारण वह जल्दी से जल्दी कही काम पर लगना चाहता था। वह गाँव का रहने वाला था। इसलिए उसे विशेष मार्गदर्शन भी प्राप्त नहीं हुए। गाँव में ज्यदातर लोग सस्त्र बल (बेल्ट सर्विस) से जुड़े हुए थे ,जिस कारन उसी के लिए उसे मार्गदर्शन प्राप्त था। उस समय बिहार पुलिस में ऊचाई का बड़ा महत्व था या यू कहे की नियुक्ती भी लम्बाई (उच्चाई) के आधार पर ही होता था। राजू का लम्बाई उस समय १६७सेमी थी इसलिए वह पुलिस के लिए कभी सोचता भी नहीं था। उसे अपना भविष्य सेना में दिखाई दिया , उस समय सेना में सत्रह वर्ष आयु से कम के अभियर्थियों को उच्चाई में छूट प्राप्त था। उसी समय उसके साथ कुछ लोगों ने एसा बोल-वचन किया जो उसके दिल को महसुस हुआ यानि लोगों की बातों को वह दिल में ले लिया। वह बताता है की जब वह सड़क के किनारे व्याम कर रहा था तो उसके चाचा जी ने कहा चकुदार बनोगे का ? साथ ही उस समय गाँव में एक तुक कहा जाता था , " बेचो तरकारी या करो नौकरी सरकारी "  और एक तुक था  " प्राइवेट नौकरी एवं प्राइवेट छोकड़ी का क्या ग्रान्टी नहीं कब साथ छोड़ दे "। राजू शारीरिक रूप से भी विलकुल बच्चे की तरह था। वह बताता है की इन सब कारणों से वह मन ही मन निश्चय किया की वह नोकरी करेगा तो सरकारी वो भी सेना में। वह रात-दिन उसी के सम्बन्ध में सोचता , वह भर्ती के लिए जरुरी कागजात बनवाया तथा शारीरिक (फिजिकल) और लिखित परीक्षा का पूर्ण तैयारी कर लिया। वह लगभग पाँच से ज्यादा नियुक्ती प्रक्रिया में सम्मिलित हुआ ,वह कही भी कागजात ,शारीरिक (फिजिकल) और लिखित परीक्षा में नहीं छटता था। वह छटता था तो चिकित्सीय जाँच में। इसी दौरान वह सत्रह वर्ष पार कर गया , अब उसे उर्म के अनुसार लम्बाई में मिलने वाली छुट नहीं प्राप्त हो सकती थी। वह ट्रेड मैन भी बनना चाहता था। वह कहता था हमें कोई भी सरकारी नोकरी चाहिए। पहले से भी और भर्ती प्रक्रिया के दौरान भी उसे ज्ञात हुआ की सैनिको के पुत्र को लम्बाई में विशेष छूट प्राप्त होती है। उसके पिता श्री पहले सेना में कार्यरत थे , अपरिहार्य कारणों से वे लगभग सात वर्ष ही सेवा दिए और उसके वाद स्वेक्षा से से लिख कर सेवा निवृत हो गए थे। इसी दौरान राजू को सैनिक कल्याण बोर्ड का पाता चला , जो पूर्व सैनिकों के लिए कार्य करती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है की उसके पिता जी कभी भी इस विषय-वस्तु पर कोई वर्तालाप नहीं करते थे। राजू उनका सेवा से निवृति पुस्तिका (डिस्चार्ज बुक) देखा था। इसी सिलसिले में वह अपना एक सहपाठी से बात किया जो उस से उर्म और तजुर्वा दोनों में बड़ा था।वह भी एक पूर्व सैनिक का पुत्र था।  उसके पास सैनिक कल्याण बोर्ड के द्वारा निर्गत किया गया रक्त सम्बन्ध (रिलेसन सर्टिफिकेट) था , जिसके आधार पर वह भर्ती प्रक्रिया में विशेष छूट प्राप्त करता था। राजू ने जब उससे पूछा तो वह सम्पूर्ण प्रक्रिया बताने के बाद कहा तुम्हारा यह कागजात नहीं बन सकता , क्यूकी तुम्हारे पिता जी नौकरी छोड़ कर आ गए थे। तुम्हें जेल भी जाना पर सकता है। राजू सोचने लगा अब क्या किया जाए। उसकी आर्थिक स्थिति उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी। वह मन ही मन सोचा एसी जीवन जीने से अच्छा है की जेल ही चला जाऊ , वहाँ भर पेट खाना तो समय से मिल जाएगा। वह मन ही मन निश्चय किया की वह सैनिक क्ल्याण बोर्ड जरूर जाएगा। राजू अपने पिता जी को बिना बताए उनका सेवा निवृति पुस्तिका (डिस्चार्ज बुक) और उनका नौकरी से सम्बंधित दूसरे सभी कागज़ ले कर पास के शहर में जहाँ सैनिक क्ल्याण बोर्ड था वहाँ गया। वही के एक कर्मचारी को वह सारी कागजात दिखा कर सारी स्थिति बतलाया उस व्यक्ति ने उसे निर्देश दिया और बताया की इस टेबल पर एक साहब आएंगे उन्हें सिर्फ डिसचार्ज बुक दिखाना और अन्य कागज अपने पास रखो। उस टेबल पर एक व्यक्ति आया तो राजू ने उन्हें डिसचार्ज बुक दिखा कर सारी बात बताई तो वह व्यक्ति बोला तुम्हारे पिता जी कहाँ हैं। राजू बोला घर पर , फिर वह व्यक्ति बोला उन्हें ले कर आना , उनसे एक आवेदन लिखवाना जिस में विषय होगा , वह तुम्हारा रिलेशन सर्टिफिकेट चाहते हैं , साथ में तुम अपना दो पासपोर्ट साइज फोटो प्रखण्ड विकाश पदाधिकारी से अटेस्टेड राउंड स्टाम्प के साथ करा कर लाना।  जिस पर लिखा होगा की तुम इनके पुत्र हो। राजू घर आ गया और ए सम्पूर्ण बात अपने  पिता जी को बतलाया ,उसके पिता जी बोले मुझे सेना से कुछ नहीं लेना है , राजू बोला मुझे तो लेना है , फिर राजू की माँ ने भी दबाव बनाई। अगले दिन ये सारी करवाई कर वे दोनों पिता-पुत्र सैनिक क्ल्याण बोर्ड गए। वहाँ के अधिकारी ने पूछा क्या आपने अपना पहचान पत्र बनाया है तो वह बोले नहीं , फिर वह पहले उनका पहचान पत्र बनाया उसकेबाद राजू का रिलेशन सर्टिफिकेट। उस व्यक्ति ने पूछा इसका नाम शीटरोल एवं नाइन फाइप एट (958 ) में है , राजू के पिता जी बोले नहीं। वह व्यक्ति बताया की एक शपत पत्र (एफडेविट) बनाओ जिसमें लिखना इसका जन्म नोकरी से सेवा मुक्ति के बाद हुआ और मैट्रिक के प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट ) का फोटो स्टेट प्रमाणित करा कर लाना उसे अभिलेखागार (रिकार्ड) भेज दूंगा। वे इस सम्पूर्ण करवाई को पूर्ण किए , राजू इस सर्टिफिकेट के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित होने लगा। बाद में रिकार्ड से से एक पत्र आया जिस में जो कमी थी वह लिखा गया था , कुछ और कागज की मांग की गई थी , जिस में एक जन्म प्रमाण पत्र भी था जो उन लोगो के समझ नहीं आया , जिस वजह से वे लोग चुप हो गए।

                         इसी दौरान राजू एक स्थान से भर्ती प्रक्रिया का सम्पूर्ण स्तर को पर कर गया , उसके जिला सैनिक क्ल्याण बोर्ड के प्रमाण-पत्र के सत्यापन के लिए उसके पिता जी सर्विस रिकार्ड भेजा गया ,तो वहाँ से जवाब आया की उनका कोई पुत्र नहीं है जो भर्ती हो सके। इस सुचना से भर्ती कार्यालय , राजू को अवगत कराया था। यह सत्यापन जरुरी था ,क्योंकि राजू सत्रह (१७) वर्ष का आयु पर कर चूका था और उसे लम्बाई में छूट चाहिए थी , जो वह प्राप्त भी किया था। उसका नाम पिता जी के सर्विस रिकार्ड में दर्ज नहीं है , एसा सुचना भर्ती कर्यालय में आया है जब दोनों पिता-पुत्र को ज्ञात हुआ तो दोनों रिकार्ड ऑफिस गए तो वहाँ उन्हें वस्तु स्थिति का पाता चला। वहाँ के दफ्तर बाबू ने बतया की जन्म प्रमाण पत्र चहिये तथा उसने यह भी बताया की यह कहाँ और कैसे प्राप्त होगा। वे वहाँ से पुनः गाँव आए एक वकील से मिल कर सारी समस्या बताए। उन्हें ज्ञात हुआ की जो दफ्तर बाबू बताया है वह शहरी क्षेत्र में होता है पर उन्हें यह भी ज्ञात हुआ की गाँव में पंचायत सचिव जन्म प्रमाण-पत्र निर्गत करता है। वे लोग पंचायत सचिव से मिले फिर सारी प्रक्रिया पूरा कर विलम्ब शुल्क के साथ उन्हें जन्म प्रमाण-पत्र निर्गत किया गया। उसी समय वहाँ सभी कार्यालय यहाँ तक की न्यालय का कुछ भाग भी हड़ताल पर थी जिस कारण उन्हें सारी प्रक्रिया पूरा करने में बहुत मुशिकल का सामना करना पड़ा। उन्हें प्रथम वर्ग का मजिस्टेट से सत्यापित शपथ पत्र चाहिए थी जिसे उन्होंने बड़ी मुशिकल से तत्काल प्राप्त किया उसके बाद अंचल में अर्जी दिया तदुपरांत अनुमंडल से अनुमति प्रदान करवा कर जन्म प्रमाण पत्र प्राप्त किया। राजू के पिता जी जन्म प्रमाण पत्र एवं अन्य कागज ले कर पुनः रिकार्ड ऑफिस (अभिलेख कार्यालय ) गए। वहाँ (रिकार्ड) में राजू का पार्ट -2  आर्डर (भग दो आदेश) हुआ और उसका एक प्रति उन्होंने राजू के पिता जी को दिया। उस प्रति को राजू भर्ती कार्यालय में दिखाया और निवेदन किया की जाँच (सत्यापन) का कागज पुनः भेजा जाए। भर्ती कार्यालय वाले मान गए।  उन्होंने पुनः सत्यापन प्रतिवेदन भेज दिया।  राजू का जाँच पुष्टि कागजात आने में बहुत देर हो रही थी , उसके पीछे के अभियार्थी नियुक्ति पा चुके थे। सेना में भर्ती चिकित्सीय जाँच का सर्त है , छः ( ६ ) माह उपरान्त पुनः पूर्ण चिकित्सीय जाँच होता है। राजू इस से बहुत घबरा रहा था। भर्ती कार्यालय वाले राजू को नियुक्ति के लिए बुलाए थे। वह जब वहाँ गया तो उसे पुनः ज्ञात हुआ की उसका अभी तक सत्यापन नहीं आया है तथा अमुक दिनांक के बाद नियुक्ति नहीं होगी। साथ में पास-पड़ोस वाले बोलते राजू पेंसन आ गया का ! कोई बोलता इसका नौकरी हो रहा है , यही बड़ा पढ़ा-लिखा और देहगर हुआ है इत्यादि टिपणी करते। इन सब बोल-बचन से राजू बहुत मायूस होता , उसके पिता जी उसे ढाढ़स बंधाते। नियुक्ति के दिन सत्यापन नहीं आया था और और नियुक्ति एक निश्चित दिनांक के बाद नही होगा ऐसा जानकर उसके पिता जी उसी समय रिकार्ड (अभिलेख कार्यालय) चले गए। वहाँ से तत्काल सत्यापन भिजवाया वो भी तीन माध्यम से , बाइपोष्ट , सिग्नल , तथा बाई हैण्ड (हाथ से ) दोनों का रिसिप्ट (पावती) संख्या ले कर आय , तब तक सत्यापन का पत्र भर्ती कार्यालय पहुँच चुकी थी। तब जा कर राजू को नियुक्ति मिला। इसी कड़ी में राजू बताता है की उसका शारीरिक माप-तौल भर्ती कैम्प में तो सही किया गया पर जब प्रवेश-पत्र (एडमिट कार्ड) लेने गया तो वहाँ का एक अधिकारी पुनः माप कर लम्बाई कम कर दिया। उसके लिए भी उसे मुख्य भर्ती अधिकारी से मिलना पड़ा , पुनः माप हुआ , उसे वही व्यक्ति मापा जो उसे भर्ती कैम्प में मापा था। उसने बताया बेटा तुम्हारा लम्बाई बिलकुल उतना ही है जितना चहिए , कैम्प में तो लम्बाई  को दबा कर मापा जाता है , मैं कैसे तुम्हे उतना ही माप दिया। उसके माप को मुख्य भर्ती अधिकारी ने देखा और एकिन करने के बाद लाल स्याही से प्रमाणित किए। तदनुपरांत उसे प्रवेश पत्र मिला। राजू के पिता जी भी बताते हैं की इसके जन्म प्रमाण पत्र के सत्यापन के लिए जब वे रिकार्ड (अभिलेख कार्यालय) गए तो उस दिन कार्यालय बंद था तथा अगले दिन उस टेबल पर कार्य करने वाला अवकाश पर था , वे अधिकारी से मिले और उन्हें बताया की राजू का नियुक्ति नहीं हो सकेगा अगर सत्यापन सही समय से नहीं पहुँचेगा। उन लोगों ने पूरा सहयोग किया और देखो नतीजा सामने है।  इन दोनों पिता-पुत्र के कथन के उपरान्त  मुख से अन्यास ही निकल जाता है "जो सोचा वो पाया" । 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

* शर्त (बाजी) *

                   र्त जितना ही छोटा शब्द है , इसकी परिणाम और इसे पूरी करने के लिए लिया गया प्रतिज्ञा और इच्छा उतनी ही बड़ी होती है। इस जगत में जितने प्रकार के लोग हैं , उतने ही प्रकार के शायद शर्त  भी है। लोग एसे भी शर्त  लगाते हैं ! हमने सोचा भी नहीं था। वो भी औरत। जब पूरी बात मेरा दोस्त राजु ने बताई तो मैं दंग रह गया। आज उसकी आपबीती को कलमबंद करने जा रहा हूँ। 

                      राजू  सभ्य नेक और चरित्रवान लड़का है। उसके चरित्र पर उसके घर वाले , खास कर माँ और बहन को पुरा भरोसा है। वह हर कार्य को समय से संपन्न करता है। उसे अपने पास-पड़ोस और समाज से सराहना मिलते रहता है। उसे (राजू  को) उसके दोस्त नागा के नाम से भी कभी-कभी सम्बोधित करते रहते हैं। नागा जैसा की मैं जनता हूँ  , भारत में साधुओं का एक वर्ग है जो स्त्रियों से दूर रहते हैं। उनका शरीर और विचार पर नियंत्रण रहता है। शायद इसी तुक या तर्क का इस्तेमाल उसके दोस्त उसके प्रति करते हैं। 

                          राजू  तीन भाई दो बहन है। एक भाई उससे छोटा और सभी भाई-बहन उससे बड़े हैं। दोनों बहन की शादी हो गई है। राजू  के बड़े भाई का शादी हुआ उसके तदुपरांत (तुरन्त बाद) की यह बात है। शादी बड़े धूमधाम यानी अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार, नोक-झोक के साथ सम्पन्न हुआ। दुल्हन यानि राजू जी की भाभी जी घर आ गई। रीती-रिवाज के अनुसार पूजा-पाठ हुआ , चौठारी हुई साथ में सगे-सम्बन्धी जो शादी में सपरिवार आए थे , वे भी अपने-अपने घर को जाने लगे और चले भी गए। उसके यहाँ सिर्फ उसके दोनों बहन रुक गई , इसका कारण था की राजू की माँ को कही रिस्तेदारी में खास वजह से जाना था। राजू भी अपनी माँ संग गया ,वहाँ से वे लोग डेढ़ माह के बाद वापिस आए। वापिस आने के बाद राजू बताता है की वह भी अपने दिनचर्या के अनुसार अपने कार्यो में व्यस्त हो गया। उसी दौरान उसे आभास हुआ की जरूर कोई बात है।  फिर उसे जो जानकारी  प्राप्त हुई वह चौकाने वाली थी।

                            वह बताता है की शादी के वाद वह (राजू) और माँ घर पर नहीं थे। घर पर उसके भैया-भाभी , पिताजी दोनों बहन , छोटा भाई और एक चाची जी थी। भाभीजी अच्छी थी यानी दिखने में आकर्षक थी। उन्हें घर का सभी सदस्य मानते थे। उनका छोटा देवर यानि राजू का छोटा भाई उनसे नहीं भी तो ८ वर्ष छोटा होगा। उनका पूरा ख्याल रखता था। वह जो कहती थी , वह उस आदेश को तत्परता से निपटाता था। ननंद भी उन्हें मानती थी पर कुछ समय बाद उनके आचार-व्यवहार से दोनों नाखुश रहने लगी। एक तो बड़ी वाली दिखने में उतना चरफर नहीं थी , पर वह हर बात को गुनती थी , वह अपनी सुविधा या सहुलियत के अनुसार ही किसी से कोई वार्तालाप करती थी। वह किसी को सवारने , सलाह देने या किसी की जीवन में उसके रहने के तरीके में दखलंदाजी नहीं देती थी। उसे सिर्फ समय से खाने और आराम करने से था। वही राजू की छोटी बहन चरफर थी। कैसे रहना है , क्या करना है , किसी से क्या बोलना है इत्यादि पर ज्यादा ध्यान देती। साथ ही वह घर में महिला सदस्यों में छोटी भी थी जिस से उसे रसोइयाँ का सारा कार्य करना पड़ता था। प्रारम्भ में तो सौख से करती थी पर बाद में उसकी मज़बूरी हो गई। ज्यादातर गाँवो में कोशिस किया जाता है की नई दुल्हन को सवा माह चूल्हा-चौका न करनी पड़े। यह रिवाज उन पर भाड़ी पर गई। उनकी भाभी कोई काम में तो हाथ नहीं बटाती साथ में अपनी साडी कपडा खोल कर छोड़ देती थी , जिसे उनकी छोटी ननंद धोती थी। अती  तो तब हो गया की जब वह अपनी अन्तरंग वस्त्र भी छोड़ने लगी। चाची को इस सब से कोई मतलब नहीं था। एसे वह अलग खाना खाती थी , पर उनका आंगन एक ही था। उनका काम था उतार-चढ़ाव बोलना , कभी भी वह एसा नहीं बोलती थी जो किसी के लिए सही हो। उनका मोटो था " हम को क्या लेना है " एसा क्यों बोला जाए की अगला को अच्छा न लगे। जैसा की सभी जानते हैं , चोरी करना गलत है पर वह यह  बोल कर भी खुश नहीं हैं , अगला को नाखुश नहीं करना ही उनका मकसद था।

                            इसे हम नारी नीति भी कह सकते है , सभी अपने-अपने स्थान या तर्क के अनुसार सही हो सकते हैं। आपको बताते चले की इसी सवा माह में ही राजू के भाभी और छोटी बहन में कहासुनी हो गई। राजू के छोटी बहन को उसके भाभी और छोटे अनुज का रहने का तरीका अच्छा नहीं लगा । राजू की बहन ने भाभी से कही "आप बड़ी हैं आप एसा कैसे कर सकती हैं , किसी को सवार नहीं सकती तो आप को उसे बिगारने का कोई अधिकार नहीं है।" इसबात पर उनकी भाभी बोली "मैं कैसे भी रहूँ आपको क्या ? मैं घर के प्रत्येक सदस्य को अपने कस में अपनी मुठ्ठी में रखुँगी , उसके लिए हमें चाहे कुछ भी ककरणी-करानी परे।" तब राजू की बहन बोली देखती हूँ ! उसकी भाभी बोली देखना राजू भी मेरे इसारो पर नाचेगा।

                            राजू और उसकी माँ रिस्तेदारी से घर आ गए। माँ के डर या लाज-लिहाज से सभी लोग अपनी-अपनी कामो का सही से निष्पादन करने लगे। माँ का टोका टोकी शुरू हो गया जो एक सही अभिभावक को करनी चाहिए।  कुछ रोज रहने के बाद राजू की बड़ी बहन अपने ससुराल चली गई। राजू के रिस्तेदारी से आने के बाद दोनों बहनों में कुछ कहा-सुनी या राय-सुमारी हो रही थी।  जिसे राजू पूरी तरह सुन चुका था। उसकी बड़ी बहन बोली तुम्हे उस सब से क्या लेना है , रहना है तो चुप-चाप कुछ दिन रहो। तु सभी को सवारने , चरित्र निर्माण का ठिका ली हो का ? कैसे रो रही थी , भाई हम तो चली। पर छोटी बहन कुछ नहीं बोली। राजू सभी सभी बातों को सही तरीके से समझ लिया। उसे यह भी मालूम हो गया की दोनों ननद भाभी में शर्त लगी है की कैसे उसे (राजू को) तुम कस(वस) में करती हो।

                                राजू बताता है की वह भी मन ही मन सोचा देखता हूँ , भाभी जी कौन सी मंतर चलाती हैं। जैसा की हमें ज्ञात है राजू  कर्त्तव्य निष्ट है।  वह अपने स्तर का सारा कार्य को बखूबी निपटाता है। गाँव-घर में जितनी एक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है।

                                भाभी राजू का बखूबी ध्यान रखती थी ,राजू भी उनके हर आदेश (कार्य) को निपटाता था , पर वह पहले अकेला में माँ से आज्ञा लेता था या उनकी जनकारी के लिए बता देता था। भाभी जी भी उसके खाने-पिने का पूरा ख्याल रखती थी। वह जब शाम को जब घर आता तो भाभी जी उसकी हाथ पैर में तेल लगाती , सर दबाती जो उसे अच्छा लगता था। कही से कोई खाने की वस्तु आती तो वह राजू के लिए अवश्य रखती थी। यह सारी  बातें राजू को बहुत अच्छा लगा। पर वह भाभी को कुछ भी ला कर देता तो माँ को अवश्य बता देता। राजू उनसे आँगन में ही बात करता था। राजू अगर शाम को खाना खाने आता तो अगर खाना बन रहा होता तो वहीं रसोई घर में ही बैठ कर खा लेता। रसोई घर दो तरफ से खुली थी।  जब खाना बन जाता तो सभी लोग आँगन में ही खाते।  भाभी जी अपना विशेष प्रभाव न देख जान गई की राजू शख्त मिजाज का है। वह यह भी जान गई की राजू सभी बात को माँ जी को बता देता है या जो हमें वह ला  कर देता है वह पूर्ण रूप से छुपा हुआ नहीं है तो वह उस से दूसरी तरह से पेस आने लगी। वह उसे तेल लगाती तो उसके सर से अपनी उरेज सटा देती ,उसके सर में घर्षण करती कभी चुम्मा ले लेती इत्यादि कामुक गतिविधियाँ करती। राजू भी मन ही मन सोचा आखिर देखना चहिए की यह कितनी स्तर तक निचे गिर सकती हैं। राजू उन्हें सह देने लगा तो वह...... स्तर तक पहुँच गई , पर राजू वहाँ से वापिस आ गया। वह उस गर्त में नहीं गिरा (उतरा) । वह बता रहा था की अब वह उनसे न तो ज्यादा बोलता है और न ज्यादा सम्पर्क रखता है। वह कहता है की उनके लिए वह पहले वाली प्रतिष्ठा भी उसके दिल में नहीं रहा। अब दिखावे के लिए दुनियाँ वालों के सामने औपचारिकता के लिए अभिवादन अभिनन्दन होता है। आगे राजू कहता है की वह इतना आगे इस लिए पहुँचा की वह उनकी वास्तविकता जानना चाहता था की क्या एसा भी हो सकता है की , "र्त" के लिए एक शादी-शुदा स्त्री ..... गर्त के स्तर तक जा सकती है। उसके इस व्यवहार से घर में कुछ भी हो सकता है। क्या एक पुरूष औरत को उसी के विचार से नहीं बांध सकता है ? उस पर अपनी मर्जी नहीं डाल सकता ? एसा हो सकता है। राजू कहता है की मेरा ह्रिदय कहा की यह एक सभ्य पुरुष के लिए उचित नहीं है। इसे बाद में ब्लैक मेल की संज्ञा भी दी जा सकती है , अगर आप किसी यंत्र का इस्तेमाल करते हैं। साथ में इसे नैतिक रूप से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। राजू उन से दुरी बना लिया और मन में निश्चय किया की वह न तो कभी किसी के आगे शर्त रखेगा यानि अनावश्यक बाजी नहीं लगाएगा ,  हो सकेगा तो वह इस विचार का प्रसार भी करेगा। जिस से शर्त लगाने की प्रवृर्ति हतोसाहित हो सके। 

बुधवार, 23 सितंबर 2015

* एक पहलु *

                 आज सभी जगह समानता की लड़ाई जारी है। इसके लिए सभी स्तरों पर जागरूकता अभियान , आंदोलन चलाए जा रहें हैं। घर और समाज सभी जगह इसी पर चर्चा जारी है। जैसे महिला शसक्तीकरण , लड़का-लड़की एक समान के नारे लगाए जाते हैं।

                 अगर भारतीय इतिहास पर ध्यान दिया जाए तो सारी शक्ति महिलाओं के पास ही थे। सृष्टी निर्माण का श्रे भी एक महिला आदि शक्ति को ही जाता है। भारत में न तो पहले प्रदा प्रथा थी न ही सती प्रथा। आज एसे अनेकों कुरुतियाँ हैं जो पुरातन भारत में नहीं थे। नारी को शादी से ले कर जीवन के सभी क्षेत्रो में स्वंत्रता प्राप्त थी। धीरे-धीरे उनका स्तर गिरता गया और उनकी आज यह स्थती है। सभी अपने स्तर के लिए स्वयं उतना ही दोशी होते हैं जितना दूसरा।

                एसे विभिन्ता तो सृष्टी का नियम है , न विभिन्ता समाप्त हो सकती है न सभी समान हो सकते हैं। सृष्टी को गतिमान रहने के लिए दोनों को रहना ही होगा। हम चाह कर भी इसे नहीं मिटा सकते। अगर हम कहे की लिंगता का निर्धारण कैसे होता है , तो पहला आधार जैविकता है ,जिसमें शारीरिक संरचना आता है अर्थात शरीर की आंतरिक और ब्राह्य बनावट। दूसरा आधार समाजिक है। जन्म के साथ ही जैविक आधार पर उसे खान-पान , पोशाक , माहौल , सोच दिया जाता है। जिसके कारण एक अलग सोच , रहन-सहन , बोल-चाल विकसित हो जाता है। जो लिंगता निर्धारण का आधार बनता है।

                  आज पुनः समाज , परिवार के सदस्यों का खास कर माता-पिता का अपने लड़कियों के प्रति नजरिया बदल रही है। ए इनके (लड़कियों के) विकास और उथान के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो रहे हैं , साथ में ए (माता-पिता) उस से आशा भी करने लगे हैं। वे अपने लड़कियों को अपना जीने का आधार और वृद्धा अवस्था या उसके पहले जरुरत पड़ने पर उसे अपना सहारा मान रहे हैं। बड़े लोग जिनकी आर्थिक स्थिती बहुत अच्छी है उनको छोड़ , मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार की सम्पति उनका संतान ही होता है। जिसके सहारे इस परिवार के बुजुर्ग अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

                  अब नारी वर्ग यानि महिलाओं का कर्त्वय बनता है की जब उनका परिवार उनके प्रति समर्पित है या थे, तो वे भी उनके निर्वाह के लिए अपना हाथ बढ़ाएं , जिससे समाज के अन्य परिवारों और लोगों की यह भर्म जाती रहे की लड़कियाँ पराई सम्पती है। अगर लड़कियाँ इस ओर अपनी हाथ नहीं बढ़ाती हैं तो जैसे आज के कुछ लड़कों के कारण उनके परिवार का मोह भांग हो रहा है , वे अपनी जिम्मेदारी (जिम्मेवारी) लड़कियों को दे रहें हैं या खुद कर रहें हैं। वृद्ध लोग अपने देख-भाल के लिए संघ बना रहें हैं या अपनी देख-भाल के लिए किसी संगठन को पूर्व सर्त अनुसार भुगतान कर रहें हैं। अगर लड़कियाँ भी अपनी जवाबदेही नहीं समझेंगी तो लड़कियों से भी  इनका पुनः मोह भंग हो जाएगा। आज मध्यवर्गीय परिवार के कामकाजी लड़कियों को इस ओर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। हम आगे कुछ उदाहरणों का वर्णन करूँगा जिस से समाज में पुराने नजरियाँ को कायम रखने में मदद मिलता है।

                  हम जहाँ रहते हैं वहाँ की कुछ लड़के-लड़कियाँ जो तुरंत मैट्रिक या इण्टर उत्तीर्ण  किए थे। वे आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के लिए टियुसन पढ़ाना सुरु किया जो उनके विकाश में सहायक भी साबित हुआ। इसमें हमने गौर किया की लड़के अपने खर्च को कम कर उसी में से घर वालो को कुछ राशि दे देते थे या अपनी पढाई इत्यादि का पूर्ण वहन करते थे , पर वहीं लड़कियाँ उस पैसे से कभी अपना कपड़ा तो कभी कोई श्रृंगार और जेवर खरीद लेती थी। अपनी पढाई तो जारी रखती थी पर अभिभावक से नामांकन , रजिस्टेस्न , फार्म भड़ते समय सहयोग कि मांग करती थी। अभिभावक भी कुछ नहीं बोलते थे और कहते , इसको पराये घर जाना है ,अभी नहीं पहने ओढ़ेगी तब कब ए सब करेगी।  ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोगो को यह भी कहते सुना की हमें लड़की की कमाई नहीं खानी , जो अभिभावक की मनोवृति को दर्शाता है। समाज में अपनी स्थान बनाने के लिए लड़कियों को भी अपनी सोच बदलने की जरुरत है।

                    एक अन्य घटनाक्रम :- मेरा एक दोस्त है विनय राय। उसके परिवार में उसके माता-पिता , स्वयं एवं उसकी पत्नी के अलावा उससे दो वर्ष छोटी बहन एवं बहन से तीन वर्ष छोटा भाई है। इनके माता-पिता मध्यवर्गीय परिवार के हैसियत अनुसार इन्हे पढ़या लिखाया। विनय इण्टर उत्तीर्ण  होने के उपरान्त भारत सरकार के कर्मचारी के अंतर्गत कार्यरत हो गया। उसका घर की स्थिति अच्छी थी। विनय के नियुक्ती के उपरांत आर्थिक तंगी बिलकुल जाती रही। विनय अपना पूरा वेतन पिता जी को सुपूर्त कर देता था। इसी दौरान उसकी बहन आशा स्नातक उत्तीर्ण कर गई। तदनुपरान्त आशा सि०आई० एस० एफ० (C.I.S.F.) में एस० आई० ( S.I.) पद के लिए निवेदन की , परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए वह एस० आई० पद पर नियुक्त हो गई। विनय और उसके परिवार के सारे सदस्य खुस थे।

                        उसके (आशा की ) नियुक्ति के तीन वर्ष बित चूका था। विनय एक दिन बैठा कुछ सोच रहा था। मैं उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा क्या बात है। वह सारी बात बताने लगा। वह बोला बहन की शादी करनी है। तुम जानते ही हो वह C.IS.F. में S.I.है उसके अनुसार ही तो घर-वर ढूँढना पड़ेगा।  मैं बोला दिकत काहा आ रही है। तुम कमा ही रहे हो उसकी सेवा भी तीन वर्ष से ज्यादा हो गई , पैसे की तो कोई कमी नहीं होनी चाहिए। वह बोला क्या बात करते हो उसके वेतन में से पैसा कहाँ बचता है। वह सारी पैसा खर्च कर देती है। मैं बोला कैसे ? विनय बताने लगा , वह अपने वेतन से अपनी खर्च चलाती है , अपने लिए सभी सुख-सुबिधाओं की वस्तु  खरीद रही है। साथ में आभूषण (जेवर) बनवाती रहती है। अपने लिए महंगा-महंगा कपड़े की सेट और क्या-क्या खरीदती रहती है। साथ में फ्लैट भी किराए का है। हम लोगों के लिए भी उपहार खरीदती रहती है। हम लोग उसके पास जाते हैं तो रहने खाने से भर्मण का सारा खर्च वही व्यय करती है। जब वह घर आती है तो सभी के लिए कपड़ा लाती है जाते वक़्त पिता जी को पाँच-सात हजार रुपया हाथ में दे देती है। मैं कहा इसमें क्या बुड़ाइ है , वह कम से कम सभी का जीवन स्तर तो उच्चा कर दी तो वह हँस दिया। मैं बोला तुम उसके शादी के खर्च के लिए कभी उस से या पिता जी बात किया ? विनय बोला किया था , पिता जी बोलें 'बेटी है' , क्या बोलें , उसकी शादी का खर्च तो हमारी जवाबदेही है। अगर तुम भी अपना वेतन हमें नहीं देते तो मैं क्या कर लेता ? उसके आय पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इतना तो है की वह जहाँ रहेगी खुश रहेगी।  कुछ माह के बाद हमें ज्ञात हुँआ कि विनय अपनी बहन की शादी C.I.S.F. में ही लड़का S.I .है उसी से तय किया है और शादी  निश्चित समयानुसार हो भी गई। विनय बताता है की उस शादी में उसके परिवार का दस लाख रूपये के आस-पास खर्च हो हुआ। 

                   अब आप ही बताइए की यह विचारणीय पहलु है या नहीं। इस पहलु पर हम सभी को विचार करने की जरुरत है। बिशेष कर माता-पिता और लड़की को। इस एक पहलु से समाज का एक बड़ा सोच जुड़ा हुआ है। यही सोच आगे सामाज में होने वाली परिवर्तन और विकाश का दिशा निश्चित करेगा। लड़कियों को उनका कर्त्वय  ही उन्हें अधिकार दिलाएगी।  किसी ने कहा है "  कर्त्वय  ही अधिकार की जननी होती है " . इस में संसय नहीं की जा सकती।