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गुरुवार, 16 जुलाई 2015

* प्रेम-प्रलाप *

                                                       


प्रेम, प्रेम, प्रेम... हाय रे शब्द, प्रेम को व्यक्त करने के अनेक तरीके और विभिन्न आयाम हैं।
                  प्रेम, प्यार, इश्क, मोहब्बत, Love  इत्यादि, इन शब्दों को लगभग एक ही अर्थ में लिया जाता है, पर इनकी अभिव्यक्ति के तरीके अलग-अलग हैं। इन शब्दों पर अनेक विद्वानों ने अनेक दोहे, काव्य, महाकाव्य, ग्रंथ लिखे हैं। कबीर की एक साखी है -
                    पोथी पढि़-पढि़ जग मुआ, पण्डित भया न कोय। 
                    ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पण्डित होय।।

                  प्रेम को कोई ईश्वर का रूप मानता है, कोई इसे समुद्र कहता है, तो कोई पर्वत का शिखर। हम यहाँ न प्रेम को परिभाषित करना चाहते हैं और न उसकी सीमा बताना चाहते हैं। हम तो इस लोक में, धरातल पर, जो हो चुका है, जो हो रहा है, उसी का संक्षिप्त रूप में चर्चा करना चाह रहे हैं। हम यहाँ कोई नया शब्द या नई सीमा का निर्माण नहीं करने जा रहे हैं, हम तो सिर्फ उसे देखने का प्रयास कर रहे हैं, जो हमारे सम्मुख हो चुका है और हो रहा है और उसका परिणाम क्या हुआ, सिर्फ उस पर हम एक नजर डालेंगे और हमारे बीच की संतति जो बोल-वचन करती है, उसे हम विवेक और हृदय के तराजू पर तोलने का कोशिश करेंगे।

                 हम यहाँ पहले भद्र-अभद्र टीका-टिप्पणी पर चर्चा करेंगे। फिर जो ऐतिहासिक और मशहूर उपमा है, उस पर चर्चा करेंगे। कोई पे्रम को इबादत कहता है, तो कोई कुछ और। यहाँ हम कुछ उक्ति और बोलचाल में प्रयुक्त शब्दों और वाक्यों पर ध्यान देंगे -
                 प्रेम और युद्ध में सब जायज है। आखिर कैसे युद्ध द्वेष, ईष्र्या एवं विरोध से उत्पन्न होता है ? क्या ये सभी समाज के नव-निर्माण के लिये सही हैं। कोई भी युद्ध हो, चाहे उसे धर्मयुद्ध की उपाधि से विभूषित किया गया हो, युद्ध को कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता। जहाँ प्रेम को इस अर्थ मे प्रयोग किया जाता हो, उसे हम कैसे सही ठहरा सकते हैं, जो कहता हो सब जायज है। रास्ता सही है या गलत, तो फिर उसे सही कैसे ठहरा सकते हैं।

                 L = Loss of Money 


                O = Out of Mind 



                V =   Value of Time 



                E = End of Life 


                इस उक्ति में जो लिखा है, क्या सही है या फिर गलत ! अगर सही है, तो किसके संदर्भ में। हम जब युवा हैं और जब हमारा तरूण अवस्था चलता है, तो हम अपना बहुमूल्य समय व्यतीत कर देते हैं। हम न अपना जीवन संवारते हैं, न समाज के विकास में काम आते हैं और समय निकल जाने पर समय को कोसते हैं, जो सही नहीं है। समय (काल) तो गतिशील है, यह अपने निश्चित चाल में चलता रहता है। सही ही कहा गया है        
         - अब पछताये क्या होत है,
          जब चिडि़या चुग गई खेत।

             प्रेम को अंग्रेजी में 'Love is Blind' कहकर विभूषित किया गया है। Blind यानी अंधा। जो अंधा है, उससे हम क्या अपेक्षा कर सकते हैं ? मानते हैं अंधे व्यक्ति भी प्रतिभा के धनी होते हैं, पर सभी ऐसे नहीं होते। अंधा तो अंधा ही होता है। जो लोग इस उक्ति का प्रयोग करते हैं, उनके बारे में हम क्या कहें। जिसके मुख से ऐसा उक्ति निकलता हो, उसका मस्तिक कितना उचित होगा। क्या अंधे को संसार का दृश्य दिखता है, जो वह दुनिया का सही निरूपण कर सके। सभी श्रीकृष्ण भक्त कवि सूरदास नहीं हो सकते।

           लेकिन दूसरे अर्थ में कहा जा सकता है कि 'Love is Blind' उक्ति को हमारे समझ से प्रथम बार प्रयोग करने वाला कोई योग्य व्यक्ति ही रहा होगा। जब बच्चा माँ के गर्भ में आता है, उसी समय से बिना देखे ही माँ उससे प्यार करती है। वह लड़का है या लड़की है, गोरा या काला है, उसका व्यवहार और चरित्र क्या होगा, माँ को कुछ भी पता नहीं होता।

                  Love is game  - Play it . 
              Love is book  - Read it . 
              Love is life     - Enjoy it . 
              Love is danger -Face it

             इन उक्तियों में ध्यान देने योग्य निम्न बातें हैं:-
            Love is game  - Play it .  - प्यार अगर खेल है, तो नियम से होना चाहिए। इन्सान, जिसने मनोरंजन के लिए खेल बनाया, उसके लिए बहुत सारे नियम बनाये और ईश्वर ने प्रेम (Love) बनाया, क्या उसका कोई नियम-कायदा, अभिव्यक्ति का सलीका (तरीका) नहीं है। प्रेम  तो सृष्टी चलाने के लिए ईंधन का काम करती है। प्रेम तो बहुत बड़े खेल का रूप है, जो पूरे जगत में व्याप्त है। प्रेम के लिए भी तो नियम (Rule) हैं, जो जगत-व्यवहार या शास्त्रों में वर्णित हैं। हमें उसका अनुसरण तो करना ही चाहिए।

             Love is book  - Read it . प्रेम अगर पुस्तक है, तो सही है। पर यहाँं लोगों को हमारे द्वारा नहीं, बल्कि विद्धानों द्वारा सलाह दी गई है कि कभी सस्ता साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए और निम्न कोटि के पुस्तकों से दूरी बनाकर ही रहना चाहिये। सस्ती लोकप्रियता ज्यादा दिन नहीं टिकती। कोई भौतिक वस्तु ही लें, जो आसानी से या सस्ते में मिल जाती है, वह ज्यादा दिन नहीं चलती। कभी-कभी उसके उल्टे और बुरे परिणाम भी भोगने पड़ते हैं। पे्रम जो सृष्टि का आधार है, इसे सस्ते में कैसे लिया जा सकता है ?

            Love is life - Enjoy it . -प्रेम (प्यार) तो जीवन का आधार है। प्रेमवश ही एक माता-पिता अपने बच्चे पर सर्वस्व न्यौछावर कर देते हैं। बच्चा ही उनका जीवन बन जाता है। उसी में उन्हें आनन्द की प्राप्ति होती है। आनन्द (Enjoy) के लिए स्वस्थ शरीर, स्वच्छ और निर्मल मन, शांत-सगुण भरा वातावरण होना ही चाहिए। जहाँ शान्ति है, वहाँ सगुण है, सगुण है तो आनन्द (Enjoy) है। जहाँ बेचैनी हो, तृष्णा हो, वहाँ आनन्द (Enjoy) कैसे हो सकता है। जीवन के आनन्द को हम सिर्फ तरूण युगल से नही बांध सकते।

             Love is danger -Face it. - प्यार (प्रेम) खतरनाक नहीं हो सकता, यदि प्रेम करने का सलीका सही हो। जब पे्रम का साधन, सम्बन्ध और सलीका सही है, तो कोई वजह नहीं है कि इसे खतरा बताया जाये। फिर भी अगर यह खतरा है, तो उसका सामना करना चाहिये। अगर एक माँ का बच्चा भूख से या माँ के स्पर्श के लिए रो रहा/रही है और हालात कुछ ऐसा है कि माँ सकुचा रही है और अपने प्रेम को दबा रही है तो उसे उस समय इस खतरे का सामना करना चाहिये।

यहाँ आपको हम थोड़ा ध्यान दिलाना चाहेंगे कि आखिर हम कैसे कहेंगे कि अमुक कार्य या कथन सही है या गलत। इसका आसान सा तरीका है - हम किसी कार्य को अन्य लोगों से छिपाते हैं, तो उसके छिपाने का क्या कारण हो सकता है ? जिस कार्य को अपनी सुरक्षा और मर्यादा को छोड़कर इसके अलावे भी छिपाना पड़े, तो उसमें कहीं-न-कहीं कुछ गलत जरूर है। हमें ऐसा कार्य, व्यवहार नहीं करना चाहिये, जिसे हमें छिपाना पड़े।

                कुछ लोग तर्क देते हैं कि माँ बच्चे को पर्दे में दूध पिलाती है। युगल दम्पति पर्दे में रहते हैं। राज्य और देश की सरकार बहुत से कार्यों और योजनाओं को छुपाती है। तो, यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि उनका यानी माँ और युगल दम्पति के मस्तिष्क में तथा सरकार के कार्य-प्रणाली में क्या चल रहा है। माँ अपने बच्चे को बुरे लोगों की नजर से बचाने के लिए ऐसा करती है। युगल दम्पति जीवन की मर्यादा और संस्कृति के नाते ऐसा करते हैं और सरकार सुरक्षा के लिए ऐसा करती है, जो सही है। इन सबकी मनोभावना अपने कार्य को छुपाने में नहीं है। इनमें कोई भी ऐसा कार्य नहीं, जिसे हम सभी से छुपाना पड़े। हम प्रेेमियों और उनके प्रेम-प्रसंग को भिन्न-भिन्न श्रेणियों में रख सकते हैं:-
                1.    अलौकिक या सर्वोत्तम श्रेणी का प्रेम

                2.    लौकिक या उच्च श्रेणी का प्रेम

                3.    मध्यम या औसत श्रेणी का प्रेम

                4.    निम्न श्रेणी का प्रेम

                5.    अतिनिम्न श्रेणी का प्रेम

               नीचे हम कुछ प्रेेमियों के जीवनी की झलक लेंगे, जो जगजाहिर है। फिर, हमारे आस-पास की जो प्रेम कहानियाँ हैं उन पर ध्यान देंगे। आप खुद ही निर्णय कर लेंगे कि कौन किस श्रेणी का प्यार है।

                वर्तमान में प्यार क्या है ? अभी जो आज के नवयुवक हैं, उनके आचरण में ओछापन आ गया है। ज्यादातर लोग विपरीत लिंग वाले के बीच के आकर्षण को प्यार कहते हैं। पश्चिमी सभ्यता का Love  जो हिन्दी के प्यार शब्द का स्थान ले रहा है, वह हमारे नजर में उचित नहीं है। यह तो सिर्फ आकर्षण है। धन, कपड़ा, शान-शौकत, चमक-दमक के प्रति जिसे ये सवअम का नाम देते हैं, जिसका भूत उतरते देर भी नहीं लगता और दोनों को एक-दूसरे का भ्रम टूटते भी देर नहीं लगता।

               एक शब्द ‘इश्क’ है, जो प्यार को व्यक्त करने के लिए होता है। यह शब्द हिन्दी का शब्द नहीं है। यह दूसरे भाषा से लिया गया है। यह मूल रूप से पारसी शब्द है। इश्क को एक प्रकार का जुनून भी कह सकते हैं। जुनून एक हद तक मानव विकास के लिए सही है, पर व्यवहार के लिए नहीं। व्यवहार में जुनून नुकसान ही पहुँचाता है।

               प्रेम अभिव्यक्ति के लिए ‘मोहब्बत’ शब्द भी प्रयोग में लाया जाता है। यह उर्दू भाषा का शब्द है। इसका संधि-विच्छेद तो नहीं होता है, फिर भी हम अगर उपसर्ग के रूप में ‘मोह’ को लें, तो मोह का अर्थ लोभ भी होता है। लोभ या मोह का गुण या अवगुण का अवलोकन हम क्या करे। कहा भी गया है - लोभः पापस्य कारणम् अर्थात् लोभ पाप का कारण है। जहाँ मोह, लोभ हो, वहाँ अन्ततः प्रेम नहीं हो सकता। लोगों का लोभ, मोह स्वार्थ के अनुसार तुरन्त-तुरन्त परिवर्तित होते रहता है। जहाँ तुरन्त-तुरन्त मोह भंग होता हो, वहाँ हम उत्तम जीवन की कामना कैसे कर सकते हैं ?

            प्रेम को हम बुरा नहीं कह रहे हैं। प्रेम को इस जगत से विलुप्त कर दें, तो सारा सांसारिक सम्बन्ध ही खतरे में पड़ जायेगा। ऐसे में संसार की क्या स्थिति होगी, उसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। पृथ्वी पर से गुरूत्व बल को हटा दिया जाय, तो जो स्थिति पृथ्वी की होगी, वही स्थिति जीवन में से प्रेम को हटाने पर उत्पन्न होगी। बगैर प्रेम हम सुन्दर, शांतचित्त, सम्यक् जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। प्रेम से वशीभूत होकर ही महात्मा बुद्ध ने मानव के दुःख से दुःखी हो जन-कल्याण के लिये पथ-प्रदर्शित किया। अगर इस सृष्टि से जल और वायु समाप्त हो जाय, तो धरातल पर क्या होगा ? इस जगत में क्या बचेगा ? इस धरातल पर न कुछ उपजेगा, न ही दुनिया देखने और सुनने लायक रहेगी। रहेंगे तो सिर्फ सुनसान वीरान पर्वत-पठार, जिसे देखने के लिए न हम रहेंगे और न आप। जिस प्रकार इस सृष्टि के लिए जल और वायु की आवश्यकता है, उसी प्रकार मानव सभ्यता के लिये प्रेम आवश्यक है। मानव के लिए ही क्यों, इस सृष्टि के लिये प्रेम का उतना ही महत्त्व है, जितना जल और वायु का। इस सृष्टि में प्रेम न हो, तो मानव ही नहीं, जीव-जन्तु भी अपने शिशु का पालन-पोषण छोड़ दें। यह अवस्था पेड़-पौधों में भी पायी जाती है। इससे स्पष्ट होता है की प्रेम के बिना यह सृष्टि शून्य हो जाएगी। जैसे ईश्वर कण-कण में बसते है, उसी प्रकार प्रेम भी है।

              प्रेम इस लोक की ऐसी बहुमूल्य सम्पदा है, जिसके मूल्य का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। प्रेम उर्वरक के समान है, जो इस सृष्टि को उपजाऊ बनाने में मदद करता है। इस जगत को सुखी-सम्पन्न, सुन्दर-स्वच्छ, मनोरम, आनन्दमयी बनाये रखने के लिए प्रेम ही एकमात्र साधन है। यह औषधि के समान है, जिसका लेप बड़े-से-बड़ा जख्म भर देता है।

             इस प्रसंग में जितना लिखा जाए, उतना ही कम है। इसका वर्णन एक मानव-मात्र के लिये असम्भव है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है - ‘महासागरों को स्याही और धरातल को कागज बना दिया जाए, तो वो भी प्रेम के लिए लिखने पर थोड़ा पड़ जाएगा'। हमारी बिसात ही क्या है ! हमारे द्वारा इसके पक्ष-विपक्ष में की गई चर्चा तो एक लोकोक्ति के समान है, ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ या उससे भी कम है।

               हमने ऊपर के प्रसंग में प्रेम को पाँच भागों में बाँटने का जो प्रयास किया है, उसका सविस्तार यहाँ प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहे हैं:-
              अलौकिक या सर्वाेत्तम श्रेणी का प्रेम -
              जैसा कि नाम से विदित है, सभी में उत्तम प्रेम। फिर जरा सोचने वाली बात है, कोई सभी में उत्तम कैसे होता है, अर्थात् करने वाले को सुख, शान्ति, समृद्धि, कीर्ति और सादगी मिले, साथ-ही-साथ उसके इस प्रेम से समाज को भी किसी प्रकार की परेशानी उत्पन्न न हो, बल्कि समाज को उसके प्रेम पर गर्व हो। आप सोचेंगे ऐसा प्रेम कैसे हो सकता है। आप जरा सोचिये, ऐसे कई उदाहरण आपके सामने दिखाई देंगे। कुछ को तो सभी जानते हैं, कुछ को हम जानते होंगे तो आप नहीं, आप जानते होंगे तो हम नहीं।

                कुछ चन्द नाम ही हैं, जिन्हें सभी जानते हैं। गोस्वामी तुलसीदास जिन्हें श्री राम से ऐसा प्रेम हुआ कि इन्होंने उनकी याद में चित्रकूट के घाट पर अपना निवास बना लिया। इन्होंने रामचरित मानस की रचना की, जो आज हिन्दू धर्म की अमूल्य धरोहर है। महर्षि वाल्मीकि, जिन्होंने अपने राजा और राज्य से प्रेम किया, फिर घर-परिवार से। उसके बाद उन्होंने श्रीराम से प्रेम किया। श्रीराम को हिन्दू धर्म के अनुसार ईश्वर का रूप माना जाता है। महर्षि वाल्मीकि श्रीराम काल में ही रामायण की रचना कर अमर हो गये।

                इन दोनों के जीवन की प्रेम-प्रसंग की चर्चा हम आगेकरेंगे।

                सूरदास का नाम आपने सुना होगा, जिन्होंने श्रीकृष्ण से प्रेम किया और सूरसागर की रचना कर दी। उनकी कृति आज अमर है। प्रेम-प्रसंग में उनकी तुलना शायद ही किसी से की जा सकती है। इनके अलावे भी बहुत से ईश्वर प्रेमी हैं, जिनका नाम आदर से लिया जाता है।

                  अलौकिक प्रेम तो सभी के अंतःमन में है, पर सभी लोग अपनी तुच्छ इच्छा अलौकिक शक्ति के सम्मुख रखते हैं। हमें सोचना चाहिए कि वह शक्ति, जिसे हम मानते हैं, वह हमारे अन्दर है, कण-कण में है। वह जानता है, हमें क्या चाहिए। फिर उसके सम्मुख अपनी तुच्छ इच्छा/विचार रख अपनी माँग को छोटा क्यों करें ? हम सिर्फ अपने नित्य कर्म को उसके (अलौकिक शक्ति के ) सम्मुख समर्पित कर दें, तो वह हमें खुद-ब-खुद मार्गदर्शित करते हैं। यहाँ हमें ध्यान देना होगा कि यह इहलोक नश्वर है। हम इसे कर्मभूमि कहते हैं। आप जैसा कर्म करेंगे, उसी के हिसाब से आपको फल प्राप्त होगा। इसमें अलौकिक शक्ति बहुत कम ही परिवर्तन करता है, पर एक बार वह अवश्य संकेत करता है। इस चर्चा को हम यहीं छोड़ते हैं। अलौकिक शक्ति और ईश्वर पर हम अलग से चर्चा करेंगे।
             * लौकिक या उच्च श्रेणी का प्रेम -
                इस स्तर का प्रेम सांसारिक जीवन के लिए आदर्श प्रस्तुत करता है, जिससे हमारे क्रियाकलाप नियंत्रित होते हैं। यह कोई असम्भव कार्य भी नहीं है। असम्भव होता, तो इसे कोई प्रस्तुत नहीं कर पाता। आप सभी ने श्रवन कुमार का नाम सुना होगा, जो अपने माता-पिता की सेवा कर अपने नाम को अमर कर गया, जिसके नाम की लोग उपमा देते हैं। रामायण के पात्र श्रीरामचन्द्र को देखें, जो पिता के प्रेम और आदर के कारण ही वनवास गये।

जो लोग लिंग, जाति, सम्प्रदाय, देश, राज्य की सीमा से परे होकर मानव या जीव-सेवा में तत्पर हैं, वे भी उच्च श्रेणी के प्रेमी हैं। उनका जीवन दूसरे के लिये आदर्श है, जैसे - मदर टेरेसा।

             * मध्यम या औसत श्रेणी का प्रेम - 
               यह प्रेम ऐसा प्रेम है, जो इहलोग मे आये लोगों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, जो संसार और मानव सभ्यता के सही संचालन के लिये आवश्यक है। जिस प्रकार मानव सभ्यता के संचालन में मध्यमवर्गीय परिवार का महत्त्व है, उसी प्रकार जैविक क्रिया और मानव सभ्यता के लिये मध्यम श्रेणी का प्रेम आवश्यक है। जो लोग अपने प्रति, परिवार, समाज, राज्य, देश, संसार एवं इस सृष्टी के प्रति अपना कत्र्तव्य समझते हैं और निभाते हैं, यह उनका उसके प्रति प्रेम ही है, जो उन्हें उनके कत्र्तव्य-निर्वाह में अपना सहयोग देता है। हम मोहनदास करमचंद गाँधी को भी ले सकते हैं, उनका प्रेम ही तो था, जिसके रास्ते पर चलते हुए आज वे अमर हैं।

                सिक्ख सम्प्रदाय के धर्म गुरू - गुरू तेग बहादुर, गुरू गोबिन्द सिंह - उनका अपने धर्म के प्रति प्रेम ही तो था, जिसने उन्हें अपने कत्र्तव्य और बलिदान के लिये प्रेरित किया।

               सरदार भगत सिंह और उनके साथियों के दिल में देश और देशवासियों के प्रति प्रेम ने ही तो उन्हें अपने बलिदान देने के लिए प्रेरित किया। जितने भी हमारे स्वतंत्रता सेनानियों या किसी देश की स्वतंत्रता के लिये बलिदान देने वाले लोगों ने बलिदान दिया या कष्ट सहा, वह किसके कारण ? जवाब स्पष्ट है - अपने वतन-जन्मभूमि से प्रेम के कारण।

                बहुत से धर्म-सुधारकों और समाज-सुधारकों, जैसे - राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानन्द, विनोबा भावे इत्यादि ने अपना योगदान इस समाज को संवारने के लिए दिया है। इनका उत्प्रेरक तत्त्व प्रेम था।

               * निम्न श्रेणी का प्रेम - 
                  ऐसा प्रेम, जिसमें प्रेम करने वाले को सिर्फ अपनी चिन्ता होती है। उन्हें न तो समाज की चिन्ता होती है और न सामने वाले की। ये अपने मुँह मियाँ मिट्ठू होते हैं। ऐसे लोग प्रेम तो करते हैं, पर स्वार्थवश। उसका परिणाम भी उन्हें उसी प्रकार मिलता है। जैसे कोई पिता अपने पुत्र को कर्त्तव्यवश नहीं, बल्कि यह सोचकर प्यार करता है कि यह बड़ा होकर मेरी देखभाल करेगा, तो उसका प्रभाव उस बच्चे पर पड़ता है। वह भी बड़ा होकर सिर्फ अपने लिए सोचता है। इस प्रकार उसका परिणाम भी उन्हें मिल जाता है और वे दूसरे को कोसते रहते हैं। इस श्रेणी के प्रेमी का प्रेम शाश्वत भी नहीं होता। ये अपने कर्म से ही दुःखी होते रहते हैं। एक उक्ति है -
                 ‘जस करनी तस भोगही दाता, नरक जात अब क्यूं पछताता।’

                * अतिनिम्न श्रेणी का प्रेम - 
                   इस श्रेणी के प्रेमी समाज और व्यवस्था में अराजकता फैलाते है। इनका न प्रेम का तरीका सही होता और न प्रेम। ये मानवता के लिए अभिशाप हैं। इनके प्रेम को किसी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता। न सामाजिक तौर पर और न कानूनी तौर पर, यहाँ तक कि व्यक्तिगत रूप से और मानवता के नाते भी इन्हें सही नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार के प्रेमी का बहुत ही विकृत रूप समाज को दूषित कर रहे हैं, जिसे मैं यहाँ लिखना नहीं चाहूँगा। यह सामाजिक व्यवस्था के लिये कई चुनौतीपूर्ण मुश्किलें खड़ा कर रहा है।

                   कभी-कभी कोई लड़का किसी लड़की के आकर्षण में पड़ता है और लड़की से प्रेम का ढोंग करता है। लड़की जब मान जाती है, तो वह उसे बीच रास्ते में छोड़कर चलते बनता है। कभी-कभी इसके भयावह दृश्य भी देखने को मिलते हैं। जब लड़की नहीं मानती है, तो वह उसे परेशान करता है, यहाँ तक कि चेहरे पर तेजाब फेंकने और जान लेने की घटनायें भी सामने आती हैं। इसे वह प्रेम कहता है। आज के युवा वर्ग इस प्रकार के अनेक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं, जिस पर विशेष चिन्तन की आवश्यकता है। इसमें हम किसी एक को दोषी कैसे ठहरायें। जिसने किया, वह तो मूल रूप से दोषी है, पर जिसके साथ यह अंजाम होता है, वह और यह समाज एवं उसका घर-परिवार भी कम दोषी नहीं है। हम सबका दायित्व बन जाता है कि इस प्रकार की मनोवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रयास किया जाय और लोगों में जागृति उत्पन्न की जाय।
अब कोई ये पूछेगा कि सही प्रेम क्या है, तो सही-गलत की पहचान पहले बता दी गयी है। प्रेम को कई श्रेणियों में विभक्त कर आज के युवा वर्ग और हमारे प्रेम का स्तर भी निश्चित करने की कोशिश की गई है।

               यहाँ हम कुछ चरित्रों, जिन्होंने प्रेम किया, उन्होंने क्या खोया क्या पाया, के प्रेम का इस समाज पर क्या प्रभाव पड़ा, इसका संक्षिप्त वर्णन करेंगे -

               पहले व्यक्ति, हम रत्नाकर को लेंगे। रत्नाकर, जो आगे चलकर महर्षि बाल्मीकि बने और रामायण की रचना की। इनकी जीवनी का संक्षिप्त वर्णन करेंगे। ऐसा माना जाता है कि ये सर्वप्रथम अपने राज्य के राजा की सेना मे थे। वे राज्य और राजा, दोनों के प्रति एक सैनिक का दायित्व भली-भाँति निभा रहे थे। युद्ध में भी वे ऐसा आचरण नहीं करते थे, जिससे बाद में उन्हें और दूसरे को प्रायश्चित्त करना पड़े। इसी कालक्रम में उनके राज्य के राजा ने दूसरे राज्य के राजा पर चढ़ाई कर दिया। ये लोग युद्ध जीत गये। इनकी सेना के कुछ सैनिक वहाँ की धन-सम्पदा को लूटने लगे और वहाँ की औरतों से गलत व्यवहार करते हुए व्याभिचार करने की कोशिश करने लगे, जिस पर रत्नाकार ने मना किया तो वो उन्हीं से लड़ पड़े। इस पर रत्नाकर ने उनका वध कर दिया, जिसके कारण उनके राजा ने रत्नाकर को ही राजद्रोही करार दिया। वह अपने राज्य को छोड़कर बिरह जंगल में चले गये। दस्यु का जीवन व्यतीत करते हुए अपने घर-परिवार का पोषण करने लगे। उसी समयांतराल मे एक घटना घटित हुई, जिसने उनके जीवन का रूख ही मोड़ दिया। डाकू रत्नाकर महर्षि बाल्मीकि बन गये। इनके नाम के पीछे बहुत लोगों का बहुत सारा तर्क है। इनका नाम बाल्मीकि क्यों पड़ा ? उनके नाम के तर्क-वितर्क हम यहीं छोड़ते हैं और उनके जीवन के घटनाक्रम को आगे बढ़ाते हैं।

             एक समय ऐसा हुआ कि जहाँ रत्नाकर रहते थे, उस रास्ते को कोई राही कई दिनों से इस्तेमाल नहीं कर रहा था। उनके साथियों के साथ उनके घर-परिवार का पोषण भी मुश्किल हो गया। इस बीच एक दिन एक मुनि ने उस रास्ते का इस्तेमाल किया। ऐसा माना जाता है कि वह मुनि नारद मुनि थे। उनकी मुलाकात डाकू रत्नाकर से हुई। रत्नाकर ने उन्हें रोका, मुनि ने कहा यह तुम किसलिए कर रहे हो और किसके लिए कर रहे हो, तो रत्नाकर का जबाब था - अपनों के लिए, माता-पिता और बच्चों के लिये। मुनि ने कहा - इसके पहले तो तुम राजा के लिये काम करते थे। खैर, तुम जो ये पाप की कमाई करते हो, इसमें कौन-कौन भागी हैं, जरा बताओ। रत्नाकर बोले - सभी। मुनि ने कहा - जरा पूछकर आओ। रत्नाकर बोले - तुम्हारा क्या भरोसा, इस बीच तुम भाग न जाओ। मुनि ने कहा - हमें वृक्ष के तने से बांध दो। रत्नाकर ने मुनि को वृक्ष के तने से बाँधकर अपने घर की ओर चल दिया। वहाँ जाकर उसने माँ-पिताजी से पूछा - मैं जो गलत तरीके से उपार्जन करता हूँ, उसके पाप में आप दोनों भागी हैं न। माता-पिता ने जबाब दिया - पुत्र ! हम तुम्हें बहुत प्यार करते हैं, पर हम उसमें कैसे भागी हो सकते हैं। हमने तुम्हें जन्म दिया, तुम्हारा पालन-पोषण किया, अब हम वृद्ध हो गये हैं, हमारा पोषण करना तुम्हारा कत्र्तव्य है। उसके बाद वे अपनी पत्नी और बच्चे के पास गये। उसी प्रश्न को दोहराया - इस उपार्जन के तरीके से उत्पन्न पाप में आप सभी भागी हैं न। बच्चों ने जबाब दिया - ये कैसे हो सकता है ? आपने हमें जन्म दिया है, हमारा पालण-पोषण करना आपका फर्ज है। पुनः वह अपने पत्नी की ओर मुखातिब हुए, तो पत्नी ने कहा - आप हमारे स्वामी हैं, मैं आपकी अद्र्धांगिनी हूँ, आपके सुख-दुःख में मैं बराबर की भागी हूँ। पर जो ये पाप-पुण्य की कमाई है, इसे मैं कैसे बाँट सकती हूँ ? इसे जो कमायेगा वही खायेगा। इतना कहना था कि दस्यु रत्नाकर अंदर से टूट गया। जिसके नाम से लोग कांपते थे, वह किसी तरह चलकर जंगल में मुनि के पास पहुँचा। वह मुनि के चरणों में गिर पड़ा, प्रायश्चित के लिये कहा। मुनि ने उसे राम-नाम जाप करने के लिये बोला। पर रत्नाकर के मुख से अपने कर्मवश राम नाम भी नहीं निकला, तो मुनि ने ‘राम’ को ‘मरा’ शब्द बनाकर उसका उच्चारण करने को कहा। रत्नाकर के अपने कर्मानुसार मुख से राम के स्थान पर मरा निकला। वह उसी का जाप करने लगे। इस प्रकार ‘मरा’ का जाप करने से ‘राम’ से आपरूपी उन्हें सच्चा प्यार हो गया। आत्मशुद्धि और तप से उन्हें आगे चलकर महर्षि पद प्राप्त हुआ।

            यहाँ देखने वाली बात है कि रत्नाकर को अपने राज्य और राजा से सच्चा प्यार था, तभी जो राजा के उस व्यवहार पर भी उसने राजा एवं राज्य के प्रति कोई षड़यंत्र नहीं किया। उसके राज्य और राजा की कोई निन्दा न करे, यह सोचकर उसने सैनिकों का वध किया। दस्यु जीवन के दौरान भी उसने अपने घर-परिवार से प्रेम किया। उसी का नतीजा हुआ कि उनके उत्तर से उसके दिल को आघात हुआ और वह राम नाम को प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप उसे महर्षि पद प्राप्त हुआ। लोगों के लिये दस्यु रत्नाकर अब महर्षि बाल्मीकी के रूप में पूजनीय हो गये।

              दूसरा चरित्र हम रामबोला को लेते है, जो आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास हुए। रामबोला का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनके माता और पिता स्वर्ग सिधार गये। उनका लालन-पालन उनकी बुआ (फुआ) ने बड़े कष्ट सहते हुए बड़े प्यार से किया। वे तरूण हुए, तो उनका ब्याह एक अति सुन्दर और सुशील कन्या से करा दी गई, जिसे पाकर वे बहुत खुश हुए। उसकी सुन्दरता से उन्हें इतना प्यार हुआ कि उसके बिना उन्हें रहा नहीं जाता था। वे अपनी पत्नी से एक पल के लिए भी अलग नहीं रहना चाहते थे। उनकी गृहस्थी हँसी-खुशी से चल रही थी। एक बार की बात है रामबोला अपने घर पर नहीं थे, किसी कार्यवश कहीं बाहर गये हुए थे। इसी बीच उनकी पत्नी के मायके से बुलावा आ गया और उन्हें रामबोला से मिले बगैर जाना पड़ा। रामबोला जब घर पर आये, तो उन्हें उनकी प्यारी पत्नी नही मिली, उन्हें स्थिति-परिस्थिति की जानकारी मिली। रात हुई, वे चारपाई पर ऊपर मुख कर के लेटे हुए यादो में खोये हुए थे। भादो की काली रात थी। झमाझम बारिश हो रही थी। बाढ़ आई हुई थी। नदी का पानी उफान पर था। रामबोला अनायास ही उठते हैं और पत्नी से मिलने चल देते हैं। उन्हें स्थिति-परिस्थिति का कोई विचार नहीं आता। उस भयावह काली रात का उनके मन में ख्याल भी नहीं आता है। वह घर से निकल पड़ते हैं। रास्ते मे उन्हें एक नदी मिलती है, तट पर एक शव पड़ा हुआ था, जिसे वह नाव समझते हैं और यह सोचते हैं कि उसे उनकी पत्नी ने उनके लिये ही छोड़ रखी है। ऐसा सोचते हुए उसके सहारे ही वह नदी को पार कर जाते हैं और आगे रास्ता तय कर घर के दरवाजे पर पहुँचते हैं। घर अंधकार से डूबा हुआ था, बारिश हो रही थी, बिजली चमक रही थी, बादल गरज रहा था। वह आवाज देते हैं, पर उनकी आवाज को कोई नहीं सुन पाता है। फिर वह चारों तरफ से घर का मुआयना करते हैं। उन्हें एक रस्सी दिखती है। वह समझते हैं कि उनकी पत्नी इसी में सो रही है और उसने उन्हीं के लिए यह रस्सी लटका रखी हैै। जिसे वह रस्सी समझ रहे थे, वास्तव में वह एक काला सर्प था, जिसके सहारे वह उस घर के कमरे में प्रवेश कर गये। संयोग ऐसा कि उनकी पत्नी उसी कमरे मे सो रही होती है। वह आवाज देते हैं। वह चैंक कर नींद से जागती है और जानना चाहती है कि वह कमरे में कैसे आये ? वह उस सर्प को रस्सी बताकर दिखाते है। उनकी पत्नी देखती है, पर उसे तो सर्प दिखाई देता है। वह उनका स्वागत करने के बजाय उन्हें कोसती है। कहती है - आप हमसे इतना प्रेम करते हैं, हमारी सुन्दरता पर इतने आकर्षित हैं ! उसके मुख से आगे निकलता है - अगर आपको इतना प्रेम और आकर्षण प्रभु, ईश्वर, राम के नाम से होता तो आप अमर हो जाते। उसकी बात को सुनकर रामबोला अन्दर से बहुत दुःखी होते हैं। वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करते थे, उसी को सबकुछ मानते था। वहाँ से वह उल्टे पांव वापस हो जाते हैं। पत्नी को कुछ नहीं बोलते। इधर-उधर भटकते-फिरते हैं। फिर उनके जीवन में ऐसा मोड़ आता है कि रामबोला ने अपना सारा ध्यान राम-नाम के ऊपर लगा दिया। इस प्रकार रामबोला आगे चलकर गोस्वामी तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध हुए और गोस्वामी तुलसीदास के रूप में रामचरित मानस की रचना कर अमर हो गये।

              यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि रामबोला ने अपनी पत्नी से और गोस्वामी तुलसीदास जी के रूप में श्रीराम से निश्छल और सच्चे मन से प्यार किया, तभी तो आज उनका नाम अमर हो गया। तीसरा और चैथा चरित्र हम लैला-मजनूं और हीर-रांझा का लेते हैं। दोनों प्रेमी का प्रेम सच्चा था, पर दोनों न मिल सके।
दोनों का अन्त बड़े ही दुःखद तरीके से हुआ। हीर-रांझा का प्रेम भी अमर है। इन्हें मनुुष्य द्वारा बनाये गये सरहद ने नहीं मिलने दिया। इसमें किसे दोष दें। हमारे धर्म-ग्रन्थो में कई प्रेम विवाह का वर्णन है, पर उस पर कोई ध्यान नहीं देता। न हम न ही आप। हमें सही मायने में अपने शास्त्रों की सही जानकारी भी नहीं है। जो जानते भी हैं, वह उसे सामने लाना नहीं चाहते, उल्टे शास्त्रों और धर्म की दुहाई देते हैं।

                 इन दोनों प्रेमी जोड़ी को क्या प्राप्त हुआ ? न उन्हें कुछ मिला और न समाज को। दोनों जिस मंजिल को प्राप्त करना चाहते थे, उन्हें वह मंजिल नहीं मिला।

               वे प्रेमी, जो प्यार भरे शादी-शुदा सुखी जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, वे इनके प्यार की तुलना अपने प्यार से क्यों करते हैं ?

              ये है सच्चे प्यार का कड़वा सच। लोग बोलते हैं, प्यार दिमाग से नहीं, दिल से होता है। हम कहते हैं - यह अनुभव की बात है। दिल एक बार अवश्य हमें सही मार्गदर्शन देता है। जब दिल बोलता है, तो उसे हमें दिमाग से तथा सामाजिक व्यवस्था और शास्त्रों के समकक्ष रखकर सोचना चाहिए और सही-सही निर्णय लेना चाहिए।

              अब हम यहाँ कुछ और सच्ची कहानियों का बयान करेंगे, जो हमने देखा है। कहानी का नाम और स्थान का नाम लिखने से बचना चाहूँगा, क्योंकि उन्हें, जिनका ये प्रेम-प्रलाप है, आपत्ति हो सकती है।

              हमारे ही गाँव का एक लड़का है, जो सुन्दर और देखने में आकर्षक है। वह ज्यादातर अपने मामा के गाँव आते-जाते रहता था। उसी गाँव में, जहाँ उसका ममहर था, उसे एक लड़की से मुलाकात होती है। लडकी को भी हमने देखा है वह भी सुन्दर और आकर्षक थी। लड़की का ममहर भी उसी गाँव मे था। वह वहीं रहकर पढ़ती थी। दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा। दोनों ने शादी करने के वायदे किये। दोनों के मामाओं को ये बात मालूम हुई। दोनों को समझाया गया और धमकाया भी गया। दोनों ने मरने की धमकी दी और अपने साथी-सहयोगियों की मदद से अपने मामाओं को मना लिया। दोनों का प्यार शादी में बदल गया। घर वालों ने भी उन्हें सहर्ष स्वीकार कर लिया। जब ये सारी घटनायें, प्यार से शादी तक हुई, उस समय मैं दशवीं वर्ग में पढ़ रहा था। अब उनके दो बच्चे हैं।

                कुछ वर्ष, लगभग छः या सात वर्ष के पश्चात् हमने सुना कि दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। न्यायालय से तलाक लेकर नहीं, बल्कि झगड़ा करके। गनीमत यही है कि उनकी शादी का कोई विरोधी नहीं है, सभी सगे-सम्बन्धी उन्हें मिलाना चाहते हैं। मेरे अन्तर्मन में उनकी सही कहानी जानने की उत्सुकता हुई। आखिर ये दोनों अलग क्यू रह रहे हैं ? ऐसी क्या बात हो गई, जो दोनों अलग रहने पर मजबूर हैं। जहाँ इनका ममहर है, वहाँ हमारी भी रिश्तेदारी है।

                 इन दोनों के जीवन कहानी की खोज-खबर पर मालूम हुआ कि पहले ये दोनों एक-दूसरे के यौवन की खुशबू से आकर्षित हुए। दोनों बड़े ही आकर्षक पोषाक पहनते थे, अपने आप को संवारने में कोई कसर नहीं रखते थे। आधुनिकता इन पर हावी थी, वो भी पश्चिमी सभ्यता की। इनका प्रेम आन्तरिक न होकर बाह्य आकर्षण से बंध गया था।

               इसके बाद इन दोनों ने अपनी गलत आर्थिक स्थिति का ब्यौरा दिया, जो इनके अलगाव का मुख्य कारण बना। इन दोनों ने अपने रिश्तेदारों को इस प्रकार एक-दूसरे के सम्मुख रखा कि अगला उनकी सही स्थिति न जान सके। दोनों एक-दूसरे को उनके रिश्तेदारों के बराबर ही तौलने लगे।

                लड़का, जो एक गैर सरकारी सिक्यूरिटी कम्पनी में सेवा देता था, यह कम्पनी विश्व स्तर की बतायी गयी थी। दोनों की शादी हो गयी, तो लड़का बहुत दिन तक अपनी सेवा से गैर-हाजिर रहा, जिसके कारण कम्पनी ने उसकी सेवा समाप्त कर दी। दोनों को अब आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा।

               शादी के सात वर्ष तो इनके आनन्द में गुजर गये। लड़की कभी ससुराल में रहती तो कभी मायके या मामा के पास। यहाँ तक कि इन दोनों ने जिन-जिन रिश्तेदारों से एक-दूसरे का परिचय कराया था, वहाँ भी ये कुछ दिन रहे। इसी बीच इनके दो बच्चे हो गये। अब इन्हें दूसरे के पास रहने में परेशानी होने लगी। ये एक-दूसरे को कितने दिनों तक झूठ के साये में रख सकते थे। सच्चाई धीरे-धीरे उनके सामने आ गई। यहीं से इनके दाम्पत्य जीवन में खटास आने लगी और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो गया। यहाँ तक कि ये एक-दूसरे के चरित्र पर भी ऊँगली उठाने लगे। आज परिणाम यह है कि दोनों एक-दूसरे को दोष देते हुए अलग रह रहे हैं।

               इनके प्रेम-प्रलाप की कहानी मैं वर्ष 2012 में प्रस्तुत कर रहा हुँ। जो लोग इन्हें मिलाने का प्रयास कर रहे हैं, उनका प्रयास सार्थक हो, ये दोनों मिल जायें। इनके दो बच्चे हैं, उन्हें कोई परेशानी न हो और बच्चों का भविष्य संवर जाय। दोनों सुखी दाम्पत्य जीवन का भोग करे, ईश्वर से मैं यही प्रार्थना करता हूँ।

              इनके प्रेम-प्रलाप में एक बात ध्यान देने योग्य है। इन्होंने प्रेम किया, दिशा भी सही दी, पर झूठ और यौन आकर्षण, जो बाद में इनके गले की हड्डी बन गई। इनका प्रेम, प्रेम न होकर एक-दूसरे के आकर्षण से बंध कर रह गया।

               हम सभी जानते हैं कि किसी का भी ऊपरी आकर्षण ज्यादा समय तक बरकरार नहीं रहता है। हर आकर्षक दिखने वाली वस्तु स्थायी नहीं हो सकती। जब तक एक-दूसरे से प्रेम-भावना से न बंधे और एक-दूसरे के लिये त्याग और मन से इज्जत न हो, एक-दूसरे के दुःख-दर्द को अपना न समझ,े तब तक प्रेम स्थायी नहीं हो सकता।

                      इस प्रकार की अन्य घटनायें भी हमारे समक्ष हैं। कितनों का वर्णन करे।

                     तत्काल की घटनाओं की ओर मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा, जो आये दिन समाचार-पत्रों में पढ़ने एवं टेलीविजन में देखने को मिलता है। ये घटनायें कोई बाहर की नहीं है। ऐसा भी नहीं कि हम इससे अन्जान हैं। ये सभी हमारे आस-पास की हैं। ये हमारी समाज की ही उपज हैं, जैसे - दो युगल प्रेमी साथ जा रहे थे और एक ने दूसरे को चलती ट्रेन से धक्का दे दिया। किसी ने किसी को पैसे के लिए देह-व्यापार में लगा दिया। प्रेम किया और फिर अपने साथियों के साथ मिलकर नीचता की हद पार कर गया। किसी ने प्रेम का नाटक कर प्रेमी को भौतिक साध् ान जुटाने का माध्यम बना लिया। किसी ने किसी की बात न मानी, तो उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया। प्रेमी ने अपने प्रेमिका का अंग-भंग कर दिया। यहाँ तक कि प्रेमी कभी-कभी षड़यंत्र कर अपने सगे-सम्बन्धियों की हत्या तक कर देते हैं या करवा देते हैं। हम आप से पूछते हैं - क्या यही प्यार-प्रेम- इश्क-मोहव्बत है ? हम तो इसे प्रेम नहीं मानते, अगर आप मानते हैं तो अच्छी बात है, हम आपको सुझाव देने वाले कौन होते हैं ?

                अगर ऐसा प्यार है और इसे प्यार कहते हैं, तो मैं ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि वो मिटा दे अपने द्वारा बनाये हुए इस जीवन-चक्र को। मिटा दे इस प्रेम को, जो जीवन जीने का आधार है। ये सारे उदाहरण हमारे समाज के मानसिक विकृत लोगों की पहचान है, जो मानव-सभ्यता को दूषित कर रहे हैं। यह हमारी सभ्यता और संस्कृति के ह्रास का परिचायक है, जो प्रेम को नहीं समझ पा रहा है। हमें आज अपने पीढ़ी के चरित्र-निर्माण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। उनके नैतिक-स्तर को ऊँचा करने में अपना योगदान देना चाहिए।

                                                                       *****







बुधवार, 15 जुलाई 2015

*हिन्दू धर्म और धर्म शास्त्रों से संक्षिप परिचय *



                            हिन्दू धर्म में बहुत सारे धर्म ग्रन्थ हैं। वर्तमान का जो हिन्दू धर्म है, भविष्य में ऐसा नहीं रहेगा और न भूतकाल में यह ऐसा था। भूतकाल में हिन्दू धर्म को सनातन धर्म कहा जाता था, अभी भी बहुत सारे हिन्दू धर्मवालम्बी अपने कागजातों में धर्म वाले काॅलम में सनातन ही लिखते हैं। हिन्दू (सनातन) धर्म की बहुत सी शाखाएँ हैं। कुछ ने तो बिल्कुल अलग धर्म का ही रूप ले लिया है और उनके (धर्मावलम्बी) अनुयायी अब हिन्दू धर्म से बने हैं या इसकी शाखा हैं, कहने पर विरोध प्रदर्शन करते हैं।
हिन्दू धर्म सबसे पुराना (प्राचीन) धर्म हैं। इसके बाद ही अन्य धर्मों का प्रदुर्भाव हुआ है। सभी धर्मों (हिन्दू (सनातन) धर्म को छोड़कर) के उद्भव की तिथि निश्चित है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार हिन्दू धर्म सृष्टि निर्माण के समय से ही अस्तित्व में है। विभिन्न कालक्रम में इसकी रूप-रेखा में अनेकों परिवर्तन हुए और अनेक ग्रन्थ, उपग्रन्थ, कथाएँ और कहानियाँ अस्तित्व में आयीं।

                       हिन्दू धर्म का सर्वप्राचीन धर्मग्रन्थ वेद है, जिसके संकलनकर्ता  महर्षि कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास को माना जाता है।
हिन्दू धर्म में चार वेद बताये गये हैं -
(क) ऋग्वेद

(ख) यजुर्वेद

(ग) सामवेद

(घ) अथर्ववेद

                  सबसे प्राचीन वेद ऋग्वेद एवं सबसे बाद का अथर्ववेद है। वेदों को भली-भाँति समझने के लिए छः वेदागों की रचना हुई। ये हैं -

(1) शिक्षा

(2) ज्योतिष

(3) कल्प

(4) व्याकरण

(5) निरूक्त

(6) रचना

                             पुनः उपनिषदों की रचना हुई। मुक्तिकोपनिषद में 108 उपनिषदों का वर्णन आता है। अडियर लाइब्रेरी, मद्रास से प्रकाशित संग्रह में 171 उपनिषदों का प्रकाशन हो चुका है। गुजराती प्रिटिंग प्रेस, मुम्बई से मुद्रित उपनिषद् वाक्य महाकोश में 223 उपनिषदों की नामावली दी गई है। इनमें उपनिषद् - (1) उपनिध् िात्सतुति, तथा (2) देव्युपनिषद नं० 2 की चर्चा शिवरहस्य नामक ग्रन्थ में है। लेकिन ये दोनों उपलब्ध नहीं हैं तथा माण्डूक्यकारिका के चार प्रकरण चार जगह गिने गये हैं, इस प्रकार अब तक ज्ञातउपनिषदों की संख्या लगभग 220 आती है। कृपया ध्यान दे मुख्य उपनिषद 108 हीं हैं।

                         हिन्दू धर्म में पुराणों का भी प्रमुख स्थान है। ये कुल 18 की संख्या में हैं। इसके रचयिता लोमहर्ष अथवा इनके पुत्र उग्रश्रवा माने जाते हैं। ये निम्नलिखित हैं -
(1) मत्स्य पुराण
(2) वायु पुराण (शिव पुराण)
(3) विष्णु पुराण
(4) ब्राह्मण पुराण
(5) भागवत पुराण (देवी भागवत)
(6) अग्नि पुराण
(7) भविष्य पुराण
(8) ब्रह्माण्ड पुराण
(9) गरूड़ पुराण
(10) वामन पुराण
(11) लिंग पुराण
(12) मार्कण्डेय पुराण
(13) नारद पुराण
(14) स्कन्द पुराण
(15) वराह पुराण
(16) पद्म पुराण
(17) कर्म पुराण
(18) ब्रह्मा वैवर्त पुराण

                    इसके साथ ही उप पुराण आते हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख उप पुराणों के नाम नीचे दिये गये हैं। मत्स्य पुराण, वायु (शिव) पुराण, विष्णु पुराण, ब्राह्मण पुराण एवं भागवत (देवी भागवत) पुराण, इन पाँचों में राजाओं की वंशावली पायी जाती है। इनमें सबसे प्राचीन एवं प्रमाणिक पुराण मत्स्य पुराण है। कुछ प्रमुख उप पुराण निम्नलिखित हैं -

(1)गणेशपुराण (2)  नरसिंह पुराण (3)कल्कि पुराण  (4)एकाम पुराण (5)कपिल पुराण (6) दत्त पुराण
(7)श्री विष्णु धर्मात्तर पुराण (8)मुद्रगल पुराण  (9)सन्तकुमार पुराण  (10)शिवधर्म पुराण
 (11)आचार्य पुराण (12)मानव पुराण (13)उश्रा पुराण(14) वरूण पुराण(15) कालिका पुराण (16) महेश्वर पुराण (17) साम्ब पुराण (18) सौर पुराण (19) पराशर पुराण (20) मरीच पुराण (21) भार्गव पुराण (22) हरिवंश पुराण(23) योगवशिष्ठ पुराण (24) प्रज्ञा पुराण

                             इसी कालक्रम में स्मृति-ग्रन्थों की रचना हुई। स्मृति-ग्रन्थों में सबसे प्राचीन एवं प्रमाणिक मनुस्मृति मानी जाती है। यह शुंग काल का मानक ग्रन्थ है। नारद स्मृति गुप्त युग के विषय में जानकारी प्रदान करता है। अन्य स्मृतियाँ याज्ञवल्क्यस्मृति, पराशरस्मृति, ओशनमस्मृति, वृहस्पतिस्मृति एवं कात्यायनस्मृति, विष्णुस्मृति, अत्रीस्मृति, हारीतस्मृति, अंगीरास्मृति, यमस्मृति, आपस्तम्बस्मृति, सर्वतस्मृति, व्यासस्मृति, शांख्यस्मृति, लिखितस्मृति, दक्षस्मृति, शातातपस्मृति, वशिष्ठस्मृति इत्यादि हैं।

                         हिन्दू धर्म की बहुत सी व्रत कथाएँ, चालीसा, कथा, संहिता इत्यादि में प्रकाशित हो चुकी हैं और लोग उसे श्रद्धा से पढ़ते भी हैं।

                          यहाँ हम उन दो ग्रन्थों की अवश्य चर्चा करेंगे, जिससे कोई भी हिन्दू धर्मावलम्बी अछूता नहीं है, सभी के मुख से इनकी । इसे विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य ग्रन्थ होने का गौरव
कहानियों की उपमा दी जाती है। चाहे वह व्यक्ति साक्षर हो या निरक्षर, सभी इनके पात्रों से परिचित हैं और अपने अनुसार उसमें सभी अपनी छवि देखते हैं। ये दोनों ग्रन्थ रामायण और महाभारत हैं। आज तक लगभग 27 विद्वानों ने रामायण की रचना की है, जिनमें से अधिकांश तो उपलब्ध ही नहीं है, मुख्य रूप से दो ही रामायण - वाल्मिकी रामायण, तुलसीदास द्वारा रचित राम चरित मानस का ही लोग अध्ययन करते हैं।

                         रामायण की रचना हिन्दू कालक्रम के अनुसार त्रेता युग में हुई। इसमें राम चरित्र अर्थात् श्रीराम का आचरण का वर्णन है। यह एक प्रकार का ऐतिहासिक ग्रन्थ है, जिसमें भारतवर्ष के विभिन्न राजाओं और क्षेत्रों का वर्णन मिलता है। रामायण महर्षि वाल्मीकि कृत है। इसकी रचना उन्होंने उसी समय की थी, जब इसके पात्र धरातल पर उपस्थित थे। एक गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस है, जो लोगों द्वारा वर्तमान में अधिकतर श्रवण की जाती है। इसकी रचना मुगलकाल के समय में मानी जाती है।

                          महाभारत का पुराना नाम ‘जयसंहिता’ भी है। महाभारत को भी हम एक ऐतिहासिक ग्रन्थ मान सकते हैं। इसमें भी उस काल के राज्य, राजाओं एवं वंशावली का वर्णन मिलता है। इसकी रचना द्वापर में ब्रह्मर्षि कृष्ण द्वपायन वेदव्यास द्वारा की गई थी
प्राप्त हैं। इसमें एक महायुद्ध का वर्णन है। इस युद्ध में मानवता की सारी कडि़याँ टूटती नजर आती हैं। इसी युद्ध से विश्व को एक अमूल्य सार की प्राप्ति हुई है, जिसका नाम ‘गीता’ है। इसमें मानव और मानवता के सही सम्पादन के लिए मार्गदर्शन किया गया है। यह मानवता के लिए अमृत्य कृति (धरोहर) है।

                       आपने हिन्दू धर्म के दोनों ग्रन्थों रामायण आौर महाभारत को पढ़ा होगा। इनसे जुड़ी अन्य रचना, जैसे - आलोचना, समीक्षा, पात्रों का चित्रवृती का अध्ययन किया होगा या श्रवण किया होगा।

                        जहाँ तक मेरे समझ की बात है, रामायण एक स्वच्छ और अनुकरणीय ग्रन्थ है। इसके हर पात्र त्याग का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं और अपने द्वारा हुई गलती के लिये प्रायश्चित करते हैं। इसमें घर-परिवार या समाज में सभी लोगों का त्याग और एक दूसरे के लिये सम्मान की चर्चा है, लोगों में एक-दूसरे के प्रति प्यार है। जहाँ प्यार है, वहाँ सुख-शांति तो रहेगी ही। रामायण काल अर्थात् त्रेता युग सुख-शांति का प्रतीक माना जाता है, तभी तो आज भी रामराज का उदाहरण दिया जाता है। यहाँ हम त्याग और बलिदान की चर्चा नहीं करेंगे, नहीं तो आप कहेंगे कि मैं भी उपदेश देने लगा। मैं अनावश्यक चर्चा या आलोचना का हिस्सा नहीं बनना चाहता।

                        अब हम रामायण काल अर्थात् त्रेता युग से द्वापर युग अर्थात् महाभारत में चलते हैं। महाभारत काल अर्थात् द्वापर के बाद कलियुग का समय आता है, जो वर्तमान में चल रहा है। हर इंसान अपने पीछे हुए घटनाओं से कुछ-न-कुछ सीखता है। अगर वह नहीं सीखता है, तो उसे अपने अनुसार आप किस

                         श्रेणी में रखेंगे, ये मैं आप पर छोड़ता हूँ। जिस प्रकार अपने पिता और परपिता से पुत्र को विरासत में जो सम्पत्ति प्राप्त होती है और वह उसे अपने विवेक के अनुसार इस्तेमाल करता है, जो उसके भविष्य को सुनिश्चित करती है, उसी प्रकार हमें रामायण और महाभारत ग्रन्थ भी विरासत में मिला है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि इसका इस्तेमाल हम कैसे और किन अर्थों एवं रूपों में करते हैं।

            महाभारत काल से ही हमें गीता जैसा अमृत तुल्य ग्रन्थ प्राप्त हुआ। यहाँ हम गूढ़ विषय पर चर्चा नहीं करेंगे।

                  अगर हम आस्तिक होने के बाद अंतःकरण में जायें और शाश्वत सत्य को समझने की कोशिश करें, तो हमें एक अदृश्य शक्ति,  जो  प्रकाश  के  रूप  में  है,  दृष्टिगोचर  होगा। शाश्वत सत्य को प्राप्त करने के लिए धर्म ग्रन्थों में अनेक रास्ते और साधन बताये गये हैं। हम यहाँ विशेष गहराई में नहीं जायेंगे। नहीं तो आप फिर यही कहेंगे कि सब पूर्व निश्चित है। सभी कार्य पूर्व निश्चित है, पर वह हमारे कर्म द्वारा निश्चित होता है। कर्म इस जन्म का हो या पूर्व जन्म का, वह तो इस युग में या किसी युग में प्रधान होता ही है।

                       ’कर्म प्रधान विश्व करी रखा।
                      जो जस करनी तासु फल चखा।।’

                                                                (गोस्वामी तुलसीदास कृत)

इसलिए हम कर्म को झुठला नहीं सकते।

                     यहाँ हम कलयुग का या वर्तमान समय से सम्बन्धित कुछ जानने-समझने की कोशिश करेंगे। जैसा कि हमने सुना है, पढ़ा है, सतयुग में लोग बिल्कुल सभी कार्य सत्य पर आधारित करते थे। सत्य में शक्ति तो है, तभी तो आज कलयुग में भी महात्मा गाँधी हमारे बीच अमर है और प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन का आदर्श सत्य एवं अहिंसा को बनाया। महात्मा गाँधी ने सत्य का अविष्कार नहीं किया है, बल्कि सत्य का उन्होंने अपने जीवन में इस्तेमाल किया है। यहाँ ध्यान देने वाली बात है कि हम सभी, जो शास्त्रों में लिखा है, संत-महात्माओ की वाणी, को अगर हम अपने जीवन में शामिल करें, तो शुरू में हमें थोड़ी परेशानी तो जरूर होगी, पर बाद में हमें अपार सुख-शांति मिलेगी और सफलता हमारे कदम चूमेगी।

                     कलयुग का संधि-विच्छेद - कल+युग = कलयुग है। कल को हम आम बोलचाल की भाषा में मशीनरी भी मान सकते हैं, युग यानी लम्बा समय। कलयुग में जो आप देख रहे हैं, इसमें कितना विकास हो रहा है। मशीनरी और टेक्नोलाॅजी इंसान के हर क्षेत्र में शामिल हो रहा है या हो गया है, यहाँ तक कि इंसानी क्रियाकलापों में भी मशीनों को शामिल किया जा रहा है। मशीनें मानव सभ्यता का हिस्सा बनते जा रही हैं। भविष्य में हो सकता है, यह मानवता पर पूर्ण हावी हो जाये, तब कलयुग का कालक्रम (समय) पूर्ण होगा, जैसा कि त्रेता और द्वापर युग का हुआ था। किसी भी कार्यकाल में वस्तु या सभ्यता का जब पूर्ण विकास हो जाता है, तो उसका ह्रास या विनाश निश्चित है। इसे छोटे स्तर पर आप अपने घर या पड़ोसी के घर को देखकर सहज अनुमान लगा सकते हैं।

                       यहाँ मैं आपको बता दूँ कि मैं विकास का विरोधी नहीं हूँ या विकास को बुरा नहीं मानता। समय के अनुसार तो हमें चलना ही पड़ेगा, तभी हम अपना अस्तित्व बचा सकेंगे, अन्यथा हम बहुत पीछे रह जायेंगे। क्या कभी किसी बीज ने यह सोचा होगा या उसका यह सोचना सही होगा कि उसे अंकुरित नहीं होना चाहिए और फिर पौधा तथा पौधा से वृक्ष नहीं बनना चाहिए, नहीं तो उसका ह्रास या विनाश हो जायेगा। यही बात हमारे साथ और समय के साथ भी लागू होती है।

                           कलयुग को हम समय के रूप में भी ले सकते है। कल यानी आने वाला समय, युग यानी लम्बा समय। कल को अभी तक किसी ने नहीं देखा है, पर सभी उसके अच्छा और सुखद होने की कामना करते हैं। इसके नाम के अनुरूप ही हमें कार्य भी करना चाहिए, जैसा की रहीम जी ने कहा है -

                         ’कल करे सो आज कर, आज करे सो अब।
                         पल में परलय होएगी, बहुरी करेगा कब।।’

                      कलयुग = कल + युग, इसमें कल आने वाला और बीता हुआ समय, दोनों का बोध कराता है। हमें अपने अच्छे कल के लिए बीते हुए कल से सीख लेनी चाहिए और सामंजस्य बैठाकर आगे बढ़ना चाहिए। सीखने के लिये हमारे पास अपना इतिहास है, धर्म-शास्त्र है। इनके घटना-क्रम पर हमें ध्यान देना चाहिए। घटना-क्रम के जो परिणाम सामने आते हैं, उसी के अनुसार हमें अपना व्यवहार करना चाहिए।

                         हमारे पास वर्तमान में इतना समय नहीं है कि एक आम आदमी अपनी जीविका चलाते हुए धर्म-शास्त्रों का पूर्ण अध्ययन कर सके, फिर उसके अनुसार कर्म या व्यवहार करे। लेकिन सभी का, विशेषकर समाज में जो विशेष लोग हैं, उनका यह धर्म और कत्र्तव्य बनता है कि वे शास्त्र अनुकूल आचरण करे और लोगों को उसके लिए प्रेरित करें।

                           यहाँ मैं धर्म पर थोड़ा ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। धर्म का अंग्रेजी शब्द रिलीजन (त्मसपहपवदद्ध है, पर यह हमारे समझ से सही नहीं है। रिलीजन का हिन्दी रूपान्तर सम्प्रदाय है। सम्प्रदायऔर धर्म में वही अंतर है, जो जमीन और आकाश में है, दोनों एक नदी दो पाट की तरह हैं। सनातन (हिन्दू) धर्म ग्रंथों में चर्चा के अनुसार हम धर्म को किसी सम्प्रदाय से नहीं जोड़ सकते। मानवता एवं रिश्ते के अनुसार एक का दूसरे के प्रति जो कर्त्तव्य  बनता है, उसे उसका धर्म कहते हैं। लेकिन जिस आसानी से हमने कह दिया, धर्म इतना ही नहीं है। इसकी महिमा अपरम्पार है यानी यह एक ऊमभत गाछी की तरह है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति को नीला आकाश दूर से धरातल को छूता हुआ प्रतीत होता है और वह उसे छूने के लिए आगे बढ़ता है, वहाँ पहुँचते-पहुँचते उसकी मंजिल और आगे होती जाती है। इससे आप यह नहीं समझें कि धर्म के अनुरूप आचरण हम नहीं कर सकते। इसका अभिप्राय यह है कि जब हम धर्मानुसार आचरण और अपना कर्Ÿाव्य निभाते हैं, तो धरातल की तरह गम्भीर, शीलवान और मजबूत बन जाते हैं और आकाश की तरह विशाल, जो अपने-आप में लोगों के लिए जिज्ञासा की विषय-वस्तु संजोता है, जिसे लोग पाना चाहते हैं। धर्म तो धर्म है, धर्म कभी बुरा नहीं हो सकता।

                      यहाँ हम पुनः द्वापर युग में यानी महाभारत काल में लौटते हैं। हम महाभारत की कुछ छोटी कहानियों की संक्षिप्त में चर्चा करेंगे।

                       जब हम कोई नियम बनाते हैं और उसका पालन करते रहते है, तो वह हमारे अंग-अंग में रच-बस जाता है। जब उसे तोड़ते हैं, तो उसके बहुत बुरे परिणाम सामने आते हैं। उदाहरण स्वरूप, जब किसी नदी पर बिजली उत्पादन या सिंचाई के लिए हम उस पर बाँध बनाते हैं एवं उसके प्रवाह को रोक या कम कर देते हैं, लेकिन जब किसी कारणवश बाँध टूटती है, तो हमारे सामने वह भयावह दृश्य उत्पन्न करती है। यही सिद्धांत महाभारत को आवश्यक बनाती है। ठीक ही कहा गया है, सभ्यता के विकास में ही उसके विनााश का बीज छुपा होता है।

                        आप सभी जानते होंगे की महर्षि कृष्ण द्वापायन का जन्म कैसे हुआ, शान्तनु ने क्या किया, द्रोण का जन्म कैसे हुआ, उन्होंने एकलव्य के साथ शिष्य के नाम पर क्या किया ? धृतराष्ट, पाण्डु और विदुर का जन्म कैसे हुआ ? भीष्म पितामह (देवव्रत) कौन थे, उसके बाद कर्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव का जन्म कैसे हुआ ? भले ही ये अपने आनुवंशिक गुण और अपने कर्म द्वारा सभ्यता के विकास को चरम पर ले गये, लेकिन सभी ने अपने बनाये हुए नियम को तोड़ा। यहाँ अपना यानी खुद से नहीं है, बल्कि उससे है, जिसके आधार पर वे चलते थे। परिणाम तो निकलना था, जो निकला, जगजाहिर है। नवयुग कलयुग का आगमन हुआ। कलयुग के साथ भी यही होगा और आगे होता रहेगा। समय चक्र, चक्र की तरह अपने धुरी पर चलता रहेगा। इसलिए हमें ऐसा आचार-व्यवहार रखना चाहिए, जो हमें सुख-शांति के साथ समाज एवं इतिहास में आदर्श प्रस्तुत करे।
                       
                      एक बार की बात है, दुर्योधन युधिष्ठिर के पास इनके बुलावे पर इन्द्रप्रस्थ गया था। जब वह महल में प्रवेश कर रहा था, तो उसके निर्माणकला के आगे वह मंत्र-मुग्ध सा हो गया था और आगे बढ़ रहा था। उसे एक दासी ने टोका, युवराज आगे पानी है। उसने सोचा हमसे रानी निवास की दासी भी मजाक कर रही है। उसे अर्थात् दुर्योधन को आगे फूलों का रंगोली दिखाई दे रही थी, जो दृष्टि-भ्रम था। महल के सतह की कुछ ऐसी बनावट थी, जिसमें सतह के स्थान जल और जल के स्थान पर स्थल दिखता था। इसी भ्रम में दुर्योधन पड़ गया और आगे बढ़ गया तथा पानी में जा गिरा। वहीं ऊपर में द्रौपदी अपने बाल सुखा रही थी, ठठाकर हंस पड़ी। उसके मुख से परिहास निकला - अंधे का पुत्र अंधा। यह बात दुर्योधन के कानों द्वारा उसके दिल में उतर गया और उसे बहुत दुःख हुआ। वह वहाँ से जब हस्तिनापुर वापस गया, उदास रहने लगा। ज्यादा समय वह अपने निवास में ही व्यतीत करता, अपनी तरफ से भी वह लापरवाह रहने लगा। हर समय चिन्तित रहता। यह खबर ध् ाृतराष्ट्र के पास भी पहुँच गई। धृतराष्ट्र ने कारण जानना चाहा, पर उसने नहीं बताया। फिर धृतराष्ट्र ने उसे अपने कक्ष में बुलाया और उसे वचन दिया कि उसके दिल पर पड़े बोझ को कम करने में वह जरूर मदद करेंगे। फिर दुर्योधन का मुख खुला और उसने महाराज से वचन लिया कि वह उससे यानी द्रौपदी से इसी राज्यसभा में अपने अपमान का उसी अंदाज में बदला लेगा। इसके प्रतिशोध स्वरूप षड़यंत्र रचा गया एवं जुए का आयोजन हुआ, जिसके परिणाम से आप सभी भलि-भाँति परिचित हैं। भीम ने दुर्योधन के रक्त से द्रौपदी के बाल धोने की कसम ली। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें कभी भी किसीका, चाहे उसके साथ हमारा  कोई रिश्ता हो अथवा नहीं, ऐसा परिहास नहीं करना चाहिए, जो उसके दिल को ठेस पहुँचाये। परिहास करने में हमेशा संयमित वचन का इस्तेमाल करना चाहिए। द्रौपदी का वह एक वचन कितना बड़ा परिणाम लेकर आया, ये आप सभी जानते ही हैं। महाभारत में एक बात और ध्यान देने वाली है, सभी ने कुछ-न-कुछ प्रतिज्ञा ली है तथा खुश होकर एक-दूसरे को आर्शीवाद स्वरूप वचन दिया है। मनुष्य को अनावश्यक वचनबद्ध भी नहीं होना चाहिए। क्रोधित होने पर अनावश्यक कोई प्रतिज्ञा या निर्णय नहीं लेना चाहिए, उसी प्रकार हर्ष या खुशी में अनावश्यक वचनबद्ध नहीं होना चाहिए। दोनों हीस्थिति भयावह और खतरनाक है।

                       वेद शब्द का अर्थ ’ज्ञान’ है। वेद पुरूष के शिरोभाग को उपनिषद् कहते हैं। उप का अर्थ ‘व्यवधान रहित’, नि का मतलब‘सम्पूर्ण’ एवं षद् का अर्थ ‘ज्ञान’ अर्थात् उपनिषद् का अर्थ हुआ -व्यवधान रहित सम्पूर्ण ज्ञान। 
अब तक ज्ञात कुछ महत्त्वपूर्णउपनिषदों की सूची -
(1) ईशावास्योपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदिय)
(2) अक्षिमाालिकौपनिषद् (ऋग्वेदिय)
(3) अथर्वशिखोपनिषद् (सामवेद)
(4) अथार्वशिर (सामवेद)
(5) अ्रयतारकोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदिय)
(6) अद्वैतोपनिषद्
(7) अद्वैतभावनोपनिषद्
(8) अध्यात्मोमनिषद् (शुक्लयजुर्वेदिय)
(9) अनुभवसारोपपनिषद्
(10) अन्नपूर्णोपनिषद् (सामवेद)
(11) अमनस्कोपनिषद्
(12) अमृत्तनादोपनिषद् (कृष्णयजर्वेदीय)
(13) अमृतबिन्दूपनिषद् (ब्रह्मविन्दूपनिषद) (कृष्णयजुर्वेदीय)
(14) अरूणोपनिषद्
(15) अल्लापनिषद्
(16) अवधाूतोपनिषद् (वाक्यात्मक) एवं पद्यात्मक
(17) अवधूतोपनिषद् (पद्यात्मक)
(18) अल्यक्तोपनिषद् (सामवेद)
(19) आचमनोपनिषद्
(20) आत्मपूजोपनिषद्
(21) आत्मप्रबोधनोपनिषद् (आत्मबोधोपनिषद्) (ऋग्वेदीय)
(22) आत्मोपनिषद् (वाक्यात्मक) (सामवेद)
(23) आत्मोपनिषद् (पद्यात्मक)
(24) आथर्वणद्वितीयोपनिषद्
(25) आयुर्वेदोपनिषद्
(26) आरूणिकोपनिषद् (आरूणेभ्युपनिषद्) (सामवेद)
(27) आर्षेयोपनिषद्
(28) आश्रमोपनिषद्
(29) इतिहासोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
(30) इसावास्योपनिषद् उपनषत्स्तुति
(शिव रहस्यान्तर्गत, अभी तक अनुपलब्ध है)
(31) ऊध्वर्पण्ड्रोपनिषद् (वाक्यात्मक एवं पद्यात्मक)
(32) एकक्षरोपनिषद् (कृष्णयर्जुर्वदीय)
(33) ऐतेरेयोपनिषद् (अध्यायात्मक) (ऋग्वेदीय)
(34) ऐतेरेयोपनिषद् (खन्डात्मक)
(35) ऐतेरेयोपनिषद् (अध्यात्मक)
(36) कठरूद्रोपनिषद् (कण्ठोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
(37) कठोपनिषद्
(38) कठश्रृव्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(39) कलिसन्तरणोपनिषद् (हरिनानोपनिषद्) (कृष्णयजुर्वेदीय)
(40) कात्यामनोपनिषद्
(41) कामराजकीलितोद्रारोपनिषद्
(42) कालाग्निरूद्रोपनिषद् (कृष्णाजुर्वेदीय)
(43) कालिकोपनिषद
(44) कालिमेधादीशितोपनिषद्
(45) कुण्डिकोपनिषद् (सामवेद)
(46) कृष्णोपनिषद् (सामवेद)
(47) केनोपनिषद् (सामवेद)
(48) कैवल्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(49) कौलोपनिषद्
(50) कौपीतकिब्राह्मणोपनिषद! (ऋग्वेदीय)
(51) क्षुरिकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(52) गणपत्यथर्वशीषोपनिषद् (सामवेद)
(53) गणेशपूर्वतपिन्युपनिषद् (वरदपूर्वतापिन्युपनिषद्)
(54) गणेशोक्तारतमेन्युपनिषद् (वरदोत्तरतापिन्य युपनिषद्)
(55) गर्भोपपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)।
(56) गन्धर्वोपनिषद्
(57) गायग्युपनिषद्
(58) गायत्रीर ह्नस्योपपनिषद्
(59) गारूडोपनिषद्  (वाक्याात्मक एवं मन्त्रात्मक) (सामवेद)
(60) गुह्मकाल्युपनिषद्
(61) गह्मषोदान्यासोपनिषद्
(62) गोपालपूर्वतापिन्युपनिषद्
(63) गोपालोत्त रतापिन्युपनिषद्
(64) गोपीचन्दनोपनिषद्
(65) चतुर्वेदोपनिषद्
(66) चाक्षुषोपनिषद्
(चक्षरूपनिषद् चक्षुरोगोपन उपनिषद्, नेत्रोपनिषद्)
67) चेन्त्युपनिषद्
(68) छागलेयोपनिषद्
(69) छान्दोग्योपननिषद् (सामवेद)
(70) जाबालोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(71) जाबालदर्शनोपनिषद् (सामवेद)
(72) जाबाल्युपनिषद् (सामवेद)
(73) तारसारोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(74) तारोपनिषद्
(75) तराायातीतोपनिषद् (तीतावधतो) (शुक्ल्यजुर्वेदीय)
(76) तुरीयोपनिषद्
(77) तलस्युपनिषद्
(78) तेजोबिन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(79) तैत्तरीयोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(80) त्रिपादविभूतिमह्मानारायणोपनिषद् (सामवेद)
(81) त्रिपुरातापिन्युपनिषद् (सामवेद)
(82) त्रिपुरोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
(83) त्रिपुरामह्नोपनिषद्
(84) त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(85) त्रिसुपर्णोपनिषद्
(86) दक्षेणामूरर्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(87) दत्तात्रेयोपनिषद् (सामवेद)
(88) दत्तोपनिषद्
(89) दुर्वासोपनिषद्
(90) (क) देव्युपनिषद् (पद्यात्मक एवं मंत्रात्मक) सामवेद
(ख) दव्युपनिषद (शिवरहस्यान्तर्गत अनुपलब्ध)
(91) दूयोपनिषद्
(92) ध्यानविन्दुपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(93) नादविन्दुपनिषद् (ऋग्वेदीय)
(94) नारदोपनिषद्
(95) नारदपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
(96) नारायणपूर्वतापिन्युपनिषद्
(97) नारायणोतरतापिन्युपनिषद्
(98) नाारायणोपनिषद् (नरायणा  वर्शीर्ष)
(कृष्णयजुर्वेदीय)
(99) निरालम्बोपनिषद् (शुक्लयजर्वेदीय)
(100) निरूक्तोपनिषद्
(101) निर्वाणोपनिषद् (़ऋग्वेदीय)
(102) नीलरूद्रोपनिषद्
(103) नृसिंहपूर्वतापिन्युपनिषद्
(104) नृसिंहषटचक्रोपनिषद्
(105) नृसिंहोचरतापिन्युपनिषद् (सामवेद)
(106) पंचब्रह्मोचरतापिन्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(107) परब्रह्मपनिषद् (सामवेद)
(108) परमहंसपरिब्राजकोपनिषद् (सामवेद)
(109) परमहंसोपनिषद् (शुक्लयजुवेदीय)
(110) पारमात्मिकोपनिषदृ
(111) पारायणोनिषद्
(112) पाशुपतब्राह्मोपनिषद् (सामवेद)
(113) पिण्डोपनिषद्
(114) पीताम्बरोपनिषद्
(115) पुरूषसूक्तपनिषद्
(116) पैड़गलोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(117) प्रणवोपनिषद् (पद्यात्मक)
(118) प्रणवोपनिषद् (वाक्यात्मक)
(119) प्रश्रोपनिषद् (सामवेद)
(120) प्राणाग्निहोत्रोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(121) बटुकोपनिषद् (बटुकोपनिषध)
(122) बह्नचोपोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
(123) बाष्क्लमन्त्रोपनिषद्
(124) बिल्वोपनिषद् (पद्यात्मक)
(125) विल्वोपनिषद् (वाक्यात्म)
(126) बृह्नज्जावालोपनिषद (सामवेद)
(127) बृह्नदारण्याकोपनिषद् (शुक्लययजर्वेदीय)
(128) ब्रह्मविद्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(129) ब्रह्योपनिषद् (कृष्णयजुवेदीय)
(130) भगवद्वीतोपनिषद्
(131) भवसंतरणाोपनिषद्
(132) भस्मजाबालोपनिषद् (सामवेद)
(133) भावनोपनिषद् (कापिलोपनिषद्) (सामवेद)
(134) भिक्षुकोपनिष (शुक्लयुजुर्वेदीय)
(135) मठाम्नयोपनिषद्
(136) मण्डलब्राह्मणोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(137) मन्त्रिकोपनिषद् (चूलिकोपनिषद्) (शुक्लयजुर्वेदीय)
(138) मल्लायुपनिषद्
(139) महानारायणोपनिषद्
(बृहन्नारायणोपनिषद्, उŸार नारायणोपनिषद्)
(140) महावायोप्पनिषद्
(141) महोपनिषद् (सामवेद)
(142) माण्डक्योपनिषद् (सामवेद)
(143) माण्डक्योपनिषत्कारिका(क) आगम
(ख) अलातशान्ति
(ग) वैतथ्या
(घ) अद्वीत
(144) मुक्ततिकोपनिषद् (शुक्लयजुवेद)
(145) मुण्डकोपनिषद् (सामवेद)
(146) मद्रलोपनिषद् (ऋग्वेदीय)
(147) मृत्युलाङगूलोपनिषद्
(148) मत्रायव्युपनिषद् (सामवेद)
(149) मत्रेण्युपनिषद् (सामवेद)
(150) यज्ञोपवीताोपनिषद्
(151) याज्ञवल्क्योपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(152) योगकुण्डल्युपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(153) योगचूडामण्युपनिषद् (सामवेद)
(154) योगतत्त्वोपनिषद्-1
(155) योगतत्त्वोपनिषद्-2
(156) योगराजोपनिषद्
(157) योगशिखोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(158) योगोपनिषद्
(159) राजश्यामलार हस्योपनिषद्
(160) राधाकोपनिषद् (वाक्यात्मक)
(161) राधोकोपनिषद् (प्रश्न पाठक)
(162) रामपूर्वत (सामवेद)
(163) रामस्योपनिषद् (सामवेद)
(164)       रामोत्तर  रताप्पेन्यापनिष
(165) रूद्रहदयोपनिषिद्् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(166) रूद्राक्षजाबालेपननिषद् (सामवेद)
(167) रूद्रोप्पनिषद्
(168) लक्ष्म्युपनिषद्
(169) लाङगूलोपनिषाद्
(170) लिङगोपनिषद्
(171) बज्रपज्जजरोपनिषद्
(172) बज्रसूचिकोपनिषद् (सामवेद)
(173) वनदुर्गोपनिषद्
(174) बराहोपनिषद् (कृष्णय्यजवेदीय)
(175) वासुदेवोनपिषद् (सामवेद)
(176) विश्रामोनिषद
(177) वोषणुहदयोपनिषद्
(178) शरभोपनिषद् (सामवेद)
(179) शाटयायन्योपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदी)
(180) शाण्डेल्यपनिषद (सामवेद)
(181) शरीरकोपनिषद् (कृष्णयजुर्वदीय)
(182) शिवसड्क्ल्पोनिषद्-1
(183) शिवसड्क्ल्पोनिषद्-2
(184) शिवोपनिषद्
(185) शुकरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(186) शौनकोपनिषद्
(187) श्याम्योपनिषद्
(188) श्री कृष्णपुरुषोत्तम     सिद्धान्तोपनिषद्
(189) श्रीच्चक्रकरोपनिषद्
(190) श्री विद्यततारकपनिषद्
(191) श्री सूक्तमूक्त श्रीस
(192) श्रवेताश्रृतरोपनिषद् (कृष्णयुजर्वेदीय)
(193) षोदोपनिषद
(194) सड्क्रणोपनिषद्
(195) सदानन्दोपनिषद्
(196) सन्यासोपनिषद् (अध्यायात्मक) (सामवेद)
(197) सन्यासोपनिषद् (वाक्यात्मक)
(198) सरस्वतीरहस्योपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(199) सर्वसारोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(200) सह वै उपनिषद्
(201) संहितोपपनिषद्
(202) सामरहस्योपनिषद्
(203) सावित्र्युपनिषद (सामवेद)
(204) स्सेद्रान्तविठ्ठलोपनिषद्
(205) स्सेद्धान्तशिखाोपनिषद्
(206) स्सेद्धान्तसाारोपनिषद्
(207) सीतोपनिषद् (सामवेद)
(208) सुदर्शनोपनिषद्
(209) सुबालोपनिषद (शुक्ल्यजुर्वेदीय)
(210) समुख्यपनिषद्
(211) सूर्यतापिन्युपनिषद्
(212) सूयोपनिषद् (सामवेद)
(213) सौभाग्यलक्ष्म्युपनिषद् (ऋग्वेदीय)
(214) स्कन्दोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीय)
(215) स्वसंवेधोपनिषद्
(216) हयग्रीवोपनिषद् (सामवेद)
(217) हंसषोढोपनिषद्
(218) संसोपनिषद् (शुक्लयजुर्वेदीय)
(219) हेरम्बोपनिषद्
(220)श्री विद्यततारकपनिषद्


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