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बुधवार, 12 अगस्त 2015

* कलगीजा *

                                 कलगीजा एक ऐसा शब्द है , जिसे ग्रामीण क्षेत्रों में खास कर महिलाओं  द्वारा इस्तेमाल किया जाता है। एसा नहीं है कि पुरष इस शब्द का प्रयोग नहीं करतें या उनके प्रयोग पर रोक है। पुरष का बहुत कम प्रतिशत इस शब्द का इस्तेमाल करता है। एसे यह शब्द झुठ , फरेब , धुर्तई का मिला-जुला रूप है। इसके अंतर्गत अपने फायदे दूसरे को नुकसान पहुचाने , अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए धुर्तईपूर्ण किया गया कार्य जिसे सही नहीं ठहराया जा सकता आते हैं। इसके अंतर्गत सामने वाला को मुर्ख समझ या वह एसा अनुक्रिया करेगा जो करने वाले के अनुरूप हो और सामने वाले को उकसाने के लिए किया जाता है।
       
                                 यहाँ हम आय दिन होने वाली करवाई की या एसे क्रिया-कलापो की चर्चा करेंगे जिससे कलगीजा को समझा जा सके। इस प्रकार के उदाहरण निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं :-
                               
                               * एक मध्यवर्गीय परिवार जिसमे माता-पिता के साथ उन्के पुत्र-पुत्री हैं।इस परिवार में एक बड़ा लड़का है जिसकी शादी हो गया है। परिवार में सिर्फ वहीं यानि बड़ा लड़का मुख्यरूप से कमाने वाला है या यू कहे की वह अन्य सदस्यों के अपेक्षा ज्यदा आय करता है। बड़े लड़के की पत्नी जब घर के सदस्यों के लिए भोजन बनती है तो स्वयम और अपने पति के लिए अलग से कुछ न कुछ बनाती है। जिसका घर के अन्य सदस्यों को मालूम नहीं होत. इसमें दोनों की रजामंदी हो सकती है और नहीं भी। इसके साथ हीं वह जब खाने या अन्य वस्तुओं को जिसकी आवश्यकता अन्य सदस्यों को है उसे छुपा देती या समाप्त हो गया बताती है। यहाँ तक की कभी-कभी आपातकाल के लिए रखी वस्तु या खाने की समाग्री जैसे किसी को सुबह-सुबह दफ्तर या विधालय जाना है , वह शाम या दोपहर (मध्याहन) के बाद घर आएगा उसके टिफिन के लिए जो है उसे छुपा देती या समाप्त हो गया बता देना। अगर सिर्फ पत्नी करती है तो उसे उसका पति नियंत्रित करता है, इसके लिए घर में थोड़ा-बहुत नोक-झोंक भी होता है। पर जब उसके पति को सारे कारनामे मालुम होते हुए भी वह मौन रहता है। इस से मालुम होता है की इसमें उसका भी मौन स्वीकृती है। इस से स्पष्ट होता है की वह अपने आय का पूर्ण उपभोग करता है या करना चाहता है। अपने आय को अन्य लोगों पर खर्च नहीं करना चाहता , साथ में घर-परिवार के बंदिश से स्वतंत्र रहना चाहता है। इसमें लोग सफल भी हो जाते हैं। इसी कड़ी में बड़ा भाई अपने पत्नी को किसी वजह से कहीं भेज देता है। घर चलाने के लिए न तो पैसा देता है और न आवश्यक समाग्री लता तदपुरान्त घर के सदस्य उससे कहते हैं तो कहा-सुनी सुरु होता है,वह घर आना बंद कर देता है। वह कहीं और भोजन करना शुरू करता है फिर अपनी पत्नी के साथ कही और रहने लगता है। घर के सदस्यों से उसका कोई सरोकार नहीं रहता , कौन भूखा रह रहा है , किसकी शिक्षा रुक गई ,कोई बीमार है तो उसका उपचार काहा और कैसे होगा , वह दावा के लिए कहाँ से पैसा लाएगा इत्यादि सभी समस्याओं से वह मुँख मोड़ लेता है। आय दिन इस प्रकार की कलगीजा आपको देखने को मिल जाएगी।  
                                 
                                 * किसी परिवार में जब सास ननंद एक या दोनों अपनी बहु को प्रताड़ित करवाने के लिए या उठलु बनाने के लिए गिरी हुई हरकत करती हैं और उसे घर के अन्य सदस्यों के समकक्ष उजागर करती हैं , कलगीजा कहलाती है। उनके हरकत निम्न प्रकार की हो सकती है :- जैसे भोजन के दाल या सब्जी में नमक मिला देना। कोई वस्तु ज्यदा बर्बाद करती है अन्य सदस्यों को बार-बार बतलाना।  उसे हर समय अनावश्यक टोका-टोकी करते रहना। सभी के पास उसकी शिकायत करना। कभी-कभी तो लोग उसे बात सुनाने के लिए उसके काम को विगाड़ते रहते हैं। जैसे:- कपड़े में दाग लगा देना , तरतीब घर के सामान को वेतरतीब कर देना इत्यादि।

                                 * कभी-कभी महिलाएँ (लोगों को) परिवार को परेशान करने के लिए या अपनी जिद मानाने के लिए बीमारी का ढोंग करती हैं। इसमें सभी वर्ग की महिलाएँ आती हैं। इसके दो उदहारणो की चर्चा यहाँ करूँगा।

                                पहला - हमारे यहाँ एक शिक्षक रहते थे , उन्की पत्नी भी शिक्षित थी , वे कई दिनों से अपने पति को मायके जाने के लिए कह रही थी। कोई दूर से आया था , जिस से वह मिलना चाहती थी। उन्के पति के पास समय का अभाव था , जिस से वे उन्हें ले कर नहीं जा पा रहें थे। इसी दौरान वह बीमार हो गई उन्हें पेट में दर्द होने लगा।  उन्हें दिखाने के लिए रिजर्ब (आरक्षित) ब्लेरो से पास के शहर आरा ले जाया गया और वहीं उनकी उपचार हुई। कुछ घंटो के बाद वह बोलीं , "पास में हि मेरी मायके है, फलाने इतना दूर से बहुत दिनों पर आये हैं। हमारे पास अभी अपनी सवाड़ी है हीं हमसभी चलते और मिल कर पुनः घर चलते। " मास्टर साहब स्वीकृति दे दिए और मैं मुस्कुरा दिया।  वह पूछीं क्या हुआ , मैं बोलाकुछ नहीं। यह भी एक कलगीजा का ही रूप है।

                       दूसरी उदाहरण भी आपको सुनते चले - दानापुर (कैंट) शाहपुर के पास दियरा में एक गाँव है। वही की यह घटना है। वहाँ से एक औरत बार-बार रात में खाट (चारपाई) पर सुला कर उपचार के लिए शाहपुर आती थी। घर के साथ पड़ोसी भी परेशान थे। वह रात होते हीं पेट में दर्द है पुरा बदन दुःख रहा है कह कर छटपटाती और रोने लगती। फिर उसे उपचार के लिए शाहपुर बाजार लाया जाता , वो भी कंधे पर लाद कर , क्योंकी गाँव में न तो सड़क थी न कोई डॉक्टर न कोई वाहन। दो-तीन दिन के बाद वहाँ के कॉम्पाउंडर बताता है की उसके आते हि हम लोग सलाइंस चढ़ा देते हैं और उसी में पाँच-सात सदा-रंगीन सुई लगते थे उसी से वह ठीक हो जाती थी। फिर एक रोज वह खुद डॉक्टर को बताई की उसे कोई बिमारी नहीं है अनावश्यक इंजेकसन न दें सिर्फ सलाइन्स चढ़ा कर जितना हो सके झुठा सुई उसी में लगा कर पैसा एठा कीजिए। वह डॉक्टर को यह भी बताई की घर वालों एसा सलाह दीजिए की हमें गाँव से छुटकारा मिल जाए। मैं अपने पति के साथ या किसी शहर बाजार में रह सकु। हम लोगों को मालुम हुआ की उसका पति केंद्रीय कर्मचारी है और वह उसके साथ या शहर बाजार में रहना चाहती है।  उनके बात को सुन कर हमारे मुख से अन्यास ही निकल पड़ा क्या "कलगीजा " है।

                             * अनावश्यक उपहार या किसी वस्तु को किसी खास प्रयोजन के लिए देना कलगीजा का रूप ले लेता है। हमारे विचार से अनावश्यक उपहार या कोई वस्तु किसी को नहीं देना चाहिए अगर उस से हमारे घर-परिवार  में बिखराव हो सकता है। अगर आप बिखराव चाहते हैं तो फिर ठीक है। उसी का नाम कलगीजा पड़ता है। यहाँ मैं आपके सम्मुख एक उदहारण प्रस्तुत कर रहा हूँ। 

                           एक परिवार जिसमें सास थोड़ा कर्कस विचार की थी। वह आपनी  हुकुम अनावश्यक रूप से चलाती रहती थी।  उनके विचार एवं कार्य से तंग आ कर उन से उनकी बहु उन से छुटकारा चाहती थी। एसे बहु का पति इतना आय नहीं करता था जिस से सब कुछ सही से चला सके। फिर भी सास के व्यवहार के कारण बहु निम्नजीवनस्तर में रह कर भी उन से छुटकारा चाहती थी। सास हर समय बहु से कलगीजा करती रहती। वह अपने पुत्र से बहु को हर समय बात सुनवाते रहती थी या मार-गाली का माहौल बना रखती थी। उसी कलगीजा में बहु शामिल होते हुए थोड़ा चावल , सास को बिना बताए मायके भेज दी। जिसके उपरांत घर में कलह हुआ और एक परिवार से से दो परिवार हो गया। जब हमने पड़ताल किया तो कारण तो यही था। उस चावल को बहु का पति ही पहुचाया था, लड़के की माँ यानी बहु की सास सास जितना चावल और जो चावल बता रही थी , वह चावल न तो उतनी थी और न उस कोटि की थी। जिसके कारण माँ-बाप से बेटा अलग हो गया। हमने अनुमान लगाया हो सकता है बहु अपने आवश्यकता के लिया और चावल किसी और को दी हो। 

                              संयुक्त परिवार में दूध में पानी मिला देना। अनावश्यक किसी को बदनाम करना।  पके-पकाए भोजन में कोई अनावश्यक वस्तु मिला देना। खाने-पिने की वस्तु खुला छोड़ कर फिर उसके दोश को किसी के उपड मढ़ कर सभी को बताना। खाने वाले सदस्यों के हिसाब से खाना कम बनाना।  इत्यादि कलगीजा का हीं रूप है।   

                             यह  एक प्रकार के छुद्र सोच का नतीजा है। जिसके माध्यम से लोग अपने हित या स्वार्थ को साधना चाहते हैं और दूसरे को नुकसान पहुचाना। जिसे हम गिड़ी हुई हरकत कह सकते हैं। हमारे विचार से इस प्रकार के हरकत एवं सोच से लोगों को दूर ही रहना चाहिए। जिस से एक साफ-सुथरी घर-परिवार समाज का  निर्माण हो सके। 

                                                   *****

शनिवार, 1 अगस्त 2015

* देखुँगी *

                                                           


                         हम दोनों यानी मैं और मेरा दोस्त राजू संध्या भ्रमण पर निकले थे। दो ही बिलकुल बिना एक-दूसरे को कुछ कहे बढ़ते जा रहे थें। मैं ही इस शान्ति को तोड़ते हुए राजू के कंधे पर हाथ रखकर बोला - क्या बात है बहादुर, बिलकुल शांत हो ? कौन सी चिन्ता आ गई, जो इतना विचार कर रहे हो ? हमसे बताओ, शायद दोनों के सोच से कोई हल निकल जाए। राजू ने कहा - क्या बताऊँ भाई, इसमें मेरा क्या कसूर है। मैं बोला - क्या हुआ? इतनी झल्लाहट क्यों महसूस कर रहे हो। राजू बोला - बात ही ऐसी है। मैं बोला - क्या बात हो गई ? राजू बोला - सुनो, प्रारम्भ से सुनाता हूँ। तुम्हें तो मालूम है, माँ मुझे बहुत मानती थी। इसका कारण भी तुम जानते ही हो। मैं अपने घर में न बड़ा हूँ और न सबसे छोटा। फिर भी एक घर में जो सबसे छोटे का फर्ज या कर्म बनता है, वह मैं करता था और आज बडे़ का भी फर्ज निभाना पड़ रहा है। खैर, इन बातों को छोड़ो। माँ का मुझे मानने के कारण कई लोगों ने मुझे सरवन (श्रवण) पुत्र का उपनाम भी दिया और कई लोग चिढ़ते भी हैं। जानते हो, एक बार की बात है, माँ देर से जागी। सूर्य उदय हो चुका था और उसने शरीर दर्द की शिकायत की। हमने उनके बदन को दबाया, फिर दिन चढ़ा, तो दवा लाकर दिया। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। मैं माँ को जल्दी जगने के लिए कहा और समय से तैयार होकर खाने के लिए कहा। हमारी माँ बहुत ज्यादा पानी इस्तेमाल करती है। साथ ही, स्वच्छता, साफ-सफाई पर बहुत ध् यान देती है। पूरे दिन हाथ भिंगोए रहेगी। सब काम निपटाने के बाद ही खाना खाएगी, जो हमें बहुत बुरा लगता था, जिससे उसका स्वास्थ्य दिनोदिन गिरता जा रहा था। ऐसा नहीं कि मेरे कहने का उन पर कोई असर नहीं पड़ा। वो हमारे कहे अनुसार दिनचर्चा में परिवर्तन लाने का कोशिश करने लगी। वो समय से खाये, इसके लिए मैं उससे एक दिन गुस्सा भी हुआ। उनके बगैर हम भी लाचार थे। वो भी लाचार थी। वो पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी, पर व्यवहार-कुशल थी। फिर वो सुबह-सुबह हमारे साथ अपना नाश्ता लाई और बोली - देखूँगी, तुम्हारी पत्नी कितनी सुबह उठती है और कितना तुम्हारा बात मानती है तथा कितना नखरा झेलती है। माँ का इतना बोलना था कि मै माँ के मुँह पर अपना हाथ डाल दिया और बोला मैं शादी नहीं करूँगा, तो वो मुझे प्यार से मारते हुए बोली - शादी तो मैं तेरा करूँगी ही, मेरे बाद तुझे कौन देखेगा। मैं बोला - आपने ऐसा क्यों कहा कि मैं तेरी पत्नी को देखूँगी (खोजूँगी)। अगर मैं खुद अपनी शादी करूँगा, तब तो आप ऐसा कह सकेंगी। खैर, लेकिन आपलोग जैसा और जिससे कीजिएगा, हमें मंजूर होगा। इतना कहकर राजू चुप हो गया। मैं बोला - तो इसमें कौन-सी बड़ी बात हो गई, जो तुम सोचने लगे।

                          उसने पुनः कहा - आगे सुनो, मेरी बड़ी बहनों की शादी हो गयी। वो अपने ससुराल चली गई। इसी क्रम में दीदी और जीजाजी में तकरार हो गया। मैं तो उनके सामने अभी छोटा था। मेरी बातों पर वे ध्यान नहीं देते थे, पर जो होता था, क्या वहउचित था या अनुचित ? अपनी राय के साथ मैं माँ को सुनाता था और माँ उस पर गौर करती थी। एक बार मैं अपनी माँ के सामने ही बहन को समझाते हुए कुछ करने का सलाह दिया और कुछ ऐसा शब्द, जिसे मै यहाँ नहीं कहना चाहूँगा, नहीं बोलने को कहा। साथ ही, कुछ बातों को दिमाग से निकालने के लिए कहा, तो वो मुझ पर गरम (गुस्सा) हो गई और बोलने लगी कि तुम्हारी पत्नी आयेगी तो देखूँगी कि उसे तुम कितनी कस में रखते हो और जाने क्या-क्या बोली, उन बातों को छोड़ो।

इसी क्रम में आगे सुनो, तुम्हें तो मालूम ही है कि हमारे यहाँ का कोई भी स्त्री-पुरूष, औरत-मर्द, लड़का-लड़की मुहल्लेवालों के फालतू गप्पबाजी में सम्मिलित नहीं होता। कभी भी काम से ही कहीं जाना है, नहीं तो अपने दरवाजे पर ही रहना है, जिसकी आदत हमें भी पड़ गयी थी। इसलिए माँ, बहन या मेरा छोटा भाई कहीं चले जाते थे, तो हम तुरन्त उन्हें बुलाने चले जाते थे और कहते था कि बाबूजी/भाईया बुला रहे हैं। एक दिन मैं अपनी बहन को बुला रहा था तो मेरी चाची ने कहा - देखूँगी, तू और तेरा भाई (मेरे भाई का नाम लेकर) अपने बीबी-बच्चे पर कितना पहरा देते हो। मैं बोला - तो क्या हो गया ?

                            राजू बोला - अब सुनो, मेरी नियुक्ति के पहले मेरे बड़े भाई की शादी हो गयी थी। भाभी जी घर आ गई थी। उनके आते ही मैं कुछ दिनों के लिए दूसरी जगह चला गया था। जब मैं घर आया, तो कुछ बातें हमें पसन्द नहीं आयीं, जो मैं बताना नहीं चाहूँगा। उसके लिए बोला, तो मेरी चाची बोलीं - बबुआ, गईल माघ उन्तीस दिन बाकी। तोहरो देखूँगी, अभी थोड़े ही मैं मर रही हूँ। मुझे बहुत बुरा लगा। मैं कुछ दिनों के बाद अपनी नियुक्ति पर चला गया। जब अवकाश पर आया, तो मेरे बड़े भाई घर-परिवार से अलग हो चुके थे। फिर भी मैं उन लोगों से मिलने गया। भाभी जी को देखा, उन्होंने कंजूसी की हद कर दी थी। उनकी एक बच्ची थी, उसे भी वह ठीक से नहीं खिलाती थीं। अपना पहनावा भी ठीक से नहीं रखी थी, जिसके लिए मैं बोला, तो वह बोली - बबुआजी ! देखूँगी, देखूँगी, आपकी रानी आएगी, तो कितना साफ-सुथरा रहती है। कितनी पुजेड़ी और सती रहती है। मेरा दिमाग खराब हो गया और मैं उनके यहाँ धीरे-धीरे आना-जाना कम कर दिया। मैं बोला - ये सब तो ठीक है, पर तुम्हारी चिन्ता का विषय क्या है ? वह बोला - आज तो अत (हद) ही हो गया। अब कोई यह शब्द भर बोलता है, तो मैं बहुत असहज महसूस करता हूँ। मैं बोला - वह शब्द क्या है ? तो वह बोला - पहले आज की बात सुनो। मैं बोला - ठीक है, सुनाओ। राजू बोलने लगा।

                              आज मैं और आपकी भाभी जी बैठे थे। शादी-विवाह पर चर्चा हो रही थी। शादी कब होना चाहिए, कैसे होना चाहिए आदि-आदि। इसी पर हम दोनों अपनी शादी की चर्चा करने लगे। मेरी एक साली है। तुम्हें मालूम ही है कि उसकी स्नातक की पढाई पूरा हुए चार वर्ष हो गये हैं। वे लोग (मेरे ससुराल वाले) अब उसके लिए वर ढूँढ रहे हैं और वह भी बेल्ट सर्विस वाला। तुम्हें तो मालूम है, इस समय किसी की नौकरी लगती है, तो पाँच वर्ष के अन्दर लगभग उसकी शादी हो ही जाती है। कोई-कोई शायद ही बच जाता है, जिसके पीछे कुछ कारण होता है। मैं भी अपनी साली की शादी के लिए चार-पाँच घर-वर देखा। एक लड़का तो हमारे कहने के अनुसार राजी भी था, पर उसका उम्र मेरी साली जी की उम्र से कम हो गया। तुम्हें पता है, तुम्हें क्या सभी को पता है कि 99 प्रतिशत लोेग अपने उम्र से कम या अपने उम्र की लड़की से ही शादी करना पसन्द करते हैं। इसी चर्चा के दौरान मैंने कहा - अगर लड़का-लड़की अपनी पसन्द से शादी करते हैं, तो कोई बात नहीं। पर कोई मध्यस्थ या अभिभावक शादी तय करते हैं, तो उन्हें कुछ बातों पर ध्यान देना चाहिए। आपकी भाभी जी बोली - वो कुछ बातें क्या हैं ? मैं बोला - हमें यानी लडकी के अभिभावक को अपना जीवन-स्तर देखनी चााहिए और यह देखना चाहिए कि उसमें लड़की सहजता से रहेगी या नहीं। दूसरा, लडकी के योग्य ही वर ढूँढ़ना चाहिए, जिसमें कद-काठी, रूप-रंग, शिक्षा-योग्यता की समानता हो। तीसरा, अगर आप बेल्ट सर्विस वाले से शादी करना चाहते हैं, तो आपको अपनी बच्ची कि शादी उन्नीस से चैबीस वर्ष के अन्दर करनी पड़ेगी। अगर आप डाॅक्टर, वकील, इंजीनियर या नागरिक सेवा (सविल सर्विस), अधिकारी (आॅफिसर) से शादी करना चाहते हैं, तो आप इसमें इंतजार कर सकते हैं। मैंने पूछा - तुम्हारे चिन्ता की बात क्या है ? वह (राजू) बोला - आगे सुनो। सभी जानते हैं कि हमारे भारतवर्ष में लड़की के अभिभावक को तिलक या उपहार के रूप में दहेज देना पड़ता है। दहेज के अनुसार ही वर का ओहदा निश्चित होता है। मैंने कहा - आपके पिताजी को क्या सूझ रहा है, उनसे कहो कि सिविल सर्विस या आॅफिसर से शादी करे, इतना दिन से सोए थे ! राजू ने कहा - अब तो उसके भाग्य के ही ऊपर है। तुम्हें मालूम है कि हमारी भी एक बच्ची है। तुम्हारी भाभी जी तुनक-कर बोली कि देखूँगी, आपकी भी एक लड़की हो गयी है न, उसे कैसे रखते हैं, क्या पढ़ाते हैं ? उसकी शादी कैसे घर-वर से करते हैं, देखूँगी। उसी समय से यह ‘देखूँगी’ शब्द हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है।

                                 अब तुम्हीं बताओ, इसमें मेरा क्या कसूर है, जो सभी लोग हमें ही देख रहे हैं। तुम मेरा इतिहास-भूगोल जानते ही हो। अब जब कोई इस लहजे में ‘देखूँगी/देखूंँगा’ शब्द व्यवहार में लाता है, तो मुझे लगता है कि मैं क्या करूँ। इसलिए मैं लोगों से अनावश्यक बात भी नहीं करना चाहता।

                               फिर क्या ? मैं अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखते हुए बोेला - अरे मेरे चिन्तक दोस्त, इतनी-सी बात अपने दिल पर लेते रहोगे, तो कैसे जी पाओगे। यही तो दुनिया है। अपना धर्म-कर्म क्यों भूल जाते हैं। अपने कत्र्तव्य का निर्वाह नहीं करेंगे, बस दूसरे को उपदेश देते रहेंगे और उसके कर्म को याद दिलाते रहेंगे। अच्छा एक बात बता - हमलोग यहाँ से जा रहे हैं और थोड़ा बहुत धूल उड़कर हमारे कपड़े और बाल पर पड़ गया और हमें आगे भी जाना है, तो हम क्या करेंगे ? वह (राजू) बोला - हम झाड़ेंगे और चलते रहेंगे। मैं बोला - बस-बस उसी तरह इस प्रकार की बातों को सुनो, जितना जरूरत हो, करो, बाकी छोड़ो और अपने सही कर्म-पथ पर बढ़ते रहो। मैं उसका कान पकड़कर हिलाते हुए बोला - समझा क्या ? वह हामी में सिर हिलाया
और मुस्कुरा दिया।

                                                                     ***

* हम ऐसे क्यों हैं *


                 हमारा कहने का अभिप्राय है विभिन्ता , कोई काला , कोई गोरा , कोई लम्बा, कोई नाटा प्रत्येक मानव , यहाँ तक प्रत्येक जीव-जंतु में भी विभिन्ता पाई जाती है। जब ऊपरी बनावट और आंतरिक संरचना को छोड़ दे तो हम देखते हैं कि सभी के स्मृती में भी अंतर है। आप देखे होंगे आपके वर्ग में एक विधार्थी किसी पाठ को एक बार में याद कर लेता है और कोई इसके लिए बार-बार अभ्यास करता है। कोई सिर्फ एक बार के र्स्वण (सुनने) भर से याद कर लेता है।

                हम देखते हैं कोई आसानी से अपने विकाश का सफर तय करता है और किसी को उसी सफलता के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। आखिर क्यों ? इस सृष्टी में कोई भी कार्य बिना कारण का नहीं होता है। जब कोई शिशु किसी के घर में जन्म लेता है या जब शिशु किसी को अपना जन्नी स्वीकार करता है , तो बड़ा होने के बाद वह अपने जन्नी को दोश देता है। उसे ए नहीं दिया गया वो नहीं दिया गया। पर इस में किस किसका दोश है। कोई गरीब परिवार में जन्म लेता है , कोई सम्पूर्ण परिवार में , इस सभी का उत्तर हम आगे पाने का कोशिश करेंगे।

             इस सृष्टी को सुचारू रूप से चलाने के लिए विभिन्नता अतिआवश्यक है। आप अपनी तलहथी को देखें अगर आपका सभी अंगुलियाँ बराबर हो जाये तो क्या ए सभी कार्य अभी जितना कुशलता से करता है , कर सकेगा ,जबाब है नहीं।
                 पहला अंतर रंग और आकृती से है , जो वंश (जनरेशन) से नियंत्रित होता है। जो जिस प्रकार के कुल, परिवार में जन्म लेता है उसका रंग और आकृती उस कुल और परिवार से सम्बंधित होता है और उसी से नियंत्रित होता है।

                 अगर हम स्मृति की बात करें तो यह कुछ वंशानुगत (जनेटिक) तो कुछ हमारे कर्म से नियंत्रित होता है। हमें कैसा माता-पिता मिला ए हमारे कर्म पर निर्भर करता है। जो जैसा कर्म करता है उसे उसी प्रकार का अस्तन और माता-पिता प्राप्त होता है। संतान अपने कर्म से ऊँचाई को प्राप्त करता है,पर जो सत्य कर्म उन्के माता-पिता करते हैं उसका फल भी संतान को प्राप्त होता है। एक लकोक्ति है 'पुत्र बढ़े पिता के धर्मे खेती उपजे अपना कर्मे'

                  वेलगेट्स ने कहा है:- 'हम अगर गरिबी में जन्म लेते हैं तो उस में हमारा कशुर नहीं है , पर अगर हम गरिबी में मरते हैं तो ए हमारा कसुर है '। पर हमारे विचार से दोनों अवस्था में हम हीं दोशी हैं जो जैसा कर्म करेगा वैसा हीं पाएगा।

                 धर्म शास्त्र और यहाँ तक की विज्ञान भी सिद्ध करता है की जो जैसा करेगा वैसा पाएगा। आप देख सकते हैं , जब दो व्यक्ति में एक प्रातः काल में जग कर भर्मण पर जाता है और निश्चित समय पर सभी कामों (कार्यो) को करता है और दूसरा जो देर से जगता है और व्यसनों का आदि है। दोनों के आर्थिक समाजीक एमं शारीरिक स्तर में कितना अंतर है। पहला आदर का पात्र है तो दूसरा नफरत का।

                इस धरातल पर मनुष्य आया हुआ है चाहे वो जिस भूमिका में हो यथा माता-पिता , भाई-बहन, पति-पत्नी , गुरु-शिष्य , सगे-सम्बन्धी आदि अगर सभी अपनी भुमिका कर्त्वय का सही पालन कर रहें तो अच्छी बात है , वे इस जन्म से दूसरे जन्म तक सफल रहते हैं। अगर कोई दम्पति संतति पैदा कर उसका अपने सामर्थ्य के अनुसार सही देख-भाल नहीं करता है तो उसे उसका भरपाई इस जन्म से उस जन्म तक करना ही होगा। अगर कोई संतान अपना कर्त्वय सही से नहीं निभाया है , तो उसे भी अपना कर्म भोगना होगा। यह सिद्धांत हर मनुष्य पर हर रिस्ता पर यहाँ तक की जिव-जंतु पर भी लागु होता है। यहाँ कोई इंसान बड़ा या छोटा नहीं होता उसे बड़ा या छोटा उसका कर्म बनता है। आप देख सकते हैं घर , गाँव , देश , विदेश (विश्व) सभी लोगों को यह दुनियाँ नहीं जानती और नहीं मानती जो अपना कर्त्वय अपना धर्म सही तरीके से निभाते हैं, उन्हें ही लोग जानते और मानते हैं। गोस्वामी तुलसी दास जी ने लिखा है :-
                                               "कर्म प्रधान विश्व करी राखा ,
                                               जो जस करनी तासु फल चाखा "।
अतः जो जिस स्तर पर है उसे अपना कर्त्वय सही और उचित तरीके से निभाना चाहिए।
                     
                  अगर हम गरीब हैं तो उसका जिम्मेवार हम हैं क्यों की या तो हम अपना श्रम का उचित इस्तेमाल नहीं कर रहे या अपना श्रम शक्ति के लिए उचित पारिश्रमिक नहीं ले रहे या उन्हें उचित परिश्रमिक नहीं मिल रहा , अगर दोनों कर भी रहे हैं या हो भी रहा है तो भी गरीब बने हुए हैं तो इसका मतलब हम अपने धन का गलत इस्तेमाल कर रहें हैं। अगर हम ज्यादातर अस्वस्थ्य रहते हैं तो उसके लिए भी हम खुद जिम्मेवार हैं। या तो हमारा आहार-व्यवहार ठीक नहीं हैं या हम अपना नित्य कर्म सही नहीं करते हैं या हमारे पास स्वास्थ्य सम्बन्धी सही जानकारी नहीं हैं। हमारी समझ से सारी समस्या का समाधान जानकारी (ज्ञान) है और सही तथा उचित जानकारी हासिल या प्राप्त करना हमारी खुद की जिम्मेवारी है।
                   
                 अतः हम जैसा भी हैं जिस स्थिति में हैं उस स्थिति के लिए सिर्फ दूसरे को दोश नहीं दे सकते। आप खुद एक बार निसपेक्ष सोच कर देखिएगा। हम ऐसा क्यों हैं। उसका उत्तर खुद व खुद मिल जाएगा।
उत्तर मिल जाता है तो अवश्य बताइएगा तब तक के लिए नरेन्द्र को इजाजत दिजिए। धन्यवाद ।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

* सुहागरात *

                                                                  


             ‘सुहागरात’ - कोई इसे ‘हनीमून’, तो कोई ‘फस्र्ट नाईट’, तो कोई ‘दो जिस्म और जान की रात, तो कोई ‘मिलन की रात’ कहते हैं। इसकी चर्चा मात्र से लोगों के चेहरों पर गजब की लाली छा जाती है। अच्छे-अच्छे लोग भी शरमा जाते हैं। किसी ने कहा है - ‘हमने मोमबत्ती क्या अगरबत्ती को भी जलते देखा है, सुहागरात को लड़की क्या लड़के को भी शर्माते देखा है।’

              सभी के कहने का अपना तरीका, लफ्ज़ और भाषा है। मगर सभी वही भाव व्यक्त करते हैं या करना चाहते हैं, जो दूसरा करता है। इस शब्द के उच्चारण मात्र से लोगों के तन-मन में सिहरन उत्पन्न हो जाती है। शादी-शुदा या कुंवारे, सभी इसके किस्से-कहानियों में रूचि लेते हैं। कोई खुलकर, तो कोई छिपकर। सभी इसमें सलाह देते हुए भी नजर आते हैं, उनके पास सही ज्ञान हो या न हो। कुछ लोग अनेकों भ्रम-जाल में फँस जाते हैं। सभी व्यक्ति, चाहे लड़का हो या लड़की, इसके बारे में ज्ञान अर्जित करना चाहते हैं। पर उन्हें न सही सलाह देने वाला और न ही सही मार्गदर्शन देने वाला मिलता है। जो हाईप्रोफाईल लोग हैं, वे इसके ज्ञान के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल भी करते हैं, पर सभी को सभी जानकारियाँ और सभी स्तर की जानकारियाँ नहीं मिल पाती। आपने देखा होगा, जब-जब कोई लड़का या लड़की की शादी हुई है या होने वाली है और वह अगर अपने बराबर वाले साथी/सहेली से बात करता/करती है, तो उनसे कम उम्र वाले भी चोरी-चुपके बातें सुनने की कोशिश करते हैं तथा कोई-कोई बड़े भी इसमें सम्मिलित हो जाते हैं। सभी इसके बारे में बात करते हैं, पर इस पर खुलेआम चर्चा से परहेज करते हैं। खीर सभी खाना चाहते हैं, पर बनाना (पकाना) कोई नहीं चाहता। हमारे यहाँ रतिक्रीड़ा से सम्बन्धित अनेक साहित्य उपलब्ध् ा हैं। कुछ उचित हैं, तो कुछ अनुचित भी। सभी तरह के साहित्य को पढ़ने का इन्सान का एक समय (उम्र) होता है। हर ज्ञान को प्राप्त करने की अलग-अलग उम्र होती है। आपने यह तो नहीं देख होगा कि नर्सरी में त्रिकोणमिति का सिद्धान्त बताया जाता हो।

              यह शब्द ऐसा है, जिसके बारे में जितना लिखा जाय, उतना ही कम है। इसकी चर्चा करने पर इसकी अनेक परतें खुलती चली जाती हैं। हमारे नवयुवक अनेक भ्रांतियों से ग्रसित हैं या होते जा रहे हैं। बाजार में बहुत सारे यौन सम्बन्धित अश्लील सामग्री उपलब्ध हैं, जो हमारे नवयुवक वर्ग को दिग्भ्रमित कर रही हैं और इनकी शक्ति को कम कर रही हैं, जिससे उनके साथ राष्ट्र को भी हानि उठानी पड़ रही है।

             हमारे यहाँ बहुत से शास्त्रों में इसके बारे मे विशेष चर्चा मिलती है। इसे पावन पर्व की तरह मनाया जाता है। इसे खुशी, शांति और खुशहाली से जोड़कर देखा जाता है। आप उदाहरण के तौर पर शिव विवाह को मान सकते हैं। वर्तमान समय और पुराने समय में बहुत अंतर देखने को मिल रहा है। पहले जब साधन-संसाधन की कमी थी, तो बड़ी मुश्किल से शादी के जोड़े में बंधने के पहले लोग मिल पाते थे। कुछ लोग ही भाग्यशाली या साधन-सम्पन्न होते थे, जो शादी से पहले अपने साथी को देख पाते थे या बात कर पाते थे।       वर्तमान में तो यह आम बात हो गई है। इन्टरनेट (ई-मेल) ने इसमें क्रान्ति/तूफान ला दी है। आज तो बहुत सारे ऐसे जोड़े हैं, जो शादी के पहले ही एक-दूसरे के साथ सब कुछ कर चुके होते हैं। ये लोग अपने को एडभांस, हाई प्रोफाईल मानते हैं। पर ये सिर्फ कहने की बात है। ऐसा देखा गया है कि इनका दाम्पत्य जीवन सुखमय नहीं रहा है। ये भी कई भ्रम और भ्रांतियो से ग्रसित रहते हैं। मैं यहाँ किसी का नाम लेकर विवाद में फंसना नहीं चाहता।

           यह रात हर तबके, हर स्तर, हर सभ्यता-संस्कृति के लिए एक जैसी ही होती है, पर उनका तरीका और अंदाज अलग-अलग होता है। हमारे समझ से जो जिस स्तर का है, उसे उसी स्तर से मनाना चाहिए, नहीं तो वही हाल होगा, जो आपने कहीं सुना होगा - एक कौवा हंस की चाल चलने चला और अपना चाल ही भुला बैठा। स्तर से हमारा अभिप्राय हमारे रीति-रिवाज, सभ्यता-संस्कृति और मुख्य रूप से अर्थ व्यय करने की क्षमता से है। क्षमता से ज्यादा कुछ भी नहीं करना चाहिए।

           यहाँ हम कुछ लोगों के दाम्पत्य जीवन के शुरूआत की कहानियों की चर्चा करने के पहले कुछ आम लोगों की यौन समस्या की चर्चा करेंगे, जिसे लोग शादी के बाद या शादी के पहले अनुभव करते है और उसके इलाज के लिए नीम-हकीमों के पास भटकते रहते हैं। आप अनेक पुस्तक और पेपर में ऐसे इश्तेहार देख सकते हैं। अंग मोटा करे, लम्बा करे, अंग सख्त करे, वक्ष/स्तन सुडौल करे इत्यादि-इत्यादि। लोगों द्वारा आम प्रश्न, जो आए दिन ‘डाॅ० की सलाह’ काॅलम में छपते रहते हैं और कुछ लोग उस प्रश्न को लेकर अंदर-ही-अंदर घुटते रहते है। ये प्रश्न इस प्रकार के होते हैं :-

* मैं कद में छोटा/छोटी हूँ, मेरा जीवन साथी कद में बड़ा/बड़ी है, क्या हमारा दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा?

* मेरे लिंग की लम्बाई लगता है कि छोटा है। क्या मैं शादी करूँ ?

* हमारे जीवन साथी का शरीर ढीला है।

* हमने शादी के पहले किसी लड़का/लड़की से शरीर सम्बन्ध बनाया था। इसका प्रभाव हमारे शादी-शुदा जीवन पर तो नहीं पड़ेगा।

* हमें स्वप्नदोष आता है और हमारा लिंग एक तरफ झुक गया है।

* हमने शादी के पहले हस्तमैथुन किया था। इसका प्रभाव हमारे विवाहित जीवन पर तो नहीं पड़ेगा।

* हमारा शारीरिक सम्बन्ध अपने से बड़ी उम्र के पुरूष/महिला के साथ रह चुका है, इसका प्रभाव कहीं हमारे यौन जीवन पर तो नहीं पड़ेगा।

* हमें एक दिन या एक सप्ताह में कितनी बार शारीरिक सम्बन्ध बनाना चाहिए,

* जिससे हमारे स्वास्थ्य पर असर न पड़े ?

* हमें हमारे साथी से सन्तुष्टि नहीं मिलता, हम क्या करें ? हमारा साथी हमें यौन सम्बन्ध मे सहयोग नहीं करता/करती, हमें क्या करना चाहिए ?

* हमारा साथी हममें रूचि नहीं रखता/रखती, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए,जिससे उसकी रूचि हममें उत्पन्न हो ?

*  हमारा साथी हमसे जबर्दस्ती हमारी इच्छा नहीं रहने पर भी यौन सम्बन्ध बनानाचाहता/चाहती है।

* हमारा साथी अकुदरती यौन संबंध बनाना चाहता/चाहती है।

इत्यादि-इत्यादि...। इस प्रकार के अनेकों प्रश्न मिल जाएँगे, जिसका उत्तर लोग जानना चाहते हैं।

            यहाँ हम आपको बता दें कि इन सारे प्रश्नों का उत्तर हमारे साहित्य में, धार्मिक पुस्तकों में है, पर उसका सही तरीके से कोई अध्ययन नहीं करता और शास्त्रों के अनुसार आचरण नहीं करता। ऊपर जितने भी प्रश्न पूछे गए हैं या इस प्रकार के जितने भी प्रश्न मन में उठते हैं, सारे का उपचार हमारे अन्दर ही है। बस उसे ढूँढ़ना हमारी इच्छा-शक्ति के ऊपर है। यौन सम्बन्ध् िात ज्यादातर भ्रांतियाँ मस्तिष्क और मन से जुड़ी हुई हैं। जब हम इन भ्रांतियों के विषय में अच्छी तरह समझ जायेंगे, तब हम किसी अनचाहे भ्रम रोग से ग्रसित नहीं होंगे। अब हम रोगों के सैद्धान्तिक ईलाज की चर्चा करते चलते हैं।

           जब कोई भी लड़का/लड़की के लिए जीवन-साथी खोजा जाय या शादी कराया जाय तो उससे शादी करने के पहले दोनों की तुलना कर लेनी चाहिए, जो मुख्य रूप से हैं - रंग, रूप, कद, योग्यता, दोनों की पसन्द-नापसन्द, महत्त्वाकांक्षा, आर्थिक और सामाजिक जीवन-स्तर। अगर इन सभी को सही तौर-तरीके से मिला लिया जाय, तो हमारे मत से बहुत कम ही समस्या उत्पन्न होगी।

           जो लोग ये सोचते हैं कि उनका जीवन साथी उनसे शारीरिक कद में बड़ा है, तो हमारा सम्बन्ध कैसे बनेगा, तो उनकी सोच सही नहीं है। कुदरत ने सभी को उसके हिसाब से ही अंग प्रदान किया है, जिससे उन्हें परेशानी न हो। अगर दोनों, स्त्री और पुरूष, अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति अर्थात् मन से एक-दूसरे को चाहते हैं, तो आकार कोई ज्यादा मायने नहीं रखता। वे एक-दूसरे के अनुकूल आसान और सही स्थिति प्राप्त कर लेते हैं। आपको बताते चलें कि जिस पुरूष का अंग 3 इंच से ज्यादा लम्बा है, वह यौन सुख का आनन्द लेने और देने, दोनों में पूर्ण सक्षम है। स्त्री के यौन अंग की बनावट इस प्रकार होती है कि उसके अग्र भाग यानी ऊपरी हिस्सा ऊपर से तीर्न इंच गहराई तक की बनावट में ही यौन सुख, आनन्द या तृप्ति वाला भाग होता है। आप पशुओं में यह स्थिति देख सकते हैं। क्या गाय और सांढ़ का शारीरिक आकार ज्यादा मायने रखता है। जवाब है - नहीं। मुख्य वजह है, इंसान में सोचने, समझने और परेशानी हल करने की क्षमता है, इसलिए वह शरीर के आकार-प्रकार और बनावट पर विशेष ध्यान देता है। कई लोग कहते हैं, उन्हें मैथुन में आनन्द नहीं आता, तो आपको हम यहाँ एक उदाहरण देते चलते हैं। लेकिन उसके पहले आपको बता दें कि मैथुन तो अन्तिम क्रिया है। आप कई खेल देखे होंगे, जैसे - फुटबाॅल। क्या एक ही बार में गोल मार दिया जाता है या गोल हो जाता है। जवाब है - नहीं, गोल होने के पहले गेंद कभी इस तरफ, तो कभी उस तरफ जाता है। दोनों तरफ के खिलाड़ी लगातार कोशिश करते हैं और उनके उच्च संघर्ष से दर्शकों को आनन्द प्राप्त होता है। जब दोनों तरफ के खिलाड़ी अपना उच्च प्रदर्शन करते हैं, तो हार-जीत या लक्ष्य प्राप्ति के बाद दोनों की प्रशंसा की जाती है, उसी प्रकार यौन सबंध भी एक क्रीड़ा है, इसे कामक्रीड़ा या रतिक्रीड़ा कहा जाता है। इस क्रीड़ा में खिलाड़ी, दर्शक और रेफरी संयुक्त रूप से स्त्री-पुरूष की जोड़ी ही रहती है। दर्शक उनका मन, तो हाव-भाव रेफरी का काम करता है और लम्बी क्रीड़ा के बाद जब लक्ष्य की प्राप्ति होती है, तो दोनों को संयुक्त रूप से खुशी और आनन्द की प्राप्ति होती है।

            वे लोग, जो इसे स्वास्थ्य से जोड़कर देखते हैं और पूछते है कि काम-क्रीड़ा या मैथुन साल, महीना, सप्ताह और दिन में कितनी बार करनी चाहिए, तो आपको बता दें कि इसके लिए कोई सख्त नियम नहीं है। लेकिन आपने सुना होगा, अति सर्वत्र वर्जते, अर्थात् अति सभी जगह मना है। आपने देखा होगा, कई लोग, जो गृहस्थ जीवन व्यतीत कर रहे हैं, वे जीवन का कुछ समय तीर्थ-भ्रमण में लगाते हैं। कोई वर्ष और महीने के कुछ निश्चित तिथि को पूजा-अर्चना करते हैं, तो कोई प्रतिदिन। कई तो ऐसे भी हैं, जो पूरे दिन लगे रहते हैं। पर उन्हें न सुख मिलता है, न शांति। पर एक वो व्यक्ति भी होता है, जो उम्र के कुछ पल या वर्ष या माह या कुछ दिन में ही सन्तुष्टि महसूस करता है। यह तो अपने शांति और मन की बात है। यह सिर्फ शारीरिक बल से नहीं होता है। आप जीव जगत में बकरी, शेर तथा हाथी के मैथुन जीवन की तुलना कर सकते हैं। एक बकरी है, जो साल में तीन बार इच्छा जाहिर करती है, पर शेर और हाथी तो लम्बे समय तक यूं ही मस्त रहते हैं।

             हस्तमैथुन, स्वप्नदोष, असमय यौन सम्बन्ध - ये सभी गलत संगत, अश्लील साहित्य, अनियंत्रित जीवन-शैली के द्वारा होते हैं। इनसे उचित मार्गदर्शन द्वारा बचा जा सकता है, जैसे - गलत संगत, अश्लील साहित्य से दूर रहें। नियंत्रित जीवन यानी खान-पान पर उचित ध्यान दें। किसी प्रकार का व्यसन न करें। जिस खाना या तरल पदार्थ से इस क्रिया में वृद्धि हो रही है, उसकी पहचान करें और छोड़ें। सोते समय हाथ-पैर ठंडे जल से धोएँ, ज्यादा-से-ज्यादा स्वच्छ पानी का सेवन करें, व्यायाम करें, एकांत में अकेला न रहें। इससे सम्बन्धित किसी प्रकार का ख्याल अच्छा हो या बुरा, बार-बार अपने मन मस्तिष्क में न लाएँ। अपने खाली समय को रचनात्मक कार्याें, जैसे - पंेटिंग, कढ़ाई, बुनाई, लिखाई इत्यादि में लगाएँ। हमेशा अपने विचार को ऊँचा रखें। हो सके तो सादा भोजन का सेवन करें, जो संतुलित हो और जो आपके शरीर को सूट करता हो। इसके बाद डाॅक्टर से उचित सलाह लें।

अगर आप किसी कारणवश यौन-संबंध किसी से बना चुके हैं और ग्लानि महसूस कर रहे हैं या किसी अनहोनी से डर रहे हैं, तो इसे एक हादसा समझकर बिलकुल भूल जाएँ। अपने सपने में भी न सोचें कि आपने ऐसा किया था। न किसी से इसकी चर्चा करें, चाहे वो व्यक्ति आपके कितने भी करीबी क्यों न हों। इस बात का स्त्री वर्ग को पूर्णतया ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि हमारा समाज पुरूष प्रधान है, ज्यादातर स्त्री के मामले में ही बातें बनायी जाती हैं। उन्हें यौन संबंध से होने वाले परिणाम से पूर्णतया निपट लेना चाहिए, जैसे - गर्भधान या यौन अंग द्वारा होने वाली बीमारियाँ इत्यादि।

              अब हम यहाँ आपके समक्ष कुछ कहानियाँ प्रस्तुत करेंगे, जो हमारे पड़ताल के बाद सामने आई। हम सभी जानते हैं कि हमारा समाज तीन वर्गों में विभक्त है:- (1) निम्न वर्ग, (2) मध्यम वर्ग, (3) उच्च वर्ग पर इनके बीच में दो वर्ग और भी हैं, जो विकास का द्योतक हैं। इनमें से पहला वर्ग, जो निम्न वर्ग और मध्यम वर्ग के बीच में तथा दूसरा वर्ग, मध्यम वर्ग और उच्च वर्ग के बीच में है। इन दोनों वर्गों का जीवन बड़ा संघर्षमय होता है। ऐसे मध्यम वर्ग को समाज का रीढ़ माना जाता है। ज्यादातर लोग, जैसे - डाॅक्टर, प्रशासक, नेता, अभिनेता, लेखक, वकील और जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं अर्थात् समाजसेवी इसी वर्ग से आते हैं।

              हमारे कुछ साथी हैं - संतोष, अमरेन्द्र, अमित और रौशन, इनकी तो गजब की कहानी है। इन चारों की शादी बड़े धूम-धाम से हुई। ये सभी सरकारी सेवा में हैं। ये अपनी पत्नियों को पहले देख चुके थे। इनकी पत्नियाँ अपेक्षाकृत शारीरिक रूप से पतली और सुन्दर थीं। पर इनकी पत्नियों ने पता नहीं पहले से खाना-पीना छोड़ रखा था या ज्यादा ख्यालों में खोई रहती थीं। इसलिए उस दिन बीमार पड़ गईं, कुछ को तो तेज बुखार भी था। फिर क्या था, घर वाले क्या करते, इनको सेवा में लगा दिया। ये बेचारे उनको दवा खिलाते और ग्लास से पानी पिलाते हुए अपने जीवन की शुरूआत की। इनकी ज्यादा बड़ी कहानी नहीं थी। ये उनके बगल में सोते थे और पूछते रहते थे कि अब कैसा अनुभव कर रही हो, उनके सर और शरीर के ताप को अपने हाथ से अनुभव करते हुए, धड़कन और नब्ज टटोलते हुए। कोई उसी दिन, तो कोई दूसरे दिन एक-दूसरे के जीवन में उतर गए।

              जब हमने जानना चाहा कि ये बीमार क्यों हो गई, तो हमने महसूस किया कि ये उतनी बीमार नहीं थीं, जितना घरवालों ने तथा उन्होंने हमारे दोस्तों को अनुभव कराया। एक तो शादी के तीन दिन पहले से भोजन कम कर दी थीं और ग्लूकोज पी कर रह रही थीं। इन सभी की शादी मई-जून में हुई थी, जो बहुत ही गर्म माह होता है। इन्होंने मायके से ससुराल आने के रास्ते में बहुत कम यानी न के बराबर खाया-पिया। हमें इनकी सोची-समझी रणनीति लगी, ये हमें उच्च कोटि का नहीं लगा। हमारे बगल के एक राधेश्याम भाई हैं। इनके घर की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी। वे पहले घर से बाहर यानी दालान पर, जिसे दुआर भी कहते हैं, वहाँ पर सोते थे, क्योंकि इनके घर में कमरों की संख्या कम थी। स्नातकोत्तर करने के बाद उन्होंने शादी की। पहले वे घरवालों को शादी करने के लिए मना करते रहे, पर जब शादी हुई, तो ऐसा किए, जो बहुत कम लोग करते होंगे या किए होंगे। उनके एक जीजा जी थे। उम्र में बराबर, पर रिश्ते में छोटे थे। उनकी जिम्मेवारी थी, दोनों पति-पत्नी को मिलाने की। पर उनका जरूरत ही नहीं पड़ी। हुआ ऐसा कि हमने उनके दोस्तों को बात  करते हुए सुना कि - घर में जो पूजा-पाठ होता है, वो दिन में सम्पन्न हो गया। पता नहीं
कैसे, वे बेचारे उसी समय बीमार पड़ गए और उनके सिर में दर्द हो गया। अब क्या किया जाए ? उन्हें दवा लाकर दिया गया। सिर में तेल मालिश कर आराम करने के लिए उसी कमरे में, जहाँ हमारी भाभी जी थीं, भेज दिया गया। लेकिन भाभी जी को उस समय दूसरे कमरे में भेज दिया गया। शाम को राधेश्याम भाई खाना खाए और तैयार होकर उसी कमरे में आराम करने लगे। तब भाभी जी को उनकी माँ और चाची जी ने एक ग्लास दूध लेकर भेजा। साथ में तेल भी, जो उनके सिर और बदन पर लगाया जा सके। दोनों बोली - सिर्फ दूध पिला दो और थोड़ा शरीर दबा देना। हमें आशा है कि यह दम्पत्ति एक-दूसरे को दूध् पिलाते हुए अपने नये जीवन की शुरूआत किये होंगे। भाभी जी बदन दबा रही होंगी और भाई जी मना कर रहे होंगे और अपने
पास बिठा लिए होंगे या लिटा लिए होंगे, ऐसा मेरा अनुमान है।
                अब आप को पंकज, सुभाष और रोहित की कहानी सुना रहा हॅूँ। तीनों को लवर ब्वाय कहा जाता था। हमें आशा है, आप समझ गए होंगे क्यों। इनका नाम चर्चा में आ गया था। ये सब जानते थे, पर उम्र में पूर्ण प्रौढ़ नहीं थे। इनकी शादी हुई, इनकी पत्नियाँ घर में आ गईं। किसी ने उन्हें कह दिया कि आज घर में नहीं जाना है, तो ये खा-पीकर छत पर सो गए। आधी रात में उनके रिश्तेदारों ने उन्हें घर में भेजा। जब वे घर में गए, तो देख रहे हैं कि उनकी पत्नियाँ सो रही हैं। एक तो आधे बिस्तर पर सो रही थी, पर दूसरी दोनों पत्नियाँ अपने शरीर के अनुसार ज्यादा जगह में फैलकर यानी बीच में अपना दोनों हाथ फैलाकर सो रही थीं।वह (सुभाष) भी अराम से आधे पर सो गया। उसकी भाभी सुबह 4 बजे दरवाजा खटखटा दीं। जनाब उठकर चले गए। अगले दिन उसी तरह बगल में सो गये, पर दोनों एक-दूसरे पर अपना हाथ रखते हुए मूक प्राणी की तरह एक-दूसरे में उतर गए। दूसरे जनाब ने प्रकाश को कम करते हुए अपना मुँह पत्नी के मुँह की तरफ करते हुए उसके बाजू पर अपना सिर रखते हुए सोने का उपक्रम करने लगे। पत्नी ने भी अपना मुख उसकी तरफ कर
दिया, फिर उसने अपना एक हाथ उसके बदन पर रख दिया। फिर पत्नी ने भी अपना हाथ उसके शरीर पर रख दिया। फिर क्या था, दोनों की सांसें तेज और गर्म होती गई और दोनों एक-दूसरे में समाहित हो गए। मूक रहकर ही अपने जीवन की शुरूआत की। तीसरे के साथ अजब ही बात हुई। वह (पंकज) बिना स्पर्श किए हुए, पत्नी के शरीर और बाजू के बीच में जो जगह खाली था, उसमें सिर रखकर सो गया। उसकी पत्नी, जो सोने का उपक्रम कर रही थी, उसके मुख पर अपना हाथ रख दी, तो उसने हटा दिया। फिर वह अपना हाथ दुबारा रख दी, तो उसने फिर हटा दिया। तो उधर से आवाज आई - नाराज हैं। पंकज बोला - नहीं, तो वो बोली - फिर ऐसा क्यों कर रहे हैं। क्या किसी और को चाहते हैं ? पंकज बोला - नहीं ऐसी बात नहीं है, फिर दोनों कसमे-वादे के साथ जीवन का शुभारम्भ किए।

             तो ऐसा भी होता है। पहल किसी को तो करनी ही पड़ेगी। अगर दोनों तरफ से मीठी बात और मुस्कान के साथ पहल हो, तो जीवन का आनन्द ही कुछ और हो।

             एक गोपीनाथ है। इनकी जुबानी इनकी कहानी भी सुनाता हूँ। ये शादी के पहले अपनी होने वाली पत्नी के हाथों से नाश्ता कर चुके थे। उस समय शादी की कोई चर्चा नहीं थी। जब शादी की बात चली और शादी पक्की हो गई, तो इनका मोबाईल से बात का सिलसिला चलता रहा। करीब एक वर्ष के बाद इनकी शादी हुई। शादी हुई, पत्नी घर आई, तो उन्हें घर में ले जाया गया तथा बाद में सभी लोग घर खाली कर चले गये। उनकी पत्नी जी बिस्तर पर बैठी थीं। वे दरवाजा बंद कर दिए और बिस्तर पर बैठ कर बोले - तअ्..., तो पत्नी जी अपना भौं हिलाते हुए बोली - तअ्... क्या ? फिर दोनों हंस दिए और लाईट आॅफ कर दिया।

                 यह कहानी मनीष गुप्ता की है। इनका परिवार मध्य और उच्च श्रेणी परिवार के बीच वाली श्रेणी में रखा जा सकता है। इनका शादी बड़े धूम-धाम से हुई। घर पर रिसेप्शन की पर्याप्त व्यवस्था थी। इनके कमरे को बखुबी सजाया गया था। इन्हें पूर्ण सुविधा प्रदान की गई थी। मनीष बताता है कि जब वह कमरे में गया, तो वो पलंग यानी जिस पर बिस्तर लगाया हुआ था, उस पर बैठी हुई थी। हम भी बगल में बैठ गये। और दोनों हाथ से उनके घूंघट को थोड़ा ऊपर करते हुए, उनके हाथ कि अंगुली को पकड़ा। अपने पाॅकेट से एक डिबिया निकाल कर, उसमें से अँगूठी निकाल कर उन्हें पहनाते हुए हमने कहा - यह तुच्छ भेंट मेरी तरफ से, तो उन्होंने भी मुस्काते हुए कहा - हम भी आपके लिए कुछ लाए हैं। हमने कहा - आपका सबकुछ तो मेरे लिए ही है। तो वह बोली - वो तो है, आपका भी सब कुछ मेरा है, तो मैं मुस्कुरा दिया। वह पलंग से उतरने लगी, तो हमने कहा - क्या बात है, कोई परेशानी है क्या तो वह बोली - जी नहीं, बस एक मिनट और वह अपनी साइड बैग ले आई और उसमें से एक डिबिया निकाली। गोड़ लागकर (पैर छूकर) हमारे हाथ में थमा दी। हमने खोला तो देखा, उसमें लाल धागे में दिल के आकार में महावीर जी की आकृति बनी हुई था। हमने कहा - किसने बनवाया। वह बोली - हमने पापा जी से बनवाया। हमने कहा - क्या आप पापाजी से बोलीं कि हमें उन्हें देने के लिए गिफ्ट चाहिए। वह बोली - धत् ! कोई लडकी ऐसा बोल सकती है क्या, हमने कहा - हमें अपने पसन्द का एक लाॅकेट चाहिए। पिताजी बोले जा के फलाने दुकान से ले लेना और हमें वजन और दाम बता देना। हम जाकर ले आई। हमने (पंकज ने) कहा - तो ये बात है। फिर हमने कहा - हम आपके कमरे में आये हैं, आपका क्या इरादा है ? वह बोली - इरादा तो हमारा नेक है, पर कमरा तो आपका ही है। घर आपका है, तो कमरा भी आपका हुआ। मैं बोला - कुछ देर पहले आपने और हमने भी कहा था कि हम दोनों का सबकुछ एक-दूसरे के लिए है। फिर ये बीच में आपका-आपका कहाँ से आ गया। अब ये कमरा, ये घर, इस घर का सुख-दुःख, न मेरा न आपका, बल्कि ये तो हमारा हो गया। वह बोली - आपकी बात सही है। वह फिर पलंग से उतरी, वहीं मिठाई रखी हुई थी, एक क्वार्टर प्लेट में निकाली और ले आई, साथ में एक ग्लास पानी भी। हमने कहा - कैसे खाया जाए और एक मिठाई उठाकर उन्हें खिलाने लगा, तो मना कर दी और बोली - पहले आप और अपने हाथ से मिठाई उठाकर हमारे मुख के पास ले आई। हमने उसमें से आधा काट लिया, फिर वह खुद आधा खा गई। हमने भी अपने हाथ से उसे खिलाना चाहा, तो वह मेरे हाथ को पकड़कर मेरे मुँह के पास ले आई, इशारे से ही हमें खाने के लिए कहा, तो मैं फिर आधा मिठाई काटा, वह मेरे हाथ के द्वारा ही आधा मिठाई अपने मुख में ले ली। हमने दो घूंट पानी पिया, वह भी मेरे बाद उसी ग्लास से पानी पी। फिर हमने मेन लाईट बंद किया। वह दरवाजे की तरफ देख रही थी। हमने देखा दरवाजा सटा हुआ था, पर लाॅक नहीं था, हमने उसे लाॅक किया। हमने कहा - आपने ये जो बजरंगबली वाला मंगलसूत्र हमें दिया है, इसका क्या करें। वह बोली - गले में डाल लिजिए। हमने कहा - वहाँ हमने आपको मंगलसूत्र पहनाया था, यहाँ आप पहना दीजिए और वह हमें अपने हाथों से उस लाॅकेट को मेरे गले मे पहनाने लगी, तो हमने कहा - बजरंगबली तो ब्रह्मचारी थे, हमें भी ब्रह्मचारी रहना पड़ेगा। वह हंस दी। फिर हम दोनों एक-दूसरे का एक हाथ पकड़े हुए बात को आगे बढ़ाते हुए बिस्तर पर लेट गए। फिर पता नहीं चला, हम कब और कैसे एक-दूसरे में उतर गए। हमें यानी मुझे कब नींद आ गई, पता भी नहीं चला। मेरी नींद 4ः45 में खुली, जब वह हमें जगाई। मैंने देखा - वह स्नान आदि करके हमारे सामने खड़ी थी। हम जब उठकर जाने लगे, तो वह मेरा चरण स्पर्श करने लगी। हमने कहा - ये क्या कर रही हो ? ये सब पुरानी बातें हैं, हम दोनों बराबर के हिस्सेदार हैं। तो वह बोली - धर्म और कर्म इंसान को नहीं भूलना चाहिए। धर्म-कर्म इंसान को सुख और शांति देता है और आनन्दमय जीवन व्यतीत करने में मदद करता है। मैं उसको चुम लिया और घर से बाहर चला गया।

              एक है धुरंधर बाबू। इनका जैसा नाम, वैसा काम। इन्हे मधु सेवन की आदत है। ये बेचारे लत से लाचार हैं। ये शादी में भी दो घूंट लगा कर गए थे। अति तो तब हो गई, जब ये सुहागरात के दिन भी नहीं माने। इन्होंने दोस्तों के साथ पैक मारा और माउथ फ्रेशनर मारकर कमरे में चले गए। जाते ही उन्होंने कमरे का दरवाजा सटाया और लाॅक कर दिया। इनकी पत्नी पलंग पर बैठी हुई थी। वह वहीं बैठी रही और वे (धुरंधर) जाकर उनके बगल में बैठ गए। जब वे उनकी तरफ अपना मुँह करके बैठे, उनका मँुह अपनी तरफ किया और कुछ बोलने के लिए जैसे ही मुँह खोला, वह अपना मुँह घुमा ली। ध् ाुरंधर बाबू बोले - क्या बात है ? शादी से खुश नही हो क्या ? किसी और को चाहती हो क्या, जो मुँह घुमा ली। वो बोली - जी ऐसी बात नहीं है, आपके मुँह से बास आ रहा है। धुरंधर जी बोले - अरे क्या बताएँ, दोस्तों ने जबर्दस्ती पिला दी, तो वो बोली - कम-से-कम आज तो आपको नहीं पीना चाहिए था और वह साइड हो गई। किसी को वचन दे चुकी हो क्या और बहाना बना रही हो - धुरंधर ने कहा। वह बोली - जी ऐसी बात नहीं है, आप जैसा चाहेंगे, वैसा करूँगी, पर आपको एक वचन देना पड़ेगा। धुरंधर बाबू बोले - तुम्हें भी एक कसम खाना पड़ेगा। तुम मेरा कसम खाओ कि तुम्हारा किसी के साथ कोई चक्कर नहीं था। वह बोली - मैं आपकी कसम कैसे खा सकती हूँ। मै अपनी कसम खा कर कहती हूँ कि मैंने कभी ऐसा-वैसा नहीं किया। ध् ाुरंधर बाबू उठ कर चल दिए और बोलने लगे - ठीक है, तो मैं जाता हूँ, अगर तुम कसम नही खा सकती। तो उसने उनका हाथ पकड़ लिया और बोली - ठीक है। अगर आप इसी से खुश हैं, तो आपकी कसम और उनका आँख छलक गया और बोली - अगर आप पीना नहीं छोडे़ंगे, तो मैं भी आपके साथ पिऊँगी। धुरंधर का नशा ही टूट गया। धुरंधर बोला - मैं कोशिश करूँगा कि नशा छोड़ दूँ। इस प्रकार ये महानुभाव अपने जीवन की शुरूआत किये।

              एक संतोष बाबू हैं। इनका सुहागरात फिल्म से भी एक कदम आगे निकल गया। ये बताते हैं कि जब वे कमरे में अपने भाभी के आदेश पर गए। घर का कमरा पूर्ण रूप से सजा हुआ था। वह पलंग पर बैठी हुई थी। हमने कमरा का दरवाजा ओंठगाया और लाॅक कर दिया और पलंग पर बैठ गया। वह उठी और थाल ले आई, जो पहले से सजाया हुआ था। उसमें दीपक जला दिया, मेरी आरती की, तिलक लगाई, फूल छींटी, फिर मिठाई खिलाई, मुझे गजब तरह का अनुभव हो रहा था। मैंने कुछ रूपये थाल में रख दिया। वह मेरा चरण स्पर्श कर अपना हाथ अपने सिर पर फेरी, तो हमने कहा - हमें मिठाई खिला दी, अपने कुछ नहीं खाओगी। वह जो मिठाई मैं खाया था, उसी को खा गई। मैने पूछा - पानी है क्या, तो वह पानी लायी। फिर वहीं पर दूध रखा हुआ था, दूध लायी तो हमने कहा रहने दो। वह बोली - थोड़ा ले लिजिए। फिर मैं आधा से कुछ ज्यादा दूध पीते हुए उसे पिला दिया। मुँह साफ किया। फिर अपने पाॅकेट से एक मंगलसूत्र निकालकर उसे दिया और मैंने कहा - मेरी तरफ से आपके लिए। लाइट पहले से ही नहीं थी। मोमबत्ती जल रही थी, जो तब समाप्त होने वाली ही थी। वह बोली - अपने हाथों से पहना दीजिए। मैं जैसे ही पहनाने लगा यानी पहना दिया, वैसे ही दीपक बुझ गया और हमारे जीवन का दीपक जल गया। क्या समझा ! हमलोग मुस्कुरा दिये।
         
                अब कहानियों का दौर यहीं समाप्त करते हैं और मुख्य मुद्दे पर आते हैं। कुछ लोग सुहागरात को रक्त का धब्बा ढूँढते हैं, तो कोई दर्द-पीड़ा का अनुभव करना या करना चाहता है। ऐसा नहीं होने पर एक-दूसरे पर शक करते हैं या दूसरे शब्दों में एक-दूसरे से शिकवा-शिकायत रहता है। पर आज के समय में ऐसा सम्भव नहीं है। पहले की अपेक्षा अब ज्यादातर शादियाँ लड़का-लड़की के पूर्ण यौवन होने के पश्चात् ही होती हैं, दोनों की उम्र में भी कम ही अन्तर होता है। अब लड़का-लड़की दोनों ही शारीरिक परिश्रम करते हैं।

               यहाँ हम उस वर्ग की चर्चा तो छोड़ ही दिए, जो उच्च वर्ग अथवा हाईप्रोफाईल कहलाता है। यह ऐसा वर्ग है, जो मध्यम वर्ग से निकलकर उच्च वर्ग में सम्मिलित हो रहा है। इस वर्ग में शादी होने के बाद नयी जोड़ी उसी दिन पहले से निश्चित किसी हिल स्टेशन, टूरिस्ट प्लेस या धर्म-स्थल पर साथ-साथ चले जाते हैं। इस प्रकार साथ सफर करते हुए ये अपने जीवन की शुरूआत करते हैं, जहाँ घर और समाज की बंदिश नहीं होती। दो अंजान लोग सफर में ही मिल जाते हैं, एक-दूसरे के हो जाते हैं। बस, विधिवत् पहले इन्हें मिला दिया जाता है और फिर साथ उठते-बैठते, खाते-पीते हुए ये अपने सफर में एक-दूसरे के हो जाते हैं।

                यहाँ हम सुहागरात के दिन ध्यान देने वाली बातें, जिस पर गौर करना जरूरी है, उसकी चर्चा करेंगे। हमें उस दिन क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए, एक-दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए ? पहले हम हाईप्रोफाइल लोगों की चर्चा करेंगे, क्योंकि इनके साथ भी बहुत सी घटनाएँ देखने में आयी हैं। हाईप्रोफाइल में एक ऐसा वर्ग भी है, जिसके पास संसाधन की कमी है। उन्हे टूर पर जाने से पहले और टूर पर जाने के बाद निम्न बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए  :-

* जगह का चुनाव करते समय शान्तिप्रिय क्षेत्र का चुनाव करना चाहिए, जहाँ का वातावरण ज्यादा अशान्त न हो, जहाँ दंगा-गदर कम होता हो।

* हो सके तो वहाँ पहले से ही होटल/कमरा बुक करा लें।

* अनावश्यक भार (वजन) न ढोयें।

* अपनी रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तु को अपने साथ अवश्य ले लें।

* जहाँ जा रहे हैं, वहाँ का विवरण अपने परिवार वालों को दे दें।

* ज्यादा गहना और जेवरात अपने साथ न ले जाएँ।

* उचित मात्रा में मुद्रा या कैश कार्ड अपने साथ रखें।

* सफर सावधानीपूर्वक तय करें।

* लड़कियों को कुछ विशेष आईटम, जो हर जगह उपलब्ध नहीं हो सकती, उसे अपने साथ रख लेना चाहिए, जिससे उन्हें बाद में शर्मिंदा नहीं होना पड़े।

* हो सके तो मिलाप का साधन अपने साथ रखना चाहिए।

पहुँचने के बाद ध्यान देने वाली बात : -

* आप किस होटल, रेस्तरां, हो सके तो किस कमरे में रूके हैं, इसकी सूचना घर वालों को दे देना चाहिए।

* आप कब तक रूकेंगे और सही से आप पहुँच गए, यह भी बता देना चाहिए।

* आप जिस कमरे में रूके हैं, वहाँ कोई गुप्त कैमरा और रिकार्डर तो नहीं है, इसकी जाँच आपको कर लेनी चाहिए, नहीं तो बाद में आपको परेशानी उठानी  पड़ सकती है।

* आप जहाँ रह रहे हैं, वहाँ मोबाईल नेटवर्क काम कर रहा है या नहीं।

* सोते वक्त अपना दरवाजा ठीक से बन्द करें।

* नशा (व्यसन) का सेवन न करें।

* किसी प्रकार की परेशानी होने पर वहाँ जो सहायता केन्द्र है, उसे जल्द-से-जल्द सूचित करें।

* अनावश्यक लफड़े से बचें और लफड़ेबाजों से दूर रहें।

* शाॅपिंग करते समय डेªसिंग रूम, जिसमें कपड़े की फिटिंग जाँच करते हैं, उसे सोच-समझकर इस्तेमाल करें। हो सकता है, उसमें गुप्त कैमरा लगा हो, ऐसा कई जगह पाया गया है।

Note :-  कुछ डिजीटल कैमरे हैं, जो नेटवर्क को बाधित करते हैं। इस सिद्धान्त पर आप डेªसिंग रूम या अपना कमरा इस्तेमाल करने के पहले, वहाँ से बाहर आकर काॅल करके देखें। अगर बाहर काॅल हो रहा है और ड्रेसिंग रूम या कमरे के अंदर से काॅल नहीं हो रहा है, तो आपको सचेत हो जाना चाहिए।

* अपने मोबाईल में अपने परिचितों के नम्बर संचित (Save) रखना चाहिए।

* हो सके तो दो-चार नम्बर डाॅयल करके भी रखना चाहिए।

* कहीं आते-जाते समय का ध्यान रखन चाहिए।

अब हम आम लोगों की बात करते हैं। हमें उस दिन क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए।

पहले क्या नहीं करना चाहिए:-

* किसी प्रकार का व्यसन नहीं करना चाहिए, जैसे - अल्कोहल, सिगरेट, भांग आदि।

* एक-दूसरे पर शक नहीं करना चाहिए।

* अनावश्यक कसम नहीं खाना चाहिए और न खिलाना चाहिए।

* अगर आप दोनों को जीवन में खुश रहना है, तो अपने दूसरे प्रेम सम्बन्धों की चर्चा नहीं करनी चाहिए और उसे भूल जाना चाहिए। लड़कियों को तो कभी सपने में भी उसे ख्याल नहीं करना चाहिए, न ही कबूल करना चाहिए, क्योंकि ज्यादातर लड़के (मर्द) उस रिश्ते को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। ऽ कभी भी एक-दूसरे के पुराने रिश्ते की खोजबीन न करें। इससे किसी को कुछ नहीं मिलने वाला, सिर्फ नफरत को छोड़कर।

* किसी प्रकार की जिद न करे।

* कभी भी एक-दूसरे के साथ जबर्दस्ती नहीं करना चाहिए।

* किसी गैर (दूसरे) स्त्री/पुरूष से एक-दूसरे का तुलना न करें।

* अपनी इच्छा एक-दूसरे पर न लादें।

* ज्यादा उत्तेजित न हों या बिल्कुल शिथिल भी न रहें।

* आपका जीवन साथी कमजोर पड़ रहा है, यह कभी न झलकने दें।

    पहले क्या करना चाहिए:-

* अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार हो सके तो एक-दूसरे के लिए उपहार रखें। उपहार को कीमत में न तौलें।

* एक-दूसरे के लिए आदर-सूचक शब्दों का प्रयोग करें।

* पहल दोनों तरफ से हो।

* शयनकक्ष में हर वस्तु का उचित रख-रखाव हो और उस दिन की जरूरत के अनुसार वस्तु उसमें उपलब्ध हो। कमरे में ज्यादा भीड़-भाड़ न हो, हवा और प्रकाश का उचित प्रबन्ध हो। कमरे का माहौल खुशनुमा हो।

ऐसे ये काम घर वालों का है, जिनमें प्रमुख रूप से - भाभी, जीजा, जेठानी या वो रिश्तेदार, जिनसे इस प्रकार की बातें खुलकर की जाती हैं।

* एक-दूसरे पर विश्वास करें।

* एक-दूसरे की भावना को समझें।

* एक-दूसरे को प्रोत्साहित करना चाहिए।

* एक-दूसरे की खूबी/अच्छाइयाँ गिनायें।

* एक-दूसरे से सन्तुष्ट रहें।

* एक-दूसरे की सन्तुष्टि का ध्यान रखें।

अन्त में, मैं यही कहना चाहूँगा कि अफवाहों पर न जाएँ। जमीनी हकीकत को पहचानें और अपने जीवन साथी के साथ खुश रहें।


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शनिवार, 18 जुलाई 2015

* अजब तुलना गजब कहानी ! राजू भैया-भाभी के जुबानी !! *

                                                 अजब तुलना गजब कहानी! 
                                      राजू भैया-भाभी के जुबानी!!

                   मैं और मेरा दोस्त राजू राज, दोनों ही लगभग हम विचार हैं और होने वाली घटनाओं को एक-दूसरे के साथ खुले दिल से साझा करते हैं। जीवन का एक पहलू, जिसे हम दोनों ने जिया, वही आपसे आगे साझा करूँगा।

                   राजू राज थोड़ा ज्यादा ही खुले विचार का है। औरतों और लड़कियों यानी स्त्रीलिंग से सम्बन्धित घटनाएँ, उनके अन्तर्मन में होने वाली हलचल, उनके विचार, यहाँ तक कि शारीरिक परिवर्तन से होने वाले विचारों को जानने के लिए वह उत्सुक रहता है। इसके लिए वह हर समय उस प्रकार की पुस्तक पढ़ता है, जिसमें विचारों की अभिव्यक्ति हो। साथ ही, जिस प्रकार के विचार अभिव्यक्त किये गये हैं, उसे स्वयं या अन्य व्यक्ति से साक्षा कर सत्य के तराजू पर तुलना करने की कोशिश करता है। उसी बात को आपके साथ साक्षा करने की कोशिश करूँगा।

                ऐसा नहीं कि वह कोई बड़ा विद्वान और ज्यादा पढ़ा-लिखा है, पर उसके पास आम आदमी से सामान्य जानकारियाँ, जो सभी को पता है, थोड़ी ज्यादा है। जीवन में होने वाली घटनाओं के प्रति जागरूक है। वह हाजिर जवाब भी है। हर बात पर गहराई से सोच-विचार करता है। मैं उसी के भाव-विचार को दूसरे के सामने रखते रहता हूँ। उसी के ज्ञान के कारण मैं कभी-कभी अनाड़ी और अज्ञानी कहलाते से बच जाता हूँ।

                राजू राज भारतीय सेना में जवान है। आज उसकी सेवा की अवधि सात वर्ष से ज्यादा हो गयी है। वह बताता है कि वह पैदल सेना में है।

               वह जब भी अवकाश पर आता है, तो हम सभी साथी उससे उसके हाल-चाल के साथ उसकी मनोभावना जानना चाहते हैं। इसकी एक वजह है, उसकी तुलनात्मक बातें और बात को व्यक्त करने का तरीका ही नायाब रहता है।

                एक बार की बात है। हम दोनों अपने गाँव से दूर सड़क के एक तरफ से दूसरी ओर पानी निकलने के लिये जो सायफन बना रहता है, उसी पर बैठे हुए थे। गपशप हो रही थी। इतने में हमलोगों से थोड़े बड़े हमारे पुराने साथी आ गये और हमारी चर्चा में शामिल होना चाहे। वे बोले - अरे यार राजू, तुम दोनों क्या बात कर रहे हो, जरा हमें भी तो बताओ। राजू तपाक से बोला - पूछो। यहाँ मैं आपको बता दूँ कि जो भाई साहब वहाँ आये थे, उनकी शादी उसी वर्ष हुई थी, जिस वर्ष राजू सेना में कार्यरत हुआ था। पर शायद उन दोनों की मुलाकात उस समय से अभी तक ज्यादा नहीं हुई थी। भाई साहब बोले - अरे यार पूछना क्या है। बताओ मजे में तो हो, सरकारी नौकरी हो गई, वो भी केन्द्र सरकार की, अभी तक कुछ खर्चा-पानी भी नहीं किया ।

               राजू बोला - यार, अब क्या बताऊँ, तुम्हीं से पूछता हूँ , दिल से सही जबाव देना, झूठ मत बोलना। ऐसे मैं तुमको मिठाई तो खिला ही दूँगा। पर यह बताओ, तुम भी तो दाम्पत्य जीवन का आनन्द ले रहे हो। मैं भी आज कहूँ कि जब तुम्हारी शादी के इतने वर्ष हो गये, बच्चा भी हो गया, खुशियाँ दुगुनी हो गई, मिठाई खिलाओ, तो तुम क्या कहोगे। जनाब हँस पड़े और कहा कि अरे यार, शादी में तो मैं मिठाई बाँटा ही था। शादी तो ऐसा लड्डू है, जो खाये वो पछताये, जो न खाये वो भी पछताये और खाये बगैर रहा न जाय। अब बच्चा हो गया, खर्च भी बढ़ गया। राजू बोला - बस-बस यही बात तो हमारे साथ भी है। भाभी अपना सबकुछ छोड़ कर आई और पछता रहे हो तुम। अब तुम ही बताओ, क्या वही उमंग आज भी है और मैं तो ये गाँव, ये साईफन की बैठकी, तुम सबको छोड़ कर गया हूँ। मैं जब प्रथम अवकाश पर आया था, तो रामायण गवाया था, माँ पूरे गाँव में मिठाई बाँटी थी। सेवा पर जाने के पहले कितना खुश था। सभी से चहक-चहक कर मिलता था। दूसरे साथी ने बात को काटा, तू तो आज भी चहकता है। राजू बोला - ये तो मेरा स्वभाव है और मुस्कुरा दिया। राजू ने पुनः कहा - खैर, देख नौकरी ऐसी है, जिसे अपने स्तर पर सभी पाना चाहते हैं। शादी वाली जोलोकोक्ति तुम बोले वही हमारे साथ भी है। जा पाया वो भी रोया, जो नहीं पाया वो तो रो ही रहा है, पर पाना सभी चाहते हैं। सभी इसे पाने के लिए प्रयासरत हैं। दूसरा साथी जिससे राजू की बात हो रही थी, बोला - हाँ-हाँ ! जिसको सरकारी सेवा प्राप्त हो जाता है, ऐसे ही बोलता है। उसका काम सिर्फ दूसरे को भड़काना रह जाता है। इस समय बेरोजगारी में ढूँढने से शायद ईश्वर मिल जाये, पर योग्य नौकरी (रोजगार) मिलनी मुश्किल हो गई है। राजू मुस्काया और बोला ऐसी बात नहीं है। ऐसी उपमा न दो, ईश्वर की तुलना नौकरी से न करो। तुमको तो पत्नी के रूप साक्षात् देवी मिल गई है, जो तुम्हारी मनोभावना को समक्षते हुए तुम्हारी सुख-सुविधा क्या ध्यान रखती है। इतनी सुन्दर और सुशील भाभी मिली। नौकरी के लिये हमें सबको छोड़ना पड़ा और वो सब कुछ छोड़कर तुम्हारे पास आ गई और...। दूसरा साथी बात को काटते हुए - बस-बस अब रहने भी दो, तुम्हारी तर्क के आगे हम क्या हैं ! हम सभी जोर से हंस पड़े और बात जहाँ से आई, वहीं को गई। हमारे साथी बोले - घर पर आओ, भाभी के हाथ का बनाया हुआ चाय पिलवाता हूँ। राजू बोला - सिर्फ चाय पिलवाओगे या... और कुछ। दूसरा साथी बोला - आओ तो सही और हम सभी हँसते हुए एक-दूसरे से विदा हुए।

                मै मध्याह्न का भोजन कर घर पर ही था। पलंग पर लम्बा होकर समाचार-पत्र उलट-पलट कर रहा था। बगल में मोबाईल पर कबीर और रहीम का दोहा बज रहा था। राजू आवाज मारते हुए मेरे पास आया और बोला क्या बात है ? जनाब कबीर वाणी सुन रहे हैं। पुनः बोला - सुन रहे हो या सुना रहे हो। मैंने बोला - तुम जो समझो। जिसके दिमाग और मन में जो चल रहा होता है, वह वैसा ही सोचता है। यहाँ तो सोचने और बोलने कि आजादी है और तुम तो...। राजू बात काटते हुए बोला - बस-बस हमें अभी इस बहस में नहीं पड़ना है। हम जानते हैं, तुम अच्छा बहस करते हो। मैं बोला ठीक है, धन्यवाद, कोई तो हमें अच्छा बहस करने वाला कहा, बैठो। राजू बोला - हम यहाँ बैठने नहीं आये हैं। चलो, तुम्हारी वो जो बगल वाली मौसी हैं, उनके यहाँ चलना है। मैं बोला किसलिए, क्या बात हो गई ? राजू बोला - भूल गया उस दिन चाय पे बुलाया था, नहीं जाऊँगा, तो बुरा मानेगा। मेरे दिमाग में एक बात चल रही है। उसका हल या कहो तुलना करने का कोशिस करूँगा। इस विषय पर बहुत दिन से सोच रहा हूँ। बस तुम्हारी सहमति की मुहर की जरूरत है। मै बोला - यह कौन सा चाय पीने का समय है। सुना है - फौजी आदमी सोचते कम हैं। राजू बोला - क्यूँ ? मैंने कहा - सुना हूँ कि पीटी-परेड से फौजी का दिमाग घुटने में आ जाता है और घुटने से सोचा नहीं जा सकता। लगता है आप मुझसे बहुत सारी बातें छुपा रहे हो। जैसे ही मैं उसको आप बोला, वह समझ गया कि मैं नाराज हो रहा हूँ, क्योंकि मै उसे ज्यादातर, जब कोई नहीं रहता है, तो तू से ही सम्बोधन करता हूँ तथा धीरे से चुटकाते रहता हूँ।

              वह मेरा मन भांपते ही अपने दोनों बाजू से पकड़कर मुझे हिलाने लगा और बोला ऐसी बात नहीं है। जानते हो, हम फौजी जवान तीन बजे भी चाय पीते हैं। यहाँ तो चाय एक बहाना है, उनका दिल भी रखना है और अन्दर में जो बात चल रही है, उसके बारे में भी कुछ जानना है। हम दोनों चल दिये। मैं उसे रास्ते में टोका, कौन सी बात है ? वह रूक गया। क्योंकि जिनके घर हम जा रहे थे, उनका घर पास में ही था। आपको यहाँ बता दूँ कि ये हमारी अपनी मौसी नहीं थी, बल्कि बहुत दूर की थी। हम जब उन्हें मौसी कहते थे, तो वह बहुत खुश होती थीं। राजू बोला - जानते हो, तो मैं बोला - जनाओगे तब तो जानूँंगा। राजू बात को आगे बढ़ाया, बोला - एक लड़की है, उसकी शादी होने वाली है। वह हमसे पूछी कि हमें ये बताइये कि हमें कैसे रहना चाहिये, जो हमें सभी प्यार, स्नेह और इज्जत दें। पहले तो मैंने उसे घुमाने की कोशिश की। पर बार-बार वह यही बात दोहराती रहती है, जो मैंने उससे कहा - ठीक है, शादी ठीक होने दो, फिर मैं बता दूँगा। उसी दिन से मेरे मन-मस्तिष्क में मन्थन चल रहा है। वो लडकी कौन हो सकती है, ये तो आप जान ही गए होंगे। मैं सर हिलाते हुए बोला - हूँ और हम लोग आगे बढ़ गए।

                  कुछ समय पश्चात् हम दोनों मौसी के दरवाजे पर थे। मैं दरवाजा खटखटाते हुआ आवाज दिया - मौसी ! कोई है क्या ! मौसी दरवाजा खोली। हम दोनों ने उन्हें प्रणाम किया। वे हमें खुश रहने का आर्शीवाद देते हुए बोलीं - क्या बात है, ज्यादा व्यस्त रह रहे हो का और ये छुट्टी पर आ के भी ड्यूटी पर है या दिन भर सोता रहता है। हमने एक साथ बोला, ऐसी कोई बात नहीं है। हमने कहा बहादुर नहीं है का। मौसी बोली - है न, टीवी देख रहा है। तब तक हमारे साथी घर से बाहर आ चुके थे। आपको बताता चलूँ कि हमारे साथी का नाम बहादुर नहीं है। बल्कि मेरे मुख से निकलने वाला ऐसा शब्द है, जो मैं लगभग अपने से बराबर या अपने से उम्र में छोटे के लिये इस्तेमाल करता हूँ। हमने आंगन में ही बैठना चाहा, तो मौसी और साथी दोनों ने ही घर में बैठने के लिये कहा। हम घर के तरफ चल दिये। मौसी बोली - आंगन में बैठेंगे। ज्यादा जल्दी है क्या? घर में बैठो, बातचीत करो। हमको मालूम है, रोज-रोज तो आवोगे नहीं। आंगन में मेरे पास कोई-न-कोई आता रहेगा। राजू बोला - आप आदेश तो कीजिए, हम प्रतिदिन आ जायेंगे। हम सभी मुस्कुरा दिये। हम दोनों के बात करने का यही तरीका है। जो हमें समझता है, हमारी बातों से खुश रहता है। कोई-कोई तो हमारी बातों से झेंप भी जाते हैं।

                  हमने जैसे ही कमरे के दरवाजे के अंदर पैर रखा, भाभी जी जो अब तक बैठी थीं, खड़ी हो गई। हमने उनका अभिवादन किया। उन्होंने उसका जवाब भी दिया। हाथ से स्थान दिखाते हुए हमें बैठने के लिये कहा। मैं अपना स्थान ग्रहण करते हुए चुटकी लिया, क्या बात है ! मेरे प्रणाम का जबाव नहीं दिया। किसी को नमस्ते के बदले नमस्ते मिला और मुझे कुछ भी नहीं। ये कहीं सरकारी सेवा का कमाल तो नहीं। मैं इतना बोला था कि वो मुस्कुराती हुई बाहर चली गई। मौसी मिठाई और पानी लेकर चली आई। हमने कहा - इसकी क्या जरूरत है, तो मौसी बोली - इस दुनिया किस चीज की जरूरत है। मैं बोला - आप जैसी मौसी की। मौसी मुस्कुरा दी। इतने में भाभी जी आ गई, उनके हाथ में चाय की प्याली थी। उन्होंने हम सभी को चाय दिया। मैं चाय लेते हुए बोला - आप मेरी बात का जवाब नहीं दी। मौसी बोली - बबुआ ई तोहरो से हाजिर जवाबी बिया। हमने कहा - आखिर ये राज्य की राजधानी जिला पटना की रहने वाली हैं

            और धीरे से, मौसी आप भी तो...। मौसी बोली - जोर से बोल, मैं भी तो वहीं की रहने वाली हूँ, किसी से कम थोड़े ही हूँ। इतने में कोई बाहर से आवाज मार दिया और मौसी चली गई। बच गए हम राजू, भाभी, भाई जान और उनका बच्चा हर्ष प्रताप।

            मौसी के जाने के बाद कमरा बिल्कुल शांत हो गया। सभी चाय की चुस्की ले रहे थे, साथ में एक-दूसरे का चेहरा निहार रहे थे। इस शांति को सिर्फ चाय का घूंट और दीवार घड़ी के चलने की आवाज ही भंग कर रही थी। इस शांति को तोड़ते हुए मैंने बात को आगे बढ़ाना चाहा। मैं बोला - हाँ जी ! मुख तो खोलिये, पता चले इतने सुंदर सजीले दुकान के अन्दर कुछ हमारे काम का सामान है भी या खाली है। भाभी बोली - दुकान है, तो सामान भी होगा। दुकान में तो सभी काम के ही सामान होते हैं। किसे क्या चाहिये दुकान से, ये तो उसके ऊपर है। आपलोग न बनिया बनिये, न ग्राहक, क्योंकि मैं कोई दुकान नहीं हूँ। दुकान में तो वस्तु की क्रय-विक्रय होती है। मैं बोला - बस-बस अब रहने दीजिये, अब बताईये कि हमारे अभिवादन का क्या हुआ। वह बोली - सुनिये जी आप लोग हमारे सामने छोटे तो हैं नहीं। इन्होंने नमस्ते कहा, तो मैं इन्हें नमस्ते कह दी। आप हाथ जोड़ के प्रणाम बोले, तो आपके लिए हाथ जोड़ दी और आशीर्वाद तो दिल से दिया जाता है। आप तो हाथ जोड़कर दरवाजे पर ऐसे खड़ा हो गये, जैसे कोई नेता जी वोट मांग रहे हों। हमने कहा - वोट नहीं आपका प्यार भरा आशीष चाहिए। हम कोई नेता जी थोड़े हैं। भाभी बोली - हमारा प्यार भरा आशीष आपके साथ है, पर आप नेता जी से कम थोड़े ही हैं। जैसे नेता लोग बहुत दिन के बाद या अपने मौसम पर ही नजर आते हैं, उसी प्रकार आप भी नजर आते हैं। हम मुस्कुरा दिए। फिर वो राजू के तरफ मुखातिब हुई और बोलीं - आप गुमशुम क्यूँ हैं ? हमने सुना है, फौजी आदमी बहुत बोलते हैं। और आप हैं कि बिल्कुल गुमशुम हैं। मैं बोला - जानती हैं। वो बोली - जनाईयेगा, तब तो जानूँगी। सभी हंस दिये। मैं बोला - इसकी आदत है, लोगों को झूठा साबित करना। फौजी बहुत बोलते हैं, इस बात को झूठा साबित करना चाह रहा है। अरे यार, एक तुम्हारे न बोलने से लोगों की धारणा थोड़े ही बदल जायेगी, औसत देखा जाता है। पता है ये कब बोलेंगे, जब दो-चार फौजी इकट्ठा हो जायेंगे। फिर ये क्या बात कर रहे हैं, पास वाला आधा भी समझ नहीं पाता। ये अपने में ही मशगूल हो जाते हैं। एक कहावत है - ‘खग जाने खगही की भाषा’, जो इन पर लागू होती है। राजू बोला - ऐसी बात नहीं है। हम दोनों ने कहा - फिर कैसी बात है ? राजू बोलने लगा - जितना हम लोगों की चिन्ता करते हैं, क्या कोई हमारा इतनी चिन्ता करता है। हमें तो लोग भूल ही जाते हैं। हमें उन्हें याद दिलाना पड़ता है। एक भोजपुरी में कहावत है, जिसे मेरी माँ कहती है - ‘जो पूत परदेशी भईलन, देवता-पितर सब से गइलन '। 
  
                           भाभी जी राजू से बोलीं - अच्छा ये बताईये ! आपको जब जाॅब मिला होगा, आप बहुत खुश हुए होंगे। हमें आप लोगों का पोशाक और आप लोग जहाँ रहते हैं, वो क्षेत्र देखने में बहुत अच्छा लगता है। आप लोगों का कदम से कदम मिलाकर चलना मन को लुभाता है। आपको जाॅब पर गये हुए इतना दिन हो गया, आपको कैसा लग रहा है ? राजू बोला - क्या बतायें ? भाभी जी बोलीं - यही जो हमने पूछा, सुना है आप इनफेंटरी में हैं। आप क्या करते हैं ? कुछ तो बोलिये, चुप क्यों हैं ? नहीं बोल पा रहे हैं, तो हमें सिर्फ ये तो बता दीजिये कि आपकी दिनचर्चा क्या है ? राजू मुस्कुरा कर बोला - ठीक है। हम तो सब बता देंगे, पहले आप बताइए कि...। भाभी बोली - पूछिए, शरमाइए नहीं। राजू बोला - अच्छा ये बताइए, जब आपकी शादी तय हुई, तो क्या आप खुश हुई थीं ? भाभी - हाँ, सभी होते हैं, कोई ज्यादा, कोई कम, कोई दिखाता है, कोई शर्माता है। राजू - आपके अन्दर किसी प्रकार का रोमांच या सोच उत्पन्न हुई होगी। भाभी - हाँ (मुस्कुराती हुई), अब ये न पूछिएगा कि शादी के बाद क्या हुआ। जो होता है, सभी जानते हैं। उसका परिणाम आपके सामने खेल रहा है। हम सभी मुस्कुरा दिये। राजू बोला - ऐसी बात नहीं, हम जो पूछना चाहते हैं, कुछ और है। अगर आपकी इजाजत हो तो...। भाभी बोलीं - पूछिए। राजू - नहीं, पहले आप यह बताइये कि आप सही-सही और बिना संकोच के विस्तार से बतायेंगी। भाभी सोच में पड़ गई। फिर बोली - ठीक है, बोलिये। राजू - आप हमको ये बताइए कि जब आपकी शादी तय हो गयी, तो उसके बाद क्या सोचती थीं। लोग भी आपको सुझाव देते होंगे, आप पूछती भी होंगी। लोगों की प्रतिक्रिया क्या थी ? अभी आप शादी-शुदा जिन्दगी का सुखद आनन्द ले रही हैं। हमारे समझ से आप खुश भी हैं। भाभी बोलीं - जी। राजू पुनः पूछने लगा - आप हमें यह बताइए कि एक लड़की शादी के बाद किसी की अद्र्धांगिनी, बहू, भाभी हो जाती है, उसे सभी रिश्ते निभाने पड़ते है। उससे सभी को अनेक अपेक्षाएँ होती हैं। वह जहाँ जाती है, वहाँ की स्थिति-परिस्थिति सभी से अन्जान होती है। उसे वहाँ किस प्रकार रहना चाहिए, मैं आपसे जानना चाहता हूँ। आप अपने अनुभव को हम लोगों के बीच व्यक्त करने का कष्ट कीजिए। भाभी बोलीं - क्या बात है ? आप इतने मार्मिक और रोमांचित करने वाली बात पूछ रहे हैं। ये तो कोई लड़की ही पूछ सकती है, जो उत्सुक और जागरूक हो, जो अपने दाम्पत्य जीवन में अपनी तरफ से किसी प्रकार की चूक नहीं करना चाहती हो। राजू बोला - ऐसा ही मानिए। भाभी बोलीं - तो चाय पर इतनी लम्बी वात्र्तालाप कैसे चलेगी ? आपलोगों के लिये मैं कुछ बनाती हूँ। राजू बोला - फिर हमें बतायेगा कौन ? हमें खिलाइए नहीं, समझाइए। भाभी बोलीं - ठीक है, भूंजा लाऊँ। राजू बोला - चलेगा और भाभी भूंजा लाने चली गई। हमारे भाई साहब बोले - भाई आपलोग बात कीजिये, मैं थोड़ा जानवरों को खाने के लिये चारा डाल देता हूँ और वे चले गये। भाभी जी मिश्रित भूंजा ले आई। हमें भूंजा देते हुए कहा - आप लोग अपने भाईसाहब को कहाँ भेज दिये। हमने कहा - आ रहे हैं।

               हमारी चर्चा पुनः शुरू हुई। भाभी बोलीं - देखिये जी, जब हमारी शादी तय हो गई, तो हमें कुछ अजब तरह का रोमांच का अनुभव हुआ। अमूमन हमारे विचार से सभी लड़का-लड़की अंदर से रोमांचित होते हैं, मैं भी हुई। लड़के शायद ज्यादा अपनी होने वाली दुल्हन के बारे में सोचते होंगे, पर लड़की अपने होने वाले पति के साथ उनके घर-परिवार, वहाँ की स्थिति-परिस्थिति सभी के बारे में सोचती है। हमारी शादी तय होने के सात माह के बाद एक निश्चित दिनाक 23 जून को हुई, जिसे दोनों परिवारों के लोगों ने अपनी सुविधा और धार्मिक मान्यता के अनुसार शुभ मुहूर्त में रखा। वो सात माह शादी तय होने और शादी होने तक गजब का होता था। ऐसे लड़की का पालन-पोषण हमारा समाज उसी प्रकार करता है जैसे कि उसे दूसरे के घर जाना है। लड़की को मानसिक तौर पर तैयार कर दिया जाता है कि उसके पति का घर ही उसे अपना घर लगने लगता है। हमसे जब कोई चूक हो जाती और जिसके स्तर की होती, सभी यही बोलते कि ससुराल में जाकर यही करोगी। हमारा नाम हंसाओगी का। हमारे खाने-पीने, बोलने, जागने-सोने, यहाँ तक कि कपड़ा पहनने के लिये टोका-टोकी शुरू हो गई, जैसे हमारे घर वाले हमें किसी ‘शो’ के लिये तैयार कर रहे हों और जैसे कम्प्यूटर में प्रोग्राम डाल रहे हों। उनका प्यार और आशीर्वाद हमारे साथ था। आज मैं घर-परिवार और टोला-मोहल्ला में जो अच्छी-बुरी हूँ, उनके दिये हुए संस्कार और स्नेह के कारण। हम सभी ने एक ठंडी सांस ली और भाभी रूक कर फिर बोली - आप लोगों को एक और बात बताती हूँ, इनका फोटो गया था। राजू बीच में बोला - किनका ? भाभी बोली - आपके भाई जी का और किनका। आज की तरह तो हमारा देखा-देखी नहीं हुआ था। इन्हें देखने हमारे पापा जी आये थे और इनके मामा जी हमें देखने गये थे। पिताजी इनका एक फोटो ले गये थे, जिसे मैं एक बार देखी थी, जो कि पापा जी ने टेबल पर रखा था। हमारी भाभी ने फोटो लाकर हमें दिखाई, तो हमें बहुत अच्छा लगा। वही हमें अपने शरीर को साफ और स्वच्छ रखने के लिये बताई। ऐसे तो सभी लोग सभी कार्य और बात को अन्य माध्यमांे से भी जान जाते हैं, पर समाज में बनाये हुए सभी रिश्तों का अपना ही महत्त्व है।

                    राजू बोला - आपकी बात सही है। सभी रिश्तों का अपना महत्त्व है, पर आधुनिकता और भौतिकता के सामने रिश्तों का महत्त्व कम होता जा रहा है। किसी ने कहा है - भौतिक वस्तु इस्तेमाल के लिए और इन्सानी रिश्ते प्यार के लिये बना है। रिश्ते में दरार आने लगती है, जब लोग भौतिक वस्तु से प्यार और इन्सान को इस्तेमाल करने लगते हैं। हमें बताइये कि शादी के बाद एक लडकी को कैसे रहना चाहिये ?

                    भाभी बोलीं - आपको बता दें कि जिस रात का कपल यानी शादी-शुदा जोड़ी को इंतजार रहता है, जिसे लोग सुहागरात, फस्ट नाईट, हनीमून, दो जिस्म एक जान की रात, पता नहीं और क्या-क्या नाम देते हैं, उसके पहले हमें एक रात यू हीं मिल गया। क्योंकि आपके घर में मान था और उस दिन जो पूजा होनी थी, दूसरे दिन हुई, जिसकी कहानी सहपाठी, सहेली और आपके जैसे देवर सुनना चाहते हैं। राजू बोला - उस रात कि बात को यहीं छोडि़ये। हमें दूसरा बात बताईये। उस रात की बात के लिये हम अलग से समय निकालेंगे। भाभी बोलीं - ठीक है।

                   सुहागरात के पहले जो हमें एक रात मिला था, उस रात हम लगभग एक बजे तक जागती रहीं। कारण था, ग्यारह बजे तक तो हमसे लोग बात करते रहे। जब मैं बिस्तर पर गई, तो नींद नहीं आ रही थी। अन्जान स्थान, अन्जान बिस्तर, ऊपर से मन में अनेकों ख्याल आ रहे थे। ख्यालों में पता नहीं चला, हम कब सो गई। चार बजे सुबह में ही दीदी जी यानी आपकी बहन जी, मेरी ननद जी ने हमें आवाज दिया और दरवाजा खटखटाया। मैं हड़बड़ा कर उठी और दरवाजा खोल दी। वो हमें नित्यक्रिया करने और स्नान के लिये बोलीं। मैं तैयार हुई और पूजा-पाठ की। घर का दूसरा सदस्य जान भी नहीं पाया। इसके लिये आपकी मौसी बहुत खुश हुई। इस समय को लगभग दो सालों तक मैंने ऐसे ही नित्य रखा। मैं दीदी जी की आभारी हूँ, जो मुझे उस दिन जगाई। वही बात हुई, जो अंग्रेजी में कहते हैं - फस्ट इम्प्रेशन इज लास्ट इम्प्रेशन, जो आज तक बरकरार है। राजू बोला - अब आठ बजे सुबह तक सोती हैं। भाभी बोलीं - नहीं जी, अब तो आदत हो गई है, देर से सोना और जल्दी जगना। उस समय नींद भी बहुत आती थी। बड़ी मुश्किल से हमने नींद के साथ समझौता किया। शुरू के समय में ही लोग ध्यान देते हैं और अच्छी-बुरी आदतों को जल्द से जल्द जानना चाहते हैं।

                राजू बोला - मान लीजिये, मैं आपकी बहन की जगह पर हूँ। तो आप हमें क्या सलाह देंगी। देखिये जी, ऐसे आप मेरी बहन तो नहीं, पर बहनोई हो सकते हैं। हमने बोला - बना लीजिये, कुछ दहेज भी बच जायेगा। और हम सभी हंस दिये। राजू हमारा हाथ दबाते हुए बोला - चुप रहो। भाभी बोलीं - जब आप पूछे हैं, तो बता ही देती हूँ। सुनिये, जब कोई लड़की ब्याह के ससुराल आती है, तो वह ज्यादा न बोले, जितना आवश्यक हो, उतना ही बोले। सभी की बात ध्यान से सुने। सभी को आदर देना उसका कत्र्तव्य हो। बहुत से आंगतुक, रिश्ते-नाते वाले कुछ दिन के बाद चले जाते हैं। कोई-कोई खड़ी बोली बोलने वाले और कुछ खड़सू भी होते हैं। उनका अलग से ख्याल रखें। नई दुल्हन के पास घर और पास-पड़ोस के छोटे बच्चे तथा लड़कियाँ ज्यादा समय देती हैं। उनसे अनावश्यक और ज्यादा न बोलें। ये तो आम बात हो गई, पर मुख्य बात है, जो दुल्हन के लिये उस समय ज्यादा मुश्किल होती है। उस समय नींद बहुत आती है। नई दुल्हन को कोशिश करनी चाहिये कि सबसे अन्त में अपने कमरे में जाये या सासूजी बोले तो और घर का काम निपट गया हो तब अपने शयन कक्ष में जाये। प्रभात में जल्द जगने की कोशिश करे। उसे नित्यक्रिया स्नान आदि करते कोई ना देखे। उचित श्रृंगार और पहनावा रखे। मृदुभाषी रहे। ये कुछ दिन का प्रभाव ही उसके सुखद जीवन की दिशा तय करता है। एक बात और आपको बता दूँ कि हम भी अपनी मायके की बहुत बड़ाई करती हूँ। पर, मायके की ज्यादा चर्चा नहीं करनी चाहिये। हर बात में मायके को न लायें, न ज्यादा किसी से तुलना करें। नहीं तो मजाक और उपहास का पात्र बनना पड़ेगा।

                    राजू बोला - अच्छा भाभी तो हम चलते हैं। उस रात वाली बात और उसके बारे में जानने लिये मैं अलग से समय निकालूँगा। भाभी बोलीं - वो तो ठीक है, पर जाने की इतनी जल्दी क्यूँ है ? आप तो अपने सर्विस के बारे में कुछ बताये नहीं। पहले आप बताइये, फिर जाने की सोचियेगा।

                    राजू बोला - ठीक है। अगर मैं तुलना करूँ, तो आप हंसियेगा। एक इन्फेन्टरी के जवान का हाल उस ब्याही बहू वाली है, जो ससुराल में नई-नई आती है। भाभी जी हंस दी और बोली मजाक नहीं बनाइये, चुपचाप बताइये। राजू बोला - चुप हो जाऊँगा, तो कैसे बताऊँगा। भाभी बोलीं - ठीक है, ठीक है। मैं अपने शब्द को वापस लेती हूँ, अब बोलिये। राजू बोला - मुख से निकला वाणी, कमान से निकला बाण वापस नहीं होता, अतः इंसान को सोच-समझ कर उचित शब्द ही बोलना चाहिये। ठीक है सुनिये।

                    राजू अब विस्तार से बताने लगा। देखिये भाभी आप को तो हमारे घर की स्थिति-परिस्थति का पता है, जिसके कारण मैं जल्द-से-जल्द सेवा में लगा। ये मैं नहीं कह रहा हूँ कि मैं बहुत योग्यता रखता था। पर लोगों के व्यवहार के कारण मैं जल्द से जल्द नौकरी पाना चाहा और पाया। माँ कहाँ-कहाँ मन्नत भी मान दी। नौकरी लगने का तो खुशी होता ही है, पर उतना नहीं, जितना आपको अपने शादी ठीक होने पर हुआ था। भाभी शरमा कर हंस दी और बोली - बस कीजिये, आगे बोलिये। राजू बोलना शुरू रखा। भर्ती प्रक्रिया पूरा होने के बाद एक निश्चित दिनांक दिया गया। दिए हुए दिनांक पर हम भर्ती केन्द्र पर गये और वहाँ से एक निश्चित दिन 16 अप्रैल को हमें प्रशिक्षण केन्द्र भेज दिया गया। वहाँ पहुँचते ही तहकीकात शुरू हुई, कहाँ से आये हो, इस तरह के अनेक सवाल पूछे गये, जिसे बताना उचित नहीं समझता हूँ। प्रशिक्षण केन्द्र में साथ के जितने भी प्रशिक्षु थे, सभी को निश्चित समूहों में विभक्त कर अलग-अलग कम्पनियों में रख दिया गया। हमारी देख-रेख और हमें फौजी माहौल में ढालने तथा फौजी बनाने के लिये विभिन्न वर्ग के लोग नियुक्त कर दिये गये। हमें वहाँ के सभी लोग कुछ-न-कुछ बताते रहते। कुछ लोग बोलते, नहीं सीखोगे तो यूनिट में बहुत तकलीफ होगी। कोई बोलता, यही तुमको पूरे सर्विस में काम आयेगी। जैसे आपको सभी लोग शादी तय होने के बाद टीका-टिप्पणी करते रहते थे, वही हाल यहाँ भी था, जो सही भी था। यूनिट जाकर हमने देखा, प्रशिक्षण केन्द्र में जो जैसा था, यूनिट में भी वैसा ही है। आप अभी जैसे बहुत सारी नई जानकारियाँ और अनुभव ग्रहण कर लीं है, वैसे ही एक फौजी भी फौज के बारे मे अनुभव के रूप जानकारियाँ ग्रहण कर लेता है। शादी के दिन जिस प्रकार आपको सजा-धजाकर अतिथियों के बीच अग्नि के समक्ष वचनबद्ध किया गया था, उसी प्रकार एक जवान जब अपना प्रशिक्षण उत्तीर्ण कर लेता है, तो एक निश्चित तिथि को वह सज-धज कर अतिथियों के बीच अपने धर्म के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज और रेजिमेन्ट ध्वज के समक्ष शपथ लेता है। उस दिन वह फौजी संस्था के साथ वर-वधू की तरह कच्चे धागे से बंध जाता है।

                फौजी जवान को शपथ दिलाने के बाद विभिन्न माध्यमों से किसी के नेतृत्व में उसे अपने-अपने यूनिट को भेज दिया जाता है।

               यहाँ वही हालत मेरी हुई, जैसे आपको अपने ससुराल में आने के बाद हुआ। वहाँ पहुँचने के बाद हमें सभी से परिचय कराया गया। यूनिट का क्षेत्र घुमाया गया। रात को सोया, तो थकने के कारण गहरी नींद आई। चार बजे एक श्रीमान् ने जगा दिया और अभिनन्दन के साथ दिनचर्या शुरू हुई, जो रात में ही समाप्त हुआ। यह सिलसिला प्रतिदिन का रहा। हमारे जो सीनियर थे, वह सो जाते, तो हमलोग भी सो जाते या वह बोल देते - जाओ आराम करो, तो हमलोग आराम के लिए चले जाते। दो साल के अंदर यूनिट के अंदर जिसने जैसी छवि बनायी, वह आज भी थोड़ा-सा अंतर के साथ बना हुआ है। अब आप बताइये, है न एक नववधू की जिन्दगी। भाभी बोलीं - बात तो आपकी ठीक है। तुलना भी गजब किये, मान गई। पर एक बात में अंतर है। हमें रात्रि में भी मन या बे-मन से जागना पड़ता है। तो हम सभी हंस दिये और राजू बोल पड़ा - आपकी बात बिल्कुल सही है। ये तो मैं बताया ही नहीं, हमें भी रात्रि में रात्रि प्रहरी (संतरी) के लिये जागना पड़ता है। कभी-कभी लगातार या ज्यादातर एक-दो रोज के बीच ड्यूटी होती है। यहाँ तो आपके मन के बारे में कोई पूछता भी है, पर हमारा मन हो या न हो, हमारे बारे में तो कोई पूछता भी नहीं। अब तो आप मान गई न ! भाभी जी बोली - हाँ जी, आप तो अजब तुलना करके गजब कहानी बना दिए।

                    हम लोग खड़े होते हुए बोले - अच्छा भाभी इजाजत हो, तो हम चलते हैं। रात वाली बात के लिये फिर कभी आयेंगे। सभी मुस्कुरा दिये। राजू बोला - जानती हैं...। भाभी तपाक से बोलीं - जनाइयेगा, तब तो जानूँगी। राजु मुस्काता हुआ बोला - इसी कारण से एक फौजी अपनी परिवार को ज्यादा चाहता है। अगर पत्नी थोड़ी समझदार है, तो उसका बहुत ख्याल रखता है, उसकी तकलीफ को समझता है। अच्छा फिर मिलेंगे, तब तक के लिये इजाजत दीजिए, नमस्ते।
                                                                       

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