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शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

* मालती चाची *

                   मोनू मालती चाची के सामने पला-बढ़ा और युवा हुआ । उस पर मालती चाची का आच्छा-खासा प्रभाव भी परा । जब वह पाँच (५) वर्ष का था मालती चाची ३५-३७ वर्ष की होंगी। आज मोनू २५ वर्ष का है। 

                   मोनू बताता है जब से वह होश सम्भाला है तब से मालती चाची की दिनचर्या देख रहा है। उस में खास बदलाव नहीं है। वह सुबह उठती है घर में गाये हैं उन्हें बाहर निकलवाती उन्हें चारा डालने या डलवाने के वाद नित्य क्रिया पूर्ण करती , बच्चों के लिए नाश्ता-खाना बनाती उन्हें तैयार कर विद्यालय भेजती , बच्चों को विद्यालय भेजने के वाद चाचा जी आते तो उन्हें खाना देती और सौ बात सुनाती निकम्मा , निठ्ठला न जाने क्या-क्या कहती। सभी का कपड़े  साफ करती साथ में गाय का गोबर का उपला (गोइठा) भी बनाती। और सारे काम करते-करते डेढ़ से दो बज जाता उसके बाद स्नान आदि कर पूजा-अर्चना करने के बाद अन्न ग्रहण  करती। अगर इन सारी क्रिया-कलापो को जल्दी-जल्दी निपटाती फिर भी दिन के बारह  बज ही जाते। उनका सुध लेने वाला कोई नहीं था। 

                     आम तौर पर देखा जाता है , गाँव की मध्यवर्गीय औरतें रास्ते के बगल में बैठ कर गप्पे मारती रहती हैं , जिन्हे न तो कोई काम है न कोई चिंता बस दूसरे की शिकवा-शिकायत लिए बैठी रहती हैं। इन सब बातों से मालती चाची दूर थी , ए न तो किसी के यहाँ अनावश्यक जाती थी न कहीं बैठका लगाती थी , जो इनके उर्म ढलने के बाद भी बना रहा , इनका व्यवहार औरतों के बीच चर्चा का विषय-वस्तु भी रहती। 

                     आज वह अपनी घर की आर्थिक स्थिति एवं दिनचर्या के चलते चिरचिरा स्वभाव की हो गई हैं। पास-पड़ोस वाले बताते हैं , इनका शादी एक सुखी सम्पन्न परिवार में हुआ था। इनकी शादी हुई तो गाँव-जेवार (इलाके,क्षेत्र) में शोर था। वह शोर समय के साथ शान्त हो गया। इनके पतिदेव जो पहले सरकारी कर्मचारी थे , उसे छोड़ कर वे घर आ गए और गाँव के राजनीती में रहने लगे , जिस से आमद कम खर्च ज्यादा होने लगी , बच्चें बड़े होने लगे दिनों-दिन खर्च बढ़ने लगी , घर का हालात पतली होती गई , साथ में चाची जी के स्वभाव में भी खासी परिवर्तन होती गई। 

                         चाचा जी घर से दूर एक बैठका बना रखे थे , जिसे गाँव देहात में दलान कहते हैं। वे वही रहते थे। अब जब भी चाचा जी घर आते तो चाची जी से नोक-झोक होती , पर उनमें कभी भी मार-पिट नहीं हुआ , चाची जी कभी-कभी बहुत बोलती और पूरा घर सर पर उठा लेती। उस समय चाचा जी कुछ नहीं बोलते बस मुस्का कर चुप-चाप चल देते। चाची जी का बस इतनी सी ख्वाइस थी की बच्चो का सही से पालन-पोषण हो सके पर गाँव में वो भी राजनीती में इतना आमद कहाँ की जिस से घर गिरहस्ति चल सके। समय बीतता गया बच्चे बड़े हो गए , बच्चियाँ शादी योग्य हो गई। चाची जी अब बच्चियों के शादी के लिए घर-वर ढूंढने के लिए चाचा जी पर दबाव बनाने लगी। वह दूसरे लोगों और रिश्तेदारों के मदद से विभिन्न उद्यापन कर घर चलाती थी। ऐसे वह पहले देखा भी था और लोगों से सुना भी था , चाची जी बहुत कम बोलती थी पर बच्चें-बच्चियों के बड़ा होने के साथ वे गाली भी निकालने लगी थी , जिसका अपेक्षा उन से नहीं था। 

                        चाचा जी अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार घर-वर ढूंढ कर , बच्चियों की शादी कर दिए , जिसके लिए उन्होंने कर्ज भी लिया और जमीन भी बेचे। लड़कियाँ अपने ससुराल चली गई। एक रोज चाची जी अपने दरवाजे पर बिलकुल शांत बैठी थी। मोनू उनके पास गया और उनके बगल में बैठ गया , वह सम्भलती हुई उसके लिए पीढ़ा ले आई। उन दोनों में बात होने लगी फिर मोनू ने चाची जी से पूछा , चाची एक बात पुछे बुरा तो नहीं मानोगी , चाची बोली पूछो बुरा क्यों मानूंगी वो भी तुम्हारी बात को जो कभी अनावश्यक बोलता नहीं तो अनावश्यक कुछ पूछेगा नहीं। उसने पूछा "आप अपने जवान लड़कियों को  इतनी गन्दी-गन्दी गली क्यों निकालती थी ?" उनका आँख भर आया वह आँखो के आशु को पोछती हुई बोली "बेटा कोई माता-पिता अपने बच्चों को डाँटना भी नहीं चाहते पर क्या करें गाली भी निकालनी पड़ती है , कोई बड़े कुल या जात में सिर्फ जन्म लेने से बड़ा थोड़े ही हो जाता है उसे उसके अनुसार आचरण एवं कर्त्वय भी निभानी पड़ती है और अपना कर्म करनी परती है। तुम नहीं समझोगे गरीब आदमी चाण्डाल के बराबर होता है। ए जो पापी छुधा (पेट) है , इसके आगे बड़े-बड़े लोग घुटने टेक देते हैं , यह विभिन्न पाप और कुकर्म के लिए प्रोत्साहित करती है और हमें इसी का डर लगी रहती थी , कहीं हमारे बच्चे भी एसा न कर दे , जिस से वंश कुल में दाग लग जाए और हम कहीं भी मुख दिखाने लाईक न रह पाए , हमारा मानना है , दाग ले कर जीने से मरना भला है। मैं तो अपने सामर्थ के अनुसार इनकी आवश्कयता पूरी करती हीं थी पर मैं गाली-गलौज या ताना मार कर इनके विचार और संगती को नियंत्रण करना चाहती थी। जब ए खुद गार्जियन हो जाएंगे तो सब समझ जाएंगे। " चाची अपने दोनों होठो को दबाते हुए अपनी भाऊकता छिपाने की कोशिश करने लगीं।

                      समय अपने चाल से चलता रहा , चाची जी के लड़के कमाने लगे पर चाची जी के व्यतिगत जीवन में कोई खास बदलाव नहीं आया। उनका पहला लड़का उनकी जरुरतो और अरमानों से कोई खास सरोकार नहीं रखता पर दूसरे का उनके साथ जुड़ाव बना रहा , वह उनहे खुश रखने का प्रयत्न करता और चाची जी पहले से ज्यादा खुश भी रहती। चाची जी के स्वभाव में एक आदत और थी वह धार्मिक प्रवृति की महिला थी , धर्म में उनका पूर्ण आस्था एवं विश्वास था वह अपने दरवाजे पर आए किसी भी जरूरतमंद या साधु-सन्यासी को रुष्ट नहीं करती , अपनी सामर्थय के अनुसार उन्हें दान-दक्षिणा और जरूरत की सामग्री उन्हें देती। इसी बीच चाचा जी बीमार रहने लगे, उपड़ से मध सेवन से बाज नहीं आते। उनके दावा के लिए अच्छा-खासा नगद राशि व्यय हो रही थी। उनके सेवा में चाची जी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ती पर वे (चाचा जी) भी आदत से मजबूर थे और अपनी मनमर्जी करते। दूसरा लड़का जो चाची जी से जुड़ा हुआ था वहीं सारी खर्च का निर्वाहन करता था। चाचा जी बहुत सरे कर्ज भी ले रखे थे , जिसका देनदारी भी चुकाना पड़ता था।  एक रोज चाची जी , चाचा जी का किया हुआ पोटी साफ कर रही थी और उन्हें कोस भी रही थी। जवानी में कुछ कमाया नहीं , एक लड़का कमा कर दे रहा तो उसकी सारी कमाई ए ही खा जा रहें हैं , पूरा जीवन परिवार को पेर कर छोड़ दिए , पता नहीं इनसे बच्चों को कब छुटकारा मिलेगी। उस समय ऐसा नहीं लग रहा था की चाचा जी ज्यादा दिन इस मृतलोक में निवास कर सकेंगे। मोनू उसी समय चाची जी से पूछ दिया चाची जी आप चाचा जी को इतना कोस रही हैं , न जाने क्या-क्या कह रही हो , अगर चाचा जी इस लोक से चले गए तो आप कैसे रोइएगा। एसे इस टोला में विधवाओं का संख्या कम नहीं है। चाची जी बोली भाग मुदईया मैं क्यों रोउ। दूसरे दिन मोनू चाची जी के पास गया उनके चरण स्पर्श कर कहा मैं शहर काम करने जा रहा हूँ , मेरी नौकरी पक्की हो गई है। चाची जी बोली जाओ खुश रहो और मन से काम करना और मस्त रहना।

                      आज दिनांक  १०/१२/२००८ को  मोनू दोपहर बस से उतरा और मिठाई का डब्बा लिए मालती चाची के दरवाजे पर पहुँचा तो देख रहा है , वहाँ लोगों का हुजूम लगा हुआ है , सभी कुछ-न-कुछ चर्चा कर रहें हैं ,  कोई कह रहा है किसे जाना  था और कौन चला गया , सक्षात देवी थी , बेचारी सुख का मर्म नहीं जानी ,मर्द तो कमाया नहीं , बड़ा बेटा भी साथ नहीं दिया , यह इस घर की लक्ष्मी थी , यह अपने आप भूखा रह आए हुए आगंतुको , पांडा-पुजारी , भूखे को भोजन करा देती थी। मोनू भीड़ को चीरता हुआ आगे बढ़ा और आँगन में गया तो देखा मालती चाची लेटी मुस्का रही हैं और अभी बोलने वाली है। वह उनके पैर पकड़ कर बैठ गया , वह जैसे ही बैठा उसे लगा चाची जी उसके कंधे  हाथ रख कह रही हैं : देखा , अब तुम क्यों रो रहे हो ए तो शाश्वत सत्य है। मैं तुम लोगो के दिल में हूँ ,क्या यह कम है। मोनू रोते हुए हस दिया। अब उसके जेहन में उनके द्वारा कही गई सारी बातें कौंधने लगी जो शायद पहुँचा हुआ साधु-संत और ज्ञानी भी नहीं बता सकता। सचमुच मालती चाची एक कर्म योगिनी थी। उन्हें मेरा सत-सत प्रणाम। 

सोमवार, 19 अक्टूबर 2015

* जो सोचा वो पाया *

                 आप ने हमारी आलेख "हम ऐसा क्यों हैं " पढ़े होन्गे ,  नहीं पढ़े हैं तो कोई बात नहीं। यह आलेख इसी ब्लॉग का एक पाठ है। उस आलेख में हमारी स्थिति के लिए कौन एवं क्यों जिम्मेवार (जवाबदेह) है को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। 
                  आप ने सुना होगा 'जस करनी तस भोगही दाता , नरक जात अब क्यों पछताता ' । यह उद्धरण तब इस्तेमाल किया जाता है , जब कोई गलत कार्य करता है और उसका उसे गलत परिणाम जब प्राप्त होता है तो उसे अफ़सोस होता है। गोस्वामी तुलसी दास जी ने एक दोहा लिखे हैं :- 

                                                        "कर्म प्रधान विश्व करी राखा। 
                                                      जो जस करनी तासु फल चाखा।। 
आप को हम यहाँ बताते चले की सोच भी एक प्रकार का कर्म है। हम जैसा सोचेंगे वैसा ही होगा , इस में दो राय नहीं है। यह अनुभव की बात है। आप ने देखा होगा कोई लड़का दिन-रात पढ़ाई में लगा रहता है पर उसे आसानी से सफलता नहीं प्राप्त होती। वह सफल तो होता है पर उसे उसके परिश्रम के अनुसार फल प्राप्त नहीं होता। इसका एक ही कारण है सोच। वह सोचता है पास होऊंगा या नहीं। अमुक प्रश्न आएगा की नहीं। मुझे सारे उत्तर याद नहीं होते इत्यादि। ए जितना भी नहीं है उसके अंदर नकारात्मक ऊर्जा पैदा करते हैं। उसे प्राप्त होने वाले परिणाम के प्रति प्रतिकूल स्थिति पैदा करते हैं। जैसे परीक्षा के समय उसका बीमार हो जाना ,पैटर्न का परिवर्तन हो जाना , अंतिम समय में गलत निर्देश प्राप्त कर लेना इत्यादि।

                         जैसा की हमें ज्ञात है। यह सृष्टी आकर्षण से बंधी है अगर यह आकर्षण क्षिण या समाप्त हो जाए तो सम्पूर्ण सृष्टी विनिष्ट हो जाए। हम यहाँ एक ईट को ले जिस से मकान ,घर ,भवन इत्यादि का निर्माण होता है। आप कहेंगे यह कौन नहीं जनता। क्या ? आपने कभी यह सोचा की यह ईट या कोई ईट अपना आकर कैसे रख पाता है। जवाब है वह अपने विभिन्न पदार्थो के कणो के आकर्षण से। ठिक उसी प्रकार जब कोई सोचता है तो वह अपने आस-पास एक चुंबकीय गुण विकसित करता है , जो अपने सदृश्य स्थिति , परिस्थिति को आकर्षित करता है। जो सफलता असफलता के गुण दोष को निश्चित करता है। आप कहेंगे की कोई अपनी असफलता के बारे में कैसे और क्यू सोचेगा ? पर यह सत्य है। लोग सोचते हैं अमुक काम होगा की नहीं। मैं अब्बल होऊंगा की नहीं। उनके यही सोचने का तरीका और शंसय उनमे नकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। सफलता के लिए पहले आपको अपनी सोचने की तरीका बदलने की आवश्यकता है। कुछ लोगो को आपने यह कहते हुए सुना होगा , अमुक व्यक्ति सपने में भी एसा नहीं सोचा होगा की वह यह पद प्राप्त कर पाएगा या जीवन में उसे इतनी सफलता मिलेंगी। यह कथन गलत है , पहले आप उस व्यक्ति के नजदीक जाइए उसके अन्तःमन की बात जानिए तो आपको ज्ञात होगा की वह हर वक़्त या मन ही मन ताना-बाना बुनता रहता था। वह समय अनुकूल प्राप्त होने पर चुकता भी नहीं था।

                        आपने सुना या पढ़ा होगा की बिहार का एक मध्यवर्गीय शिक्षक कौन बनेगा करोड़पति में पाँच करोड़ जित कर रातो-रात करोड़ पति बन गए। कई लोगो को आपने यह कहते सुना होगा की वह सपना में भी नहीं सोचा होगा की वह करोड़पति बन जाएगा। पर यह गलत है , जरूर उनके अंदर धन ,सम्पति , वैभव प्राप्त करने की सकारात्मक विचार रही होगी जो स्थिति को उनके समक्ष ला कर खड़ा कर दिया और उन्हें  उसका पूरा लाभ प्राप्त हुआ या यु कहे की उन्होंने स्थिति का भरपूर उपयोग किया। अब आप कहेंगे की मैं परीक्षा में फेल  नहीं होऊंगा में नकारात्म सोच कहा है ,पर यह सोचने का सही तरीका नहीं है। प्राकृति एक बच्चा (शैशव) के समान है। हम जब किसी बच्चे  (शिशु) को कोई शब्द या वाक्य सिखाते हैं तो वह पहले अंतिम अक्षर या शब्द को पकड़ता है , ठीक उसी प्रकार प्राकृति के साथ भी है। जब कोई अंत में नहीं का उच्चारण करता है तो वह उसे आकर्षित कर लेता है और उसके अनुसार ही हमारे समक्ष स्थिति उत्पन्न होती है।

                         आप कहेंगे की मैं अमुक बात कब से सोच रहा हूँ , वह कहाँ संपन्न हो रही है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है की हमारी सोच-विचार पल-पल परिवर्तीत होती रहती है। हम जानते हैं की किसी कार्य को सम्पन होने के लिए बल की आवश्यकता होती है। यहाँ भी कार्य (फल) बल सिद्धांत से जुड़ा है। हर कार्य को सम्पन होने के लिए एक निश्चित मात्रा में साधन और ऊर्जा चाहिए। जब तक ए दोनों उचित मात्रा में उपलब्ध नहीं होंगे विचार वास्तविक रूप नहीं ले सकती। आपने वेग पढ़ा होगा , प्रकाश ,हावा , ध्वनी का वेग भिन्न-भिन्न माध्यमों में भिन्न-भिन्न होता है। पलायन वेग भी आपने पढ़ा होगा , जब पलायन वेग (१५ किलोमीटर / सेकण्ड )  से कोई वस्तु गति करती है तो वह पृथ्वी से दूर चली जाती है। यानि पृथ्वी के गुरूत्व बल के परे। उसी प्रकार सोच-विचार का भी वेग होता है। जब ज्यादा तेजी से सोच-विचार बदलता है तो वह हमसे पलायन कर जाता है। उस पर न तो हमारा नियंत्रण होता है और वह हम पर न कोई प्रभाव कर पाता है। जब हम एक निश्चित गति से सोच को निरन्तर बनाए रखते हैं तो वह कार्य में परिवर्तीत होनें के लिए यथा स्थिति उत्पन्न करती है। हम यहाँ सोच को कार्य रूप में परिवर्तीत होने के लिए एक तथ्य और रख सकते हैं। हम सभी धरातल पर भूमि के निचे से जल निकालने के लिए कुआँ खोदते हैं , या पाईप गाला कर चापाकल या नल लगाते हैं। आपने देखा होगा धरातल पर प्रत्येक स्थान पर इसका स्तर अलग-अलग होता है। स्वच्छ जल के लिए या जल की प्रचुरता के लिए आवश्यकता परने पर और गड्ढा खोदते हैं या पाईप को और गलाते हैं। ठीक सोच के साथ भी एसा ही है। सोच का कार्य रूप में आने के लिए उसके उत्कृष्ठा के अनुसार निरंतरता की आवश्यकता होती है। सोचने वाले की दृढ़ता , आत्मबल , उसकी क्षमता (क्षमता में शारीरिक ,मानसिक , बौद्धिक , आर्थिक इत्यादि सभी ) जो उसके पास उपलब्ध है , उसे प्रभावित करती है।

                        इस सिध्दांत के सिध्दि के लिए एसे तो हम आपको बहुत सारे उदाहरण दे सकता हूँ पर यहाँ मैं आपके समक्ष (सामने) जो उदाहरण प्रस्तुत कर रहा हूँ , वह विल्कुल अनुभव किया गया है। प्रस्तुत उदाहरण शिर्षक जो सोचा वो पाया को सत्य सिध्द करता है।

                         राजू बिहार प्रान्त के जिला-भोजपुर का निवासी है। वह मध्यवर्गीय परिवार से है। जब वह पंद्रह-सोलह वर्ष का था , उसकी घर का आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। जिसके कारण वह जल्दी से जल्दी कही काम पर लगना चाहता था। वह गाँव का रहने वाला था। इसलिए उसे विशेष मार्गदर्शन भी प्राप्त नहीं हुए। गाँव में ज्यदातर लोग सस्त्र बल (बेल्ट सर्विस) से जुड़े हुए थे ,जिस कारन उसी के लिए उसे मार्गदर्शन प्राप्त था। उस समय बिहार पुलिस में ऊचाई का बड़ा महत्व था या यू कहे की नियुक्ती भी लम्बाई (उच्चाई) के आधार पर ही होता था। राजू का लम्बाई उस समय १६७सेमी थी इसलिए वह पुलिस के लिए कभी सोचता भी नहीं था। उसे अपना भविष्य सेना में दिखाई दिया , उस समय सेना में सत्रह वर्ष आयु से कम के अभियर्थियों को उच्चाई में छूट प्राप्त था। उसी समय उसके साथ कुछ लोगों ने एसा बोल-वचन किया जो उसके दिल को महसुस हुआ यानि लोगों की बातों को वह दिल में ले लिया। वह बताता है की जब वह सड़क के किनारे व्याम कर रहा था तो उसके चाचा जी ने कहा चकुदार बनोगे का ? साथ ही उस समय गाँव में एक तुक कहा जाता था , " बेचो तरकारी या करो नौकरी सरकारी "  और एक तुक था  " प्राइवेट नौकरी एवं प्राइवेट छोकड़ी का क्या ग्रान्टी नहीं कब साथ छोड़ दे "। राजू शारीरिक रूप से भी विलकुल बच्चे की तरह था। वह बताता है की इन सब कारणों से वह मन ही मन निश्चय किया की वह नोकरी करेगा तो सरकारी वो भी सेना में। वह रात-दिन उसी के सम्बन्ध में सोचता , वह भर्ती के लिए जरुरी कागजात बनवाया तथा शारीरिक (फिजिकल) और लिखित परीक्षा का पूर्ण तैयारी कर लिया। वह लगभग पाँच से ज्यादा नियुक्ती प्रक्रिया में सम्मिलित हुआ ,वह कही भी कागजात ,शारीरिक (फिजिकल) और लिखित परीक्षा में नहीं छटता था। वह छटता था तो चिकित्सीय जाँच में। इसी दौरान वह सत्रह वर्ष पार कर गया , अब उसे उर्म के अनुसार लम्बाई में मिलने वाली छुट नहीं प्राप्त हो सकती थी। वह ट्रेड मैन भी बनना चाहता था। वह कहता था हमें कोई भी सरकारी नोकरी चाहिए। पहले से भी और भर्ती प्रक्रिया के दौरान भी उसे ज्ञात हुआ की सैनिको के पुत्र को लम्बाई में विशेष छूट प्राप्त होती है। उसके पिता श्री पहले सेना में कार्यरत थे , अपरिहार्य कारणों से वे लगभग सात वर्ष ही सेवा दिए और उसके वाद स्वेक्षा से से लिख कर सेवा निवृत हो गए थे। इसी दौरान राजू को सैनिक कल्याण बोर्ड का पाता चला , जो पूर्व सैनिकों के लिए कार्य करती है। यहाँ ध्यान देने योग्य बात है की उसके पिता जी कभी भी इस विषय-वस्तु पर कोई वर्तालाप नहीं करते थे। राजू उनका सेवा से निवृति पुस्तिका (डिस्चार्ज बुक) देखा था। इसी सिलसिले में वह अपना एक सहपाठी से बात किया जो उस से उर्म और तजुर्वा दोनों में बड़ा था।वह भी एक पूर्व सैनिक का पुत्र था।  उसके पास सैनिक कल्याण बोर्ड के द्वारा निर्गत किया गया रक्त सम्बन्ध (रिलेसन सर्टिफिकेट) था , जिसके आधार पर वह भर्ती प्रक्रिया में विशेष छूट प्राप्त करता था। राजू ने जब उससे पूछा तो वह सम्पूर्ण प्रक्रिया बताने के बाद कहा तुम्हारा यह कागजात नहीं बन सकता , क्यूकी तुम्हारे पिता जी नौकरी छोड़ कर आ गए थे। तुम्हें जेल भी जाना पर सकता है। राजू सोचने लगा अब क्या किया जाए। उसकी आर्थिक स्थिति उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी। वह मन ही मन सोचा एसी जीवन जीने से अच्छा है की जेल ही चला जाऊ , वहाँ भर पेट खाना तो समय से मिल जाएगा। वह मन ही मन निश्चय किया की वह सैनिक क्ल्याण बोर्ड जरूर जाएगा। राजू अपने पिता जी को बिना बताए उनका सेवा निवृति पुस्तिका (डिस्चार्ज बुक) और उनका नौकरी से सम्बंधित दूसरे सभी कागज़ ले कर पास के शहर में जहाँ सैनिक क्ल्याण बोर्ड था वहाँ गया। वही के एक कर्मचारी को वह सारी कागजात दिखा कर सारी स्थिति बतलाया उस व्यक्ति ने उसे निर्देश दिया और बताया की इस टेबल पर एक साहब आएंगे उन्हें सिर्फ डिसचार्ज बुक दिखाना और अन्य कागज अपने पास रखो। उस टेबल पर एक व्यक्ति आया तो राजू ने उन्हें डिसचार्ज बुक दिखा कर सारी बात बताई तो वह व्यक्ति बोला तुम्हारे पिता जी कहाँ हैं। राजू बोला घर पर , फिर वह व्यक्ति बोला उन्हें ले कर आना , उनसे एक आवेदन लिखवाना जिस में विषय होगा , वह तुम्हारा रिलेशन सर्टिफिकेट चाहते हैं , साथ में तुम अपना दो पासपोर्ट साइज फोटो प्रखण्ड विकाश पदाधिकारी से अटेस्टेड राउंड स्टाम्प के साथ करा कर लाना।  जिस पर लिखा होगा की तुम इनके पुत्र हो। राजू घर आ गया और ए सम्पूर्ण बात अपने  पिता जी को बतलाया ,उसके पिता जी बोले मुझे सेना से कुछ नहीं लेना है , राजू बोला मुझे तो लेना है , फिर राजू की माँ ने भी दबाव बनाई। अगले दिन ये सारी करवाई कर वे दोनों पिता-पुत्र सैनिक क्ल्याण बोर्ड गए। वहाँ के अधिकारी ने पूछा क्या आपने अपना पहचान पत्र बनाया है तो वह बोले नहीं , फिर वह पहले उनका पहचान पत्र बनाया उसकेबाद राजू का रिलेशन सर्टिफिकेट। उस व्यक्ति ने पूछा इसका नाम शीटरोल एवं नाइन फाइप एट (958 ) में है , राजू के पिता जी बोले नहीं। वह व्यक्ति बताया की एक शपत पत्र (एफडेविट) बनाओ जिसमें लिखना इसका जन्म नोकरी से सेवा मुक्ति के बाद हुआ और मैट्रिक के प्रमाणपत्र (सर्टिफिकेट ) का फोटो स्टेट प्रमाणित करा कर लाना उसे अभिलेखागार (रिकार्ड) भेज दूंगा। वे इस सम्पूर्ण करवाई को पूर्ण किए , राजू इस सर्टिफिकेट के आधार पर भर्ती प्रक्रिया में सम्मिलित होने लगा। बाद में रिकार्ड से से एक पत्र आया जिस में जो कमी थी वह लिखा गया था , कुछ और कागज की मांग की गई थी , जिस में एक जन्म प्रमाण पत्र भी था जो उन लोगो के समझ नहीं आया , जिस वजह से वे लोग चुप हो गए।

                         इसी दौरान राजू एक स्थान से भर्ती प्रक्रिया का सम्पूर्ण स्तर को पर कर गया , उसके जिला सैनिक क्ल्याण बोर्ड के प्रमाण-पत्र के सत्यापन के लिए उसके पिता जी सर्विस रिकार्ड भेजा गया ,तो वहाँ से जवाब आया की उनका कोई पुत्र नहीं है जो भर्ती हो सके। इस सुचना से भर्ती कार्यालय , राजू को अवगत कराया था। यह सत्यापन जरुरी था ,क्योंकि राजू सत्रह (१७) वर्ष का आयु पर कर चूका था और उसे लम्बाई में छूट चाहिए थी , जो वह प्राप्त भी किया था। उसका नाम पिता जी के सर्विस रिकार्ड में दर्ज नहीं है , एसा सुचना भर्ती कर्यालय में आया है जब दोनों पिता-पुत्र को ज्ञात हुआ तो दोनों रिकार्ड ऑफिस गए तो वहाँ उन्हें वस्तु स्थिति का पाता चला। वहाँ के दफ्तर बाबू ने बतया की जन्म प्रमाण पत्र चहिये तथा उसने यह भी बताया की यह कहाँ और कैसे प्राप्त होगा। वे वहाँ से पुनः गाँव आए एक वकील से मिल कर सारी समस्या बताए। उन्हें ज्ञात हुआ की जो दफ्तर बाबू बताया है वह शहरी क्षेत्र में होता है पर उन्हें यह भी ज्ञात हुआ की गाँव में पंचायत सचिव जन्म प्रमाण-पत्र निर्गत करता है। वे लोग पंचायत सचिव से मिले फिर सारी प्रक्रिया पूरा कर विलम्ब शुल्क के साथ उन्हें जन्म प्रमाण-पत्र निर्गत किया गया। उसी समय वहाँ सभी कार्यालय यहाँ तक की न्यालय का कुछ भाग भी हड़ताल पर थी जिस कारण उन्हें सारी प्रक्रिया पूरा करने में बहुत मुशिकल का सामना करना पड़ा। उन्हें प्रथम वर्ग का मजिस्टेट से सत्यापित शपथ पत्र चाहिए थी जिसे उन्होंने बड़ी मुशिकल से तत्काल प्राप्त किया उसके बाद अंचल में अर्जी दिया तदुपरांत अनुमंडल से अनुमति प्रदान करवा कर जन्म प्रमाण पत्र प्राप्त किया। राजू के पिता जी जन्म प्रमाण पत्र एवं अन्य कागज ले कर पुनः रिकार्ड ऑफिस (अभिलेख कार्यालय ) गए। वहाँ (रिकार्ड) में राजू का पार्ट -2  आर्डर (भग दो आदेश) हुआ और उसका एक प्रति उन्होंने राजू के पिता जी को दिया। उस प्रति को राजू भर्ती कार्यालय में दिखाया और निवेदन किया की जाँच (सत्यापन) का कागज पुनः भेजा जाए। भर्ती कार्यालय वाले मान गए।  उन्होंने पुनः सत्यापन प्रतिवेदन भेज दिया।  राजू का जाँच पुष्टि कागजात आने में बहुत देर हो रही थी , उसके पीछे के अभियार्थी नियुक्ति पा चुके थे। सेना में भर्ती चिकित्सीय जाँच का सर्त है , छः ( ६ ) माह उपरान्त पुनः पूर्ण चिकित्सीय जाँच होता है। राजू इस से बहुत घबरा रहा था। भर्ती कार्यालय वाले राजू को नियुक्ति के लिए बुलाए थे। वह जब वहाँ गया तो उसे पुनः ज्ञात हुआ की उसका अभी तक सत्यापन नहीं आया है तथा अमुक दिनांक के बाद नियुक्ति नहीं होगी। साथ में पास-पड़ोस वाले बोलते राजू पेंसन आ गया का ! कोई बोलता इसका नौकरी हो रहा है , यही बड़ा पढ़ा-लिखा और देहगर हुआ है इत्यादि टिपणी करते। इन सब बोल-बचन से राजू बहुत मायूस होता , उसके पिता जी उसे ढाढ़स बंधाते। नियुक्ति के दिन सत्यापन नहीं आया था और और नियुक्ति एक निश्चित दिनांक के बाद नही होगा ऐसा जानकर उसके पिता जी उसी समय रिकार्ड (अभिलेख कार्यालय) चले गए। वहाँ से तत्काल सत्यापन भिजवाया वो भी तीन माध्यम से , बाइपोष्ट , सिग्नल , तथा बाई हैण्ड (हाथ से ) दोनों का रिसिप्ट (पावती) संख्या ले कर आय , तब तक सत्यापन का पत्र भर्ती कार्यालय पहुँच चुकी थी। तब जा कर राजू को नियुक्ति मिला। इसी कड़ी में राजू बताता है की उसका शारीरिक माप-तौल भर्ती कैम्प में तो सही किया गया पर जब प्रवेश-पत्र (एडमिट कार्ड) लेने गया तो वहाँ का एक अधिकारी पुनः माप कर लम्बाई कम कर दिया। उसके लिए भी उसे मुख्य भर्ती अधिकारी से मिलना पड़ा , पुनः माप हुआ , उसे वही व्यक्ति मापा जो उसे भर्ती कैम्प में मापा था। उसने बताया बेटा तुम्हारा लम्बाई बिलकुल उतना ही है जितना चहिए , कैम्प में तो लम्बाई  को दबा कर मापा जाता है , मैं कैसे तुम्हे उतना ही माप दिया। उसके माप को मुख्य भर्ती अधिकारी ने देखा और एकिन करने के बाद लाल स्याही से प्रमाणित किए। तदनुपरांत उसे प्रवेश पत्र मिला। राजू के पिता जी भी बताते हैं की इसके जन्म प्रमाण पत्र के सत्यापन के लिए जब वे रिकार्ड (अभिलेख कार्यालय) गए तो उस दिन कार्यालय बंद था तथा अगले दिन उस टेबल पर कार्य करने वाला अवकाश पर था , वे अधिकारी से मिले और उन्हें बताया की राजू का नियुक्ति नहीं हो सकेगा अगर सत्यापन सही समय से नहीं पहुँचेगा। उन लोगों ने पूरा सहयोग किया और देखो नतीजा सामने है।  इन दोनों पिता-पुत्र के कथन के उपरान्त  मुख से अन्यास ही निकल जाता है "जो सोचा वो पाया" । 

बुधवार, 7 अक्टूबर 2015

* शर्त (बाजी) *

                   र्त जितना ही छोटा शब्द है , इसकी परिणाम और इसे पूरी करने के लिए लिया गया प्रतिज्ञा और इच्छा उतनी ही बड़ी होती है। इस जगत में जितने प्रकार के लोग हैं , उतने ही प्रकार के शायद शर्त  भी है। लोग एसे भी शर्त  लगाते हैं ! हमने सोचा भी नहीं था। वो भी औरत। जब पूरी बात मेरा दोस्त राजु ने बताई तो मैं दंग रह गया। आज उसकी आपबीती को कलमबंद करने जा रहा हूँ। 

                      राजू  सभ्य नेक और चरित्रवान लड़का है। उसके चरित्र पर उसके घर वाले , खास कर माँ और बहन को पुरा भरोसा है। वह हर कार्य को समय से संपन्न करता है। उसे अपने पास-पड़ोस और समाज से सराहना मिलते रहता है। उसे (राजू  को) उसके दोस्त नागा के नाम से भी कभी-कभी सम्बोधित करते रहते हैं। नागा जैसा की मैं जनता हूँ  , भारत में साधुओं का एक वर्ग है जो स्त्रियों से दूर रहते हैं। उनका शरीर और विचार पर नियंत्रण रहता है। शायद इसी तुक या तर्क का इस्तेमाल उसके दोस्त उसके प्रति करते हैं। 

                          राजू  तीन भाई दो बहन है। एक भाई उससे छोटा और सभी भाई-बहन उससे बड़े हैं। दोनों बहन की शादी हो गई है। राजू  के बड़े भाई का शादी हुआ उसके तदुपरांत (तुरन्त बाद) की यह बात है। शादी बड़े धूमधाम यानी अपने आर्थिक स्थिति के अनुसार, नोक-झोक के साथ सम्पन्न हुआ। दुल्हन यानि राजू जी की भाभी जी घर आ गई। रीती-रिवाज के अनुसार पूजा-पाठ हुआ , चौठारी हुई साथ में सगे-सम्बन्धी जो शादी में सपरिवार आए थे , वे भी अपने-अपने घर को जाने लगे और चले भी गए। उसके यहाँ सिर्फ उसके दोनों बहन रुक गई , इसका कारण था की राजू की माँ को कही रिस्तेदारी में खास वजह से जाना था। राजू भी अपनी माँ संग गया ,वहाँ से वे लोग डेढ़ माह के बाद वापिस आए। वापिस आने के बाद राजू बताता है की वह भी अपने दिनचर्या के अनुसार अपने कार्यो में व्यस्त हो गया। उसी दौरान उसे आभास हुआ की जरूर कोई बात है।  फिर उसे जो जानकारी  प्राप्त हुई वह चौकाने वाली थी।

                            वह बताता है की शादी के वाद वह (राजू) और माँ घर पर नहीं थे। घर पर उसके भैया-भाभी , पिताजी दोनों बहन , छोटा भाई और एक चाची जी थी। भाभीजी अच्छी थी यानी दिखने में आकर्षक थी। उन्हें घर का सभी सदस्य मानते थे। उनका छोटा देवर यानि राजू का छोटा भाई उनसे नहीं भी तो ८ वर्ष छोटा होगा। उनका पूरा ख्याल रखता था। वह जो कहती थी , वह उस आदेश को तत्परता से निपटाता था। ननंद भी उन्हें मानती थी पर कुछ समय बाद उनके आचार-व्यवहार से दोनों नाखुश रहने लगी। एक तो बड़ी वाली दिखने में उतना चरफर नहीं थी , पर वह हर बात को गुनती थी , वह अपनी सुविधा या सहुलियत के अनुसार ही किसी से कोई वार्तालाप करती थी। वह किसी को सवारने , सलाह देने या किसी की जीवन में उसके रहने के तरीके में दखलंदाजी नहीं देती थी। उसे सिर्फ समय से खाने और आराम करने से था। वही राजू की छोटी बहन चरफर थी। कैसे रहना है , क्या करना है , किसी से क्या बोलना है इत्यादि पर ज्यादा ध्यान देती। साथ ही वह घर में महिला सदस्यों में छोटी भी थी जिस से उसे रसोइयाँ का सारा कार्य करना पड़ता था। प्रारम्भ में तो सौख से करती थी पर बाद में उसकी मज़बूरी हो गई। ज्यादातर गाँवो में कोशिस किया जाता है की नई दुल्हन को सवा माह चूल्हा-चौका न करनी पड़े। यह रिवाज उन पर भाड़ी पर गई। उनकी भाभी कोई काम में तो हाथ नहीं बटाती साथ में अपनी साडी कपडा खोल कर छोड़ देती थी , जिसे उनकी छोटी ननंद धोती थी। अती  तो तब हो गया की जब वह अपनी अन्तरंग वस्त्र भी छोड़ने लगी। चाची को इस सब से कोई मतलब नहीं था। एसे वह अलग खाना खाती थी , पर उनका आंगन एक ही था। उनका काम था उतार-चढ़ाव बोलना , कभी भी वह एसा नहीं बोलती थी जो किसी के लिए सही हो। उनका मोटो था " हम को क्या लेना है " एसा क्यों बोला जाए की अगला को अच्छा न लगे। जैसा की सभी जानते हैं , चोरी करना गलत है पर वह यह  बोल कर भी खुश नहीं हैं , अगला को नाखुश नहीं करना ही उनका मकसद था।

                            इसे हम नारी नीति भी कह सकते है , सभी अपने-अपने स्थान या तर्क के अनुसार सही हो सकते हैं। आपको बताते चले की इसी सवा माह में ही राजू के भाभी और छोटी बहन में कहासुनी हो गई। राजू के छोटी बहन को उसके भाभी और छोटे अनुज का रहने का तरीका अच्छा नहीं लगा । राजू की बहन ने भाभी से कही "आप बड़ी हैं आप एसा कैसे कर सकती हैं , किसी को सवार नहीं सकती तो आप को उसे बिगारने का कोई अधिकार नहीं है।" इसबात पर उनकी भाभी बोली "मैं कैसे भी रहूँ आपको क्या ? मैं घर के प्रत्येक सदस्य को अपने कस में अपनी मुठ्ठी में रखुँगी , उसके लिए हमें चाहे कुछ भी ककरणी-करानी परे।" तब राजू की बहन बोली देखती हूँ ! उसकी भाभी बोली देखना राजू भी मेरे इसारो पर नाचेगा।

                            राजू और उसकी माँ रिस्तेदारी से घर आ गए। माँ के डर या लाज-लिहाज से सभी लोग अपनी-अपनी कामो का सही से निष्पादन करने लगे। माँ का टोका टोकी शुरू हो गया जो एक सही अभिभावक को करनी चाहिए।  कुछ रोज रहने के बाद राजू की बड़ी बहन अपने ससुराल चली गई। राजू के रिस्तेदारी से आने के बाद दोनों बहनों में कुछ कहा-सुनी या राय-सुमारी हो रही थी।  जिसे राजू पूरी तरह सुन चुका था। उसकी बड़ी बहन बोली तुम्हे उस सब से क्या लेना है , रहना है तो चुप-चाप कुछ दिन रहो। तु सभी को सवारने , चरित्र निर्माण का ठिका ली हो का ? कैसे रो रही थी , भाई हम तो चली। पर छोटी बहन कुछ नहीं बोली। राजू सभी सभी बातों को सही तरीके से समझ लिया। उसे यह भी मालूम हो गया की दोनों ननद भाभी में शर्त लगी है की कैसे उसे (राजू को) तुम कस(वस) में करती हो।

                                राजू बताता है की वह भी मन ही मन सोचा देखता हूँ , भाभी जी कौन सी मंतर चलाती हैं। जैसा की हमें ज्ञात है राजू  कर्त्तव्य निष्ट है।  वह अपने स्तर का सारा कार्य को बखूबी निपटाता है। गाँव-घर में जितनी एक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है।

                                भाभी राजू का बखूबी ध्यान रखती थी ,राजू भी उनके हर आदेश (कार्य) को निपटाता था , पर वह पहले अकेला में माँ से आज्ञा लेता था या उनकी जनकारी के लिए बता देता था। भाभी जी भी उसके खाने-पिने का पूरा ख्याल रखती थी। वह जब शाम को जब घर आता तो भाभी जी उसकी हाथ पैर में तेल लगाती , सर दबाती जो उसे अच्छा लगता था। कही से कोई खाने की वस्तु आती तो वह राजू के लिए अवश्य रखती थी। यह सारी  बातें राजू को बहुत अच्छा लगा। पर वह भाभी को कुछ भी ला कर देता तो माँ को अवश्य बता देता। राजू उनसे आँगन में ही बात करता था। राजू अगर शाम को खाना खाने आता तो अगर खाना बन रहा होता तो वहीं रसोई घर में ही बैठ कर खा लेता। रसोई घर दो तरफ से खुली थी।  जब खाना बन जाता तो सभी लोग आँगन में ही खाते।  भाभी जी अपना विशेष प्रभाव न देख जान गई की राजू शख्त मिजाज का है। वह यह भी जान गई की राजू सभी बात को माँ जी को बता देता है या जो हमें वह ला  कर देता है वह पूर्ण रूप से छुपा हुआ नहीं है तो वह उस से दूसरी तरह से पेस आने लगी। वह उसे तेल लगाती तो उसके सर से अपनी उरेज सटा देती ,उसके सर में घर्षण करती कभी चुम्मा ले लेती इत्यादि कामुक गतिविधियाँ करती। राजू भी मन ही मन सोचा आखिर देखना चहिए की यह कितनी स्तर तक निचे गिर सकती हैं। राजू उन्हें सह देने लगा तो वह...... स्तर तक पहुँच गई , पर राजू वहाँ से वापिस आ गया। वह उस गर्त में नहीं गिरा (उतरा) । वह बता रहा था की अब वह उनसे न तो ज्यादा बोलता है और न ज्यादा सम्पर्क रखता है। वह कहता है की उनके लिए वह पहले वाली प्रतिष्ठा भी उसके दिल में नहीं रहा। अब दिखावे के लिए दुनियाँ वालों के सामने औपचारिकता के लिए अभिवादन अभिनन्दन होता है। आगे राजू कहता है की वह इतना आगे इस लिए पहुँचा की वह उनकी वास्तविकता जानना चाहता था की क्या एसा भी हो सकता है की , "र्त" के लिए एक शादी-शुदा स्त्री ..... गर्त के स्तर तक जा सकती है। उसके इस व्यवहार से घर में कुछ भी हो सकता है। क्या एक पुरूष औरत को उसी के विचार से नहीं बांध सकता है ? उस पर अपनी मर्जी नहीं डाल सकता ? एसा हो सकता है। राजू कहता है की मेरा ह्रिदय कहा की यह एक सभ्य पुरुष के लिए उचित नहीं है। इसे बाद में ब्लैक मेल की संज्ञा भी दी जा सकती है , अगर आप किसी यंत्र का इस्तेमाल करते हैं। साथ में इसे नैतिक रूप से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। राजू उन से दुरी बना लिया और मन में निश्चय किया की वह न तो कभी किसी के आगे शर्त रखेगा यानि अनावश्यक बाजी नहीं लगाएगा ,  हो सकेगा तो वह इस विचार का प्रसार भी करेगा। जिस से शर्त लगाने की प्रवृर्ति हतोसाहित हो सके। 

बुधवार, 23 सितंबर 2015

* एक पहलु *

                 आज सभी जगह समानता की लड़ाई जारी है। इसके लिए सभी स्तरों पर जागरूकता अभियान , आंदोलन चलाए जा रहें हैं। घर और समाज सभी जगह इसी पर चर्चा जारी है। जैसे महिला शसक्तीकरण , लड़का-लड़की एक समान के नारे लगाए जाते हैं।

                 अगर भारतीय इतिहास पर ध्यान दिया जाए तो सारी शक्ति महिलाओं के पास ही थे। सृष्टी निर्माण का श्रे भी एक महिला आदि शक्ति को ही जाता है। भारत में न तो पहले प्रदा प्रथा थी न ही सती प्रथा। आज एसे अनेकों कुरुतियाँ हैं जो पुरातन भारत में नहीं थे। नारी को शादी से ले कर जीवन के सभी क्षेत्रो में स्वंत्रता प्राप्त थी। धीरे-धीरे उनका स्तर गिरता गया और उनकी आज यह स्थती है। सभी अपने स्तर के लिए स्वयं उतना ही दोशी होते हैं जितना दूसरा।

                एसे विभिन्ता तो सृष्टी का नियम है , न विभिन्ता समाप्त हो सकती है न सभी समान हो सकते हैं। सृष्टी को गतिमान रहने के लिए दोनों को रहना ही होगा। हम चाह कर भी इसे नहीं मिटा सकते। अगर हम कहे की लिंगता का निर्धारण कैसे होता है , तो पहला आधार जैविकता है ,जिसमें शारीरिक संरचना आता है अर्थात शरीर की आंतरिक और ब्राह्य बनावट। दूसरा आधार समाजिक है। जन्म के साथ ही जैविक आधार पर उसे खान-पान , पोशाक , माहौल , सोच दिया जाता है। जिसके कारण एक अलग सोच , रहन-सहन , बोल-चाल विकसित हो जाता है। जो लिंगता निर्धारण का आधार बनता है।

                  आज पुनः समाज , परिवार के सदस्यों का खास कर माता-पिता का अपने लड़कियों के प्रति नजरिया बदल रही है। ए इनके (लड़कियों के) विकास और उथान के लिए पूर्ण रूप से समर्पित हो रहे हैं , साथ में ए (माता-पिता) उस से आशा भी करने लगे हैं। वे अपने लड़कियों को अपना जीने का आधार और वृद्धा अवस्था या उसके पहले जरुरत पड़ने पर उसे अपना सहारा मान रहे हैं। बड़े लोग जिनकी आर्थिक स्थिती बहुत अच्छी है उनको छोड़ , मध्यवर्गीय और निम्नवर्गीय परिवार की सम्पति उनका संतान ही होता है। जिसके सहारे इस परिवार के बुजुर्ग अपना जीवन व्यतीत करते हैं।

                  अब नारी वर्ग यानि महिलाओं का कर्त्वय बनता है की जब उनका परिवार उनके प्रति समर्पित है या थे, तो वे भी उनके निर्वाह के लिए अपना हाथ बढ़ाएं , जिससे समाज के अन्य परिवारों और लोगों की यह भर्म जाती रहे की लड़कियाँ पराई सम्पती है। अगर लड़कियाँ इस ओर अपनी हाथ नहीं बढ़ाती हैं तो जैसे आज के कुछ लड़कों के कारण उनके परिवार का मोह भांग हो रहा है , वे अपनी जिम्मेदारी (जिम्मेवारी) लड़कियों को दे रहें हैं या खुद कर रहें हैं। वृद्ध लोग अपने देख-भाल के लिए संघ बना रहें हैं या अपनी देख-भाल के लिए किसी संगठन को पूर्व सर्त अनुसार भुगतान कर रहें हैं। अगर लड़कियाँ भी अपनी जवाबदेही नहीं समझेंगी तो लड़कियों से भी  इनका पुनः मोह भंग हो जाएगा। आज मध्यवर्गीय परिवार के कामकाजी लड़कियों को इस ओर विशेष ध्यान देने की जरुरत है। हम आगे कुछ उदाहरणों का वर्णन करूँगा जिस से समाज में पुराने नजरियाँ को कायम रखने में मदद मिलता है।

                  हम जहाँ रहते हैं वहाँ की कुछ लड़के-लड़कियाँ जो तुरंत मैट्रिक या इण्टर उत्तीर्ण  किए थे। वे आर्थिक तंगी से छुटकारा पाने के लिए टियुसन पढ़ाना सुरु किया जो उनके विकाश में सहायक भी साबित हुआ। इसमें हमने गौर किया की लड़के अपने खर्च को कम कर उसी में से घर वालो को कुछ राशि दे देते थे या अपनी पढाई इत्यादि का पूर्ण वहन करते थे , पर वहीं लड़कियाँ उस पैसे से कभी अपना कपड़ा तो कभी कोई श्रृंगार और जेवर खरीद लेती थी। अपनी पढाई तो जारी रखती थी पर अभिभावक से नामांकन , रजिस्टेस्न , फार्म भड़ते समय सहयोग कि मांग करती थी। अभिभावक भी कुछ नहीं बोलते थे और कहते , इसको पराये घर जाना है ,अभी नहीं पहने ओढ़ेगी तब कब ए सब करेगी।  ग्रामीण क्षेत्रों में कई लोगो को यह भी कहते सुना की हमें लड़की की कमाई नहीं खानी , जो अभिभावक की मनोवृति को दर्शाता है। समाज में अपनी स्थान बनाने के लिए लड़कियों को भी अपनी सोच बदलने की जरुरत है।

                    एक अन्य घटनाक्रम :- मेरा एक दोस्त है विनय राय। उसके परिवार में उसके माता-पिता , स्वयं एवं उसकी पत्नी के अलावा उससे दो वर्ष छोटी बहन एवं बहन से तीन वर्ष छोटा भाई है। इनके माता-पिता मध्यवर्गीय परिवार के हैसियत अनुसार इन्हे पढ़या लिखाया। विनय इण्टर उत्तीर्ण  होने के उपरान्त भारत सरकार के कर्मचारी के अंतर्गत कार्यरत हो गया। उसका घर की स्थिति अच्छी थी। विनय के नियुक्ती के उपरांत आर्थिक तंगी बिलकुल जाती रही। विनय अपना पूरा वेतन पिता जी को सुपूर्त कर देता था। इसी दौरान उसकी बहन आशा स्नातक उत्तीर्ण कर गई। तदनुपरान्त आशा सि०आई० एस० एफ० (C.I.S.F.) में एस० आई० ( S.I.) पद के लिए निवेदन की , परीक्षा उत्तीर्ण करते हुए वह एस० आई० पद पर नियुक्त हो गई। विनय और उसके परिवार के सारे सदस्य खुस थे।

                        उसके (आशा की ) नियुक्ति के तीन वर्ष बित चूका था। विनय एक दिन बैठा कुछ सोच रहा था। मैं उसके पास गया और उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा क्या बात है। वह सारी बात बताने लगा। वह बोला बहन की शादी करनी है। तुम जानते ही हो वह C.IS.F. में S.I.है उसके अनुसार ही तो घर-वर ढूँढना पड़ेगा।  मैं बोला दिकत काहा आ रही है। तुम कमा ही रहे हो उसकी सेवा भी तीन वर्ष से ज्यादा हो गई , पैसे की तो कोई कमी नहीं होनी चाहिए। वह बोला क्या बात करते हो उसके वेतन में से पैसा कहाँ बचता है। वह सारी पैसा खर्च कर देती है। मैं बोला कैसे ? विनय बताने लगा , वह अपने वेतन से अपनी खर्च चलाती है , अपने लिए सभी सुख-सुबिधाओं की वस्तु  खरीद रही है। साथ में आभूषण (जेवर) बनवाती रहती है। अपने लिए महंगा-महंगा कपड़े की सेट और क्या-क्या खरीदती रहती है। साथ में फ्लैट भी किराए का है। हम लोगों के लिए भी उपहार खरीदती रहती है। हम लोग उसके पास जाते हैं तो रहने खाने से भर्मण का सारा खर्च वही व्यय करती है। जब वह घर आती है तो सभी के लिए कपड़ा लाती है जाते वक़्त पिता जी को पाँच-सात हजार रुपया हाथ में दे देती है। मैं कहा इसमें क्या बुड़ाइ है , वह कम से कम सभी का जीवन स्तर तो उच्चा कर दी तो वह हँस दिया। मैं बोला तुम उसके शादी के खर्च के लिए कभी उस से या पिता जी बात किया ? विनय बोला किया था , पिता जी बोलें 'बेटी है' , क्या बोलें , उसकी शादी का खर्च तो हमारी जवाबदेही है। अगर तुम भी अपना वेतन हमें नहीं देते तो मैं क्या कर लेता ? उसके आय पर हमारा कोई अधिकार नहीं है। इतना तो है की वह जहाँ रहेगी खुश रहेगी।  कुछ माह के बाद हमें ज्ञात हुँआ कि विनय अपनी बहन की शादी C.I.S.F. में ही लड़का S.I .है उसी से तय किया है और शादी  निश्चित समयानुसार हो भी गई। विनय बताता है की उस शादी में उसके परिवार का दस लाख रूपये के आस-पास खर्च हो हुआ। 

                   अब आप ही बताइए की यह विचारणीय पहलु है या नहीं। इस पहलु पर हम सभी को विचार करने की जरुरत है। बिशेष कर माता-पिता और लड़की को। इस एक पहलु से समाज का एक बड़ा सोच जुड़ा हुआ है। यही सोच आगे सामाज में होने वाली परिवर्तन और विकाश का दिशा निश्चित करेगा। लड़कियों को उनका कर्त्वय  ही उन्हें अधिकार दिलाएगी।  किसी ने कहा है "  कर्त्वय  ही अधिकार की जननी होती है " . इस में संसय नहीं की जा सकती। 

बुधवार, 12 अगस्त 2015

* कलगीजा *

                                 कलगीजा एक ऐसा शब्द है , जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में खास कर महिलाओं  द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। एसा नहीं है कि पुरष इस शब्द का प्रयोग नहीं करतें या उनके प्रयोग पर रोक है। पुरष का बहुत कम प्रतिशत इस शब्द का इस्तेमाल करता है। एसे यह शब्द झुठ , फरेब , धुर्तई का मिला-जुला रूप है। इसके अंतर्गत अपने फायदे दूसरे को नुकसान पहुचाने , अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए धुर्तईपूर्ण किया गया कार्य जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता आते हैं। इसके अंतर्गत सामने वाला को मुर्ख समझ या वह एसा अनुक्रिया करेगा जो करने वाले के अनुरूप हो और सामने वाले को उकसाने के लिए किया जाता है।
       
                                 यहाँ हम आय दिन होने वाली करवाई की या एसे क्रिया-कलापो की चर्चा करेंगे जिससे कलगीजा को समझा जा सके। इस प्रकार के उदाहरण निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं :-
                               
                               * एक मध्यवर्गीय परिवार जिसमे माता-पिता के साथ उन्के पुत्र-पुत्री हैं।इस परिवार में एक बड़ा लड़का है जिसकी शादी हो गया है। परिवार में सिर्फ वहीं यानि बड़ा लड़का मुख्यरूप से कमाने वाला है या यू कहे की वह अन्य सदस्यों के अपेक्षा ज्यदा आय करता है। बड़े लड़के की पत्नी जब घर के सदस्यों के लिए भोजन बनती है तो स्वयम और अपने पति के लिए अलग से कुछ न कुछ बनाती है। जिसका घर के अन्य सदस्यों को मालूम नहीं होत. इसमें दोनों की रजामंदी हो सकती है और नहीं भी। इसके साथ हीं वह जब खाने या अन्य वस्तुओं को जिसकी आवश्यकता अन्य सदस्यों को है उसे छुपा देती या समाप्त हो गया बताती है। यहाँ तक की कभी-कभी आपातकाल के लिए रखी वस्तु या खाने की समाग्री जैसे किसी को सुबह-सुबह दफ्तर या विधालय जाना है , वह शाम या दोपहर (मध्याहन) के बाद घर आएगा उसके टिफिन के लिए जो है उसे छुपा देती या समाप्त हो गया बता देना। अगर सिर्फ पत्नी करती है तो उसे उसका पति नियंत्रित करता है, इसके लिए घर में थोड़ा-बहुत नोक-झोंक भी होता है। पर जब उसके पति को सारे कारनामे मालुम होते हुए भी वह मौन रहता है। इस से मालुम होता है की इसमें उसका भी मौन स्वीकृती है। इस से स्पष्ट होता है की वह अपने आय का पूर्ण उपभोग करता है या करना चाहता है। अपने आय को अन्य लोगों पर खर्च नहीं करना चाहता , साथ में घर-परिवार के बंदिश से स्वतंत्र रहना चाहता है। इसमें लोग सफल भी हो जाते हैं। इसी कड़ी में बड़ा भाई अपने पत्नी को किसी वजह से कहीं भेज देता है। घर चलाने के लिए न तो पैसा देता है और न आवश्यक समाग्री लता तदपुरान्त घर के सदस्य उससे कहते हैं तो कहा-सुनी सुरु होता है,वह घर आना बंद कर देता है। वह कहीं और भोजन करना शुरू करता है फिर अपनी पत्नी के साथ कही और रहने लगता है। घर के सदस्यों से उसका कोई सरोकार नहीं रहता , कौन भूखा रह रहा है , किसकी शिक्षा रुक गई ,कोई बीमार है तो उसका उपचार काहा और कैसे होगा , वह दावा के लिए कहाँ से पैसा लाएगा इत्यादि सभी समस्याओं से वह मुँख मोड़ लेता है। आय दिन इस प्रकार की कलगीजा आपको देखने को मिल जाएगी।  
                                 
                                 * किसी परिवार में जब सास ननंद एक या दोनों अपनी बहु को प्रताड़ित करवाने के लिए या उठलु बनाने के लिए गिरी हुई हरकत करती हैं और उसे घर के अन्य सदस्यों के समकक्ष उजागर करती हैं , कलगीजा कहलाती है। उनके हरकत निम्न प्रकार की हो सकती है :- जैसे भोजन के दाल या सब्जी में नमक मिला देना। कोई वस्तु ज्यदा बर्बाद करती है अन्य सदस्यों को बार-बार बतलाना।  उसे हर समय अनावश्यक टोका-टोकी करते रहना। सभी के पास उसकी शिकायत करना। कभी-कभी तो लोग उसे बात सुनाने के लिए उसके काम को विगाड़ते रहते हैं। जैसे:- कपड़े में दाग लगा देना , तरतीब घर के सामान को वेतरतीब कर देना इत्यादि।

                                 * कभी-कभी महिलाएँ (लोगों को) परिवार को परेशान करने के लिए या अपनी जिद मानाने के लिए बीमारी का ढोंग करती हैं। इसमें सभी वर्ग की महिलाएँ आती हैं। इसके दो उदहारणो की चर्चा यहाँ करूँगा।

                                पहला - हमारे यहाँ एक शिक्षक रहते थे , उन्की पत्नी भी शिक्षित थी , वे कई दिनों से अपने पति को मायके जाने के लिए कह रही थी। कोई दूर से आया था , जिस से वह मिलना चाहती थी। उन्के पति के पास समय का अभाव था , जिस से वे उन्हें ले कर नहीं जा पा रहें थे। इसी दौरान वह बीमार हो गई उन्हें पेट में दर्द होने लगा।  उन्हें दिखाने के लिए रिजर्ब (आरक्षित) ब्लेरो से पास के शहर आरा ले जाया गया और वहीं उनकी उपचार हुई। कुछ घंटो के बाद वह बोलीं , "पास में हि मेरी मायके है, फलाने इतना दूर से बहुत दिनों पर आये हैं। हमारे पास अभी अपनी सवाड़ी है हीं हमसभी चलते और मिल कर पुनः घर चलते। " मास्टर साहब स्वीकृति दे दिए और मैं मुस्कुरा दिया।  वह पूछीं क्या हुआ , मैं बोलाकुछ नहीं। यह भी एक कलगीजा का ही रूप है।

                       दूसरी उदाहरण भी आपको सुनते चले - दानापुर (कैंट) शाहपुर के पास दियरा में एक गाँव है। वही की यह घटना है। वहाँ से एक औरत बार-बार रात में खाट (चारपाई) पर सुला कर उपचार के लिए शाहपुर आती थी। घर के साथ पड़ोसी भी परेशान थे। वह रात होते हीं पेट में दर्द है पुरा बदन दुःख रहा है कह कर छटपटाती और रोने लगती। फिर उसे उपचार के लिए शाहपुर बाजार लाया जाता , वो भी कंधे पर लाद कर , क्योंकी गाँव में न तो सड़क थी न कोई डॉक्टर न कोई वाहन। दो-तीन दिन के बाद वहाँ के कॉम्पाउंडर बताता है की उसके आते हि हम लोग सलाइंस चढ़ा देते हैं और उसी में पाँच-सात सदा-रंगीन सुई लगते थे उसी से वह ठीक हो जाती थी। फिर एक रोज वह खुद डॉक्टर को बताई की उसे कोई बिमारी नहीं है अनावश्यक इंजेकसन न दें सिर्फ सलाइन्स चढ़ा कर जितना हो सके झुठा सुई उसी में लगा कर पैसा एठा कीजिए। वह डॉक्टर को यह भी बताई की घर वालों एसा सलाह दीजिए की हमें गाँव से छुटकारा मिल जाए। मैं अपने पति के साथ या किसी शहर बाजार में रह सकु। हम लोगों को मालुम हुआ की उसका पति केंद्रीय कर्मचारी है और वह उसके साथ या शहर बाजार में रहना चाहती है।  उनके बात को सुन कर हमारे मुख से अन्यास ही निकल पड़ा क्या "कलगीजा " है।

                             * अनावश्यक उपहार या किसी वस्तु को किसी खास प्रयोजन के लिए देना कलगीजा का रूप ले लेता है। हमारे विचार से अनावश्यक उपहार या कोई वस्तु किसी को नहीं देना चाहिए अगर उस से हमारे घर-परिवार  में बिखराव हो सकता है। अगर आप बिखराव चाहते हैं तो फिर ठीक है। उसी का नाम कलगीजा पड़ता है। यहाँ मैं आपके सम्मुख एक उदहारण प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

                           एक परिवार जिसमें सास थोड़ा कर्कस विचार की थी। वह आपनी  हुकुम अनावश्यक रूप से चलाती रहती थी।  उनके विचार एवं कार्य से तंग आ कर उन से उनकी बहु उन से छुटकारा चाहती थी। एसे बहु का पति इतना आय नहीं करता था जिस से सब कुछ सही से चला सके। फिर भी सास के व्यवहार के कारण बहु निम्नजीवनस्तर में रह कर भी उन से छुटकारा चाहती थी। सास हर समय बहु से कलगीजा करती रहती। वह अपने पुत्र से बहु को हर समय बात सुनवाते रहती थी या मार-गाली का माहौल बना रखती थी। उसी कलगीजा में बहु शामिल होते हुए थोड़ा चावल , सास को बिना बताए मायके भेज दी। जिसके उपरांत घर में कलह हुआ और एक परिवार से से दो परिवार हो गया। जब हमने पड़ताल किया तो कारण तो यही था। उस चावल को बहु का पति ही पहुचाया था, लड़के की माँ यानी बहु की सास सास जितना चावल और जो चावल बता रही थी , वह चावल न तो उतनी थी और न उस कोटि की थी। जिसके कारण माँ-बाप से बेटा अलग हो गया। हमने अनुमान लगाया हो सकता है बहु अपने आवश्यकता के लिया और चावल किसी और को दी हो। 

                              संयुक्त परिवार में दूध में पानी मिला देना। अनावश्यक किसी को बदनाम करना।  पके-पकाए भोजन में कोई अनावश्यक वस्तु मिला देना। खाने-पिने की वस्तु खुला छोड़ कर फिर उसके दोश को किसी के उपड मढ़ कर सभी को बताना। खाने वाले सदस्यों के हिसाब से खाना कम बनाना।  इत्यादि कलगीजा का हीं रूप है।   

                             यह  एक प्रकार के छुद्र सोच का नतीजा है। जिसके माध्यम से लोग अपने हित या स्वार्थ को साधना चाहते हैं और दूसरे को नुकसान पहुचाना। जिसे हम गिड़ी हुई हरकत कह सकते हैं। हमारे विचार से इस प्रकार के हरकत एवं सोच से लोगों को दूर ही रहना चाहिए। जिस से एक साफ-सुथरी घर-परिवार समाज का  निर्माण हो सके। 

                                                   *****

शनिवार, 1 अगस्त 2015

* देखुँगी *

                                                           


                         हम दोनों यानी मैं और मेरा दोस्त राजू संध्या भ्रमण पर निकले थे। दो ही बिलकुल बिना एक-दूसरे को कुछ कहे बढ़ते जा रहे थें। मैं ही इस शान्ति को तोड़ते हुए राजू के कंधे पर हाथ रखकर बोला - क्या बात है बहादुर, बिलकुल शांत हो ? कौन सी चिन्ता आ गई, जो इतना विचार कर रहे हो ? हमसे बताओ, शायद दोनों के सोच से कोई हल निकल जाए। राजू ने कहा - क्या बताऊँ भाई, इसमें मेरा क्या कसूर है। मैं बोला - क्या हुआ? इतनी झल्लाहट क्यों महसूस कर रहे हो। राजू बोला - बात ही ऐसी है। मैं बोला - क्या बात हो गई ? राजू बोला - सुनो, प्रारम्भ से सुनाता हूँ। तुम्हें तो मालूम है, माँ मुझे बहुत मानती थी। इसका कारण भी तुम जानते ही हो। मैं अपने घर में न बड़ा हूँ और न सबसे छोटा। फिर भी एक घर में जो सबसे छोटे का फर्ज या कर्म बनता है, वह मैं करता था और आज बडे़ का भी फर्ज निभाना पड़ रहा है। खैर, इन बातों को छोड़ो। माँ का मुझे मानने के कारण कई लोगों ने मुझे सरवन (श्रवण) पुत्र का उपनाम भी दिया और कई लोग चिढ़ते भी हैं। जानते हो, एक बार की बात है, माँ देर से जागी। सूर्य उदय हो चुका था और उसने शरीर दर्द की शिकायत की। हमने उनके बदन को दबाया, फिर दिन चढ़ा, तो दवा लाकर दिया। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। मैं माँ को जल्दी जगने के लिए कहा और समय से तैयार होकर खाने के लिए कहा। हमारी माँ बहुत ज्यादा पानी इस्तेमाल करती है। साथ ही, स्वच्छता, साफ-सफाई पर बहुत ध् यान देती है। पूरे दिन हाथ भिंगोए रहेगी। सब काम निपटाने के बाद ही खाना खाएगी, जो हमें बहुत बुरा लगता था, जिससे उसका स्वास्थ्य दिनोदिन गिरता जा रहा था। ऐसा नहीं कि मेरे कहने का उन पर कोई असर नहीं पड़ा। वो हमारे कहे अनुसार दिनचर्चा में परिवर्तन लाने का कोशिश करने लगी। वो समय से खाये, इसके लिए मैं उससे एक दिन गुस्सा भी हुआ। उनके बगैर हम भी लाचार थे। वो भी लाचार थी। वो पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी, पर व्यवहार-कुशल थी। फिर वो सुबह-सुबह हमारे साथ अपना नाश्ता लाई और बोली - देखूँगी, तुम्हारी पत्नी कितनी सुबह उठती है और कितना तुम्हारा बात मानती है तथा कितना नखरा झेलती है। माँ का इतना बोलना था कि मै माँ के मुँह पर अपना हाथ डाल दिया और बोला मैं शादी नहीं करूँगा, तो वो मुझे प्यार से मारते हुए बोली - शादी तो मैं तेरा करूँगी ही, मेरे बाद तुझे कौन देखेगा। मैं बोला - आपने ऐसा क्यों कहा कि मैं तेरी पत्नी को देखूँगी (खोजूँगी)। अगर मैं खुद अपनी शादी करूँगा, तब तो आप ऐसा कह सकेंगी। खैर, लेकिन आपलोग जैसा और जिससे कीजिएगा, हमें मंजूर होगा। इतना कहकर राजू चुप हो गया। मैं बोला - तो इसमें कौन-सी बड़ी बात हो गई, जो तुम सोचने लगे।

                          उसने पुनः कहा - आगे सुनो, मेरी बड़ी बहनों की शादी हो गयी। वो अपने ससुराल चली गई। इसी क्रम में दीदी और जीजाजी में तकरार हो गया। मैं तो उनके सामने अभी छोटा था। मेरी बातों पर वे ध्यान नहीं देते थे, पर जो होता था, क्या वहउचित था या अनुचित ? अपनी राय के साथ मैं माँ को सुनाता था और माँ उस पर गौर करती थी। एक बार मैं अपनी माँ के सामने ही बहन को समझाते हुए कुछ करने का सलाह दिया और कुछ ऐसा शब्द, जिसे मै यहाँ नहीं कहना चाहूँगा, नहीं बोलने को कहा। साथ ही, कुछ बातों को दिमाग से निकालने के लिए कहा, तो वो मुझ पर गरम (गुस्सा) हो गई और बोलने लगी कि तुम्हारी पत्नी आयेगी तो देखूँगी कि उसे तुम कितनी कस में रखते हो और जाने क्या-क्या बोली, उन बातों को छोड़ो।

इसी क्रम में आगे सुनो, तुम्हें तो मालूम ही है कि हमारे यहाँ का कोई भी स्त्री-पुरूष, औरत-मर्द, लड़का-लड़की मुहल्लेवालों के फालतू गप्पबाजी में सम्मिलित नहीं होता। कभी भी काम से ही कहीं जाना है, नहीं तो अपने दरवाजे पर ही रहना है, जिसकी आदत हमें भी पड़ गयी थी। इसलिए माँ, बहन या मेरा छोटा भाई कहीं चले जाते थे, तो हम तुरन्त उन्हें बुलाने चले जाते थे और कहते था कि बाबूजी/भाईया बुला रहे हैं। एक दिन मैं अपनी बहन को बुला रहा था तो मेरी चाची ने कहा - देखूँगी, तू और तेरा भाई (मेरे भाई का नाम लेकर) अपने बीबी-बच्चे पर कितना पहरा देते हो। मैं बोला - तो क्या हो गया ?

                            राजू बोला - अब सुनो, मेरी नियुक्ति के पहले मेरे बड़े भाई की शादी हो गयी थी। भाभी जी घर आ गई थी। उनके आते ही मैं कुछ दिनों के लिए दूसरी जगह चला गया था। जब मैं घर आया, तो कुछ बातें हमें पसन्द नहीं आयीं, जो मैं बताना नहीं चाहूँगा। उसके लिए बोला, तो मेरी चाची बोलीं - बबुआ, गईल माघ उन्तीस दिन बाकी। तोहरो देखूँगी, अभी थोड़े ही मैं मर रही हूँ। मुझे बहुत बुरा लगा। मैं कुछ दिनों के बाद अपनी नियुक्ति पर चला गया। जब अवकाश पर आया, तो मेरे बड़े भाई घर-परिवार से अलग हो चुके थे। फिर भी मैं उन लोगों से मिलने गया। भाभी जी को देखा, उन्होंने कंजूसी की हद कर दी थी। उनकी एक बच्ची थी, उसे भी वह ठीक से नहीं खिलाती थीं। अपना पहनावा भी ठीक से नहीं रखी थी, जिसके लिए मैं बोला, तो वह बोली - बबुआजी ! देखूँगी, देखूँगी, आपकी रानी आएगी, तो कितना साफ-सुथरा रहती है। कितनी पुजेड़ी और सती रहती है। मेरा दिमाग खराब हो गया और मैं उनके यहाँ धीरे-धीरे आना-जाना कम कर दिया। मैं बोला - ये सब तो ठीक है, पर तुम्हारी चिन्ता का विषय क्या है ? वह बोला - आज तो अत (हद) ही हो गया। अब कोई यह शब्द भर बोलता है, तो मैं बहुत असहज महसूस करता हूँ। मैं बोला - वह शब्द क्या है ? तो वह बोला - पहले आज की बात सुनो। मैं बोला - ठीक है, सुनाओ। राजू बोलने लगा।

                              आज मैं और आपकी भाभी जी बैठे थे। शादी-विवाह पर चर्चा हो रही थी। शादी कब होना चाहिए, कैसे होना चाहिए आदि-आदि। इसी पर हम दोनों अपनी शादी की चर्चा करने लगे। मेरी एक साली है। तुम्हें मालूम ही है कि उसकी स्नातक की पढाई पूरा हुए चार वर्ष हो गये हैं। वे लोग (मेरे ससुराल वाले) अब उसके लिए वर ढूँढ रहे हैं और वह भी बेल्ट सर्विस वाला। तुम्हें तो मालूम है, इस समय किसी की नौकरी लगती है, तो पाँच वर्ष के अन्दर लगभग उसकी शादी हो ही जाती है। कोई-कोई शायद ही बच जाता है, जिसके पीछे कुछ कारण होता है। मैं भी अपनी साली की शादी के लिए चार-पाँच घर-वर देखा। एक लड़का तो हमारे कहने के अनुसार राजी भी था, पर उसका उम्र मेरी साली जी की उम्र से कम हो गया। तुम्हें पता है, तुम्हें क्या सभी को पता है कि 99 प्रतिशत लोेग अपने उम्र से कम या अपने उम्र की लड़की से ही शादी करना पसन्द करते हैं। इसी चर्चा के दौरान मैंने कहा - अगर लड़का-लड़की अपनी पसन्द से शादी करते हैं, तो कोई बात नहीं। पर कोई मध्यस्थ या अभिभावक शादी तय करते हैं, तो उन्हें कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए। आपकी भाभी जी बोली - वो कुछ बातें क्या हैं ? मैं बोला - हमें यानी लडकी के अभिभावक को अपना जीवन-स्तर देखनी चााहिए और यह देखना चाहिए कि उसमें लड़की सहजता से रहेगी या नहीं। दूसरा, लडकी के योग्य ही वर ढूँढ़ना चाहिए, जिसमें कद-काठी, रूप-रंग, शिक्षा-योग्यता की समानता हो। तीसरा, अगर आप बेल्ट सर्विस वाले से शादी करना चाहते हैं, तो आपको अपनी बच्ची कि शादी उन्नीस से चैबीस वर्ष के अन्दर करनी पड़ेगी। अगर आप डाॅक्टर, वकील, इंजीनियर या नागरिक सेवा (सविल सर्विस), अधिकारी (आॅफिसर) से शादी करना चाहते हैं, तो आप इसमें इंतजार कर सकते हैं। मैंने पूछा - तुम्हारे चिन्ता की बात क्या है ? वह (राजू) बोला - आगे सुनो। सभी जानते हैं कि हमारे भारतवर्ष में लड़की के अभिभावक को तिलक या उपहार के रूप में दहेज देना पड़ता है। दहेज के अनुसार ही वर का ओहदा निश्चित होता है। मैंने कहा - आपके पिताजी को क्या सूझ रहा है, उनसे कहो कि सिविल सर्विस या आॅफिसर से शादी करे, इतना दिन से सोए थे ! राजू ने कहा - अब तो उसके भाग्य के ही ऊपर है। तुम्हें मालूम है कि हमारी भी एक बच्ची है। तुम्हारी भाभी जी तुनक-कर बोली कि देखूँगी, आपकी भी एक लड़की हो गयी है न, उसे कैसे रखते हैं, क्या पढ़ाते हैं ? उसकी शादी कैसे घर-वर से करते हैं, देखूँगी। उसी समय से यह ‘देखूँगी’ शब्द हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है।

                                 अब तुम्हीं बताओ, इसमें मेरा क्या कसूर है, जो सभी लोग हमें ही देख रहे हैं। तुम मेरा इतिहास-भूगोल जानते ही हो। अब जब कोई इस लहजे में ‘देखूँगी/देखूंँगा’ शब्द व्यवहार में लाता है, तो मुझे लगता है कि मैं क्या करूँ। इसलिए मैं लोगों से अनावश्यक बात भी नहीं करना चाहता।

                               फिर क्या ? मैं अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखते हुए बोेला - अरे मेरे चिन्तक दोस्त, इतनी-सी बात अपने दिल पर लेते रहोगे, तो कैसे जी पाओगे। यही तो दुनिया है। अपना धर्म-कर्म क्यों भूल जाते हैं। अपने कत्र्तव्य का निर्वाह नहीं करेंगे, बस दूसरे को उपदेश देते रहेंगे और उसके कर्म को याद दिलाते रहेंगे। अच्छा एक बात बता - हमलोग यहाँ से जा रहे हैं और थोड़ा बहुत धूल उड़कर हमारे कपड़े और बाल पर पड़ गया और हमें आगे भी जाना है, तो हम क्या करेंगे ? वह (राजू) बोला - हम झाड़ेंगे और चलते रहेंगे। मैं बोला - बस-बस उसी तरह इस प्रकार की बातों को सुनो, जितना जरूरत हो, करो, बाकी छोड़ो और अपने सही कर्म-पथ पर बढ़ते रहो। मैं उसका कान पकड़कर हिलाते हुए बोला - समझा क्या ? वह हामी में सिर हिलाया
और मुस्कुरा दिया।

                                                                     ***

* हम ऐसे क्यों हैं *


                 हमारा कहने का अभिप्राय है विभिन्ता , कोई काला , कोई गोरा , कोई लम्बा, कोई नाटा प्रत्येक मानव , यहाँ तक प्रत्येक जीव-जंतु में भी विभिन्ता पाई जाती है। जब ऊपरी बनावट और आंतरिक संरचना को छोड़ दे तो हम देखते हैं कि सभी के स्मृती में भी अंतर है। आप देखे होंगे आपके वर्ग में एक विधार्थी किसी पाठ को एक बार में याद कर लेता है और कोई इसके लिए बार-बार अभ्यास करता है। कोई सिर्फ एक बार के र्स्वण (सुनने) भर से याद कर लेता है।

                हम देखते हैं कोई आसानी से अपने विकाश का सफर तय करता है और किसी को उसी सफलता के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। आखिर क्यों ? इस सृष्टी में कोई भी कार्य बिना कारण का नहीं होता है। जब कोई शिशु किसी के घर में जन्म लेता है या जब शिशु किसी को अपना जन्नी स्वीकार करता है , तो बड़ा होने के बाद वह अपने जन्नी को दोश देता है। उसे ए नहीं दिया गया वो नहीं दिया गया। पर इस में किस किसका दोश है। कोई गरीब परिवार में जन्म लेता है , कोई सम्पूर्ण परिवार में , इस सभी का उत्तर हम आगे पाने का कोशिश करेंगे।

             इस सृष्टी को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्नता अतिआवश्यक है। आप अपनी तलहथी को देखें अगर आपका सभी अंगुलियाँ बराबर हो जाये तो क्या ए सभी कार्य अभी जितना कुशलता से करता है , कर सकेगा ,जबाब है नहीं।
                 पहला अंतर रंग और आकृती से है , जो वंश (जनरेशन) से नियंत्रित होता है। जो जिस प्रकार के कुल, परिवार में जन्म लेता है उसका रंग और आकृती उस कुल और परिवार से सम्बंधित होता है और उसी से नियंत्रित होता है।

                 अगर हम स्मृति की बात करें तो यह कुछ वंशानुगत (जनेटिक) तो कुछ हमारे कर्म से नियंत्रित होता है। हमें कैसा माता-पिता मिला ए हमारे कर्म पर निर्भर करता है। जो जैसा कर्म करता है उसे उसी प्रकार का अस्तन और माता-पिता प्राप्त होता है। संतान अपने कर्म से ऊँचाई को प्राप्त करता है,पर जो सत्य कर्म उन्के माता-पिता करते हैं उसका फल भी संतान को प्राप्त होता है। एक लकोक्ति है 'पुत्र बढ़े पिता के धर्मे खेती उपजे अपना कर्मे'

                  वेलगेट्स ने कहा है:- 'हम अगर गरिबी में जन्म लेते हैं तो उस में हमारा कशुर नहीं है , पर अगर हम गरिबी में मरते हैं तो ए हमारा कसुर है '। पर हमारे विचार से दोनों अवस्था में हम हीं दोशी हैं जो जैसा कर्म करेगा वैसा हीं पाएगा।

                 धर्म शास्त्र और यहाँ तक की विज्ञान भी सिद्ध करता है की जो जैसा करेगा वैसा पाएगा। आप देख सकते हैं , जब दो व्यक्ति में एक प्रातः काल में जग कर भर्मण पर जाता है और निश्चित समय पर सभी कामों (कार्यो) को करता है और दूसरा जो देर से जगता है और व्यसनों का आदि है। दोनों के आर्थिक समाजीक एमं शारीरिक स्तर में कितना अंतर है। पहला आदर का पात्र है तो दूसरा नफरत का।

                इस धरातल पर मनुष्य आया हुआ है चाहे वो जिस भूमिका में हो यथा माता-पिता , भाई-बहन, पति-पत्नी , गुरु-शिष्य , सगे-सम्बन्धी आदि अगर सभी अपनी भुमिका कर्त्वय का सही पालन कर रहें तो अच्छी बात है , वे इस जन्म से दूसरे जन्म तक सफल रहते हैं। अगर कोई दम्पति संतति पैदा कर उसका अपने सामर्थ्य के अनुसार सही देख-भाल नहीं करता है तो उसे उसका भरपाई इस जन्म से उस जन्म तक करना ही होगा। अगर कोई संतान अपना कर्त्वय सही से नहीं निभाया है , तो उसे भी अपना कर्म भोगना होगा। यह सिद्धांत हर मनुष्य पर हर रिस्ता पर यहाँ तक की जिव-जंतु पर भी लागु होता है। यहाँ कोई इंसान बड़ा या छोटा नहीं होता उसे बड़ा या छोटा उसका कर्म बनता है। आप देख सकते हैं घर , गाँव , देश , विदेश (विश्व) सभी लोगों को यह दुनियाँ नहीं जानती और नहीं मानती जो अपना कर्त्वय अपना धर्म सही तरीके से निभाते हैं, उन्हें ही लोग जानते और मानते हैं। गोस्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है :-
                                               "कर्म प्रधान विश्व करी राखा ,
                                               जो जस करनी तासु फल चाखा "।
अतः जो जिस स्तर पर है उसे अपना कर्त्वय सही और उचित तरीके से निभाना चाहिए।
                     
                  अगर हम गरीब हैं तो उसका जिम्मेवार हम हैं क्यों की या तो हम अपना श्रम का उचित इस्तेमाल नहीं कर रहे या अपना श्रम शक्ति के लिए उचित पारिश्रमिक नहीं ले रहे या उन्हें उचित परिश्रमिक नहीं मिल रहा , अगर दोनों कर भी रहे हैं या हो भी रहा है तो भी गरीब बने हुए हैं तो इसका मतलब हम अपने धन का गलत इस्तेमाल कर रहें हैं। अगर हम ज्यादातर अस्वस्थ्य रहते हैं तो उसके लिए भी हम खुद जिम्मेवार हैं। या तो हमारा आहार-व्यवहार ठीक नहीं हैं या हम अपना नित्य कर्म सही नहीं करते हैं या हमारे पास स्वास्थ्य सम्बन्धी सही जानकारी नहीं हैं। हमारी समझ से सारी समस्या का समाधान जानकारी (ज्ञान) है और सही तथा उचित जानकारी हासिल या प्राप्त करना हमारी खुद की जिम्मेवारी है।
                   
                 अतः हम जैसा भी हैं जिस स्थिति में हैं उस स्थिति के लिए सिर्फ दूसरे को दोश नहीं दे सकते। आप खुद एक बार निसपेक्ष सोच कर देखिएगा। हम ऐसा क्यों हैं। उसका उत्तर खुद व खुद मिल जाएगा।
उत्तर मिल जाता है तो अवश्य बताइएगा तब तक के लिए नरेन्द्र को इजाजत दिजिए। धन्यवाद ।